राजनीति
भारतीय राजनीति को सशक्त करने का भार अब युवा कंधों पर

भारत में हर वर्ष दो-तीन बड़े राज्यों व हर पाँचवे वर्ष केंद्र में आम चुनाव होते ही हैं। इसके अतिरिक्त पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत, सहकारिता, मंडी, विधान परिषद, राज्यसभा, उप-चुनाव आदि बीच-बीच में आते रहते हैं। लेकिन फिर भी इन चुनावों में युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व बहुत कम रहता है।

परिवारवाद व जातिवाद की राजनीति ही इन सभी चुनाव में हावी रहती है। राजनीतिक नेतृत्व व राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए बड़ी मात्रा में चुनावों में धन खर्च किया जाता है। सरकारी कर्मचारियों का अधिक समय चुनाव संपन्न कराने में ही निकल जाता है। जनहित के कार्य कम ही हो पाते हैं।

राजनीतिक शक्तियों का हस्तक्षेप सरकारी संस्थाओं में दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अधिकांश राजनीतिक दलों में 50 वर्ष की आयु वाले या फिर उससे ज्यादा की आयु के नेता राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में युवा वर्ग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

ऐसा नहीं है कि वर्तमान राजनीति में युवा नेता नहीं हैं लेकिन अधिकांश युवा नेता परिवारवाद व जातिवाद की राजनीति से ही राजनीति में आए हुए हैं जिनका कोई स्वतंत्र राजनीति चिंतन व नेतृत्व नहीं है। ऐसे में वर्तमान राजनीति में युवाओं का अधिक से अधिक संख्या में आना बहुत आवश्यक हो गया है।

जातिवाद व वैचारिक कट्टरता की ओर जा रही हमारी वर्तमान राजनीति को युवा वर्ग का राजनीतिक नेतृत्व ही संभाल सकता है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि युवा भारत की संसद व विधानसभाओं में भी सबसे ज्यादा युवा सांसद व विधायक ही पहुँचे जिससे कि युवा भारत की रुचि व आवश्यकताओं के अनुसार कार्य हो सकें और सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक शुचिता व पारदर्शिता बनी रहे।

तथ्यों पर नज़र डालें तो स्वतंत्रता के बाद से वास्तविकता तो यही है कि विश्व के सबसे युवा देश की संसद स्वतंत्रता के बाद साल दर साल बूढ़ी होती जा रही है। जहाँ स्वतंत्रता के बाद 1952 में संसद में 25 प्रतिशत 40 वर्ष से कम उम्र के सांसद थे, वहीं अब तक सबसे ज्यादा 35 प्रतिशत युवा सांसद 1957 के आम चुनाव में संसद में पहुँचे थे।

तो वहीं 2019 की संसद में 40 वर्ष से कम उम्र के सांसदों की संख्या मात्र 12 प्रतिशत रह गई है। वहीं देश की विभिन्न विधानसभाओं के आँकड़ों पर नज़र डालें तो उनमें भी अधिकांश विधायक 50 वर्ष की आयु से अधिक के हैं। कुछ विधायक तो 80 वर्ष से भी अधिक आयु के होने पर विधानसभाओं में आ रहे हैं!

भला जो सांसद व विधायक ठीक से चल नहीं पाते हैं, वह विधायिका में विधायी कार्य कैसे करते होगें? इसके कई प्रमुख कारणों में से एक कारण है, देश के युवा-युवतियों का राजनीति में बढ़-चढ़कर भागीदारी ना लेना। उसका प्रमुख कारण राजनीति में बढ़ता भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, धनबल व बाहुबलियों का हस्तक्षेप जिसके कारण युवा वर्ग राजनीति से दूरी बनाकर रखता है।

आज आवश्यक हो गया है कि भारतीय युवा बड़ी कंपनियों के बड़े जॉब पैकेज के साथ ही भारतीय राजनीति में भी अपनी सक्रियता बढ़ाए। वह राजनीति में नेतृत्व बढ़ाकर अपने राष्ट्र में ही नौकरियों व बड़ी कंपनियों के लिए नीतियों का निर्माण करें। युवा भारत का युवा वर्ग ही राजनीति को स्वच्छ कर सकता है जिससे हमारे युवाओं को राष्ट्र की सेवा का सुनहरा अवसर मिले।

आज भारत के सामने वैश्विक चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं। आर्थिक, सामरिक, सुरक्षा, आतंकवाद, प्रौद्योगिकी, साईबर अपराध, सोशल मीडिया, पेट्रोलियम उत्पादों के लिए युद्ध आदि जैसे मुद्दों से पार पाने में कई बार उम्रदराज़ नेता असफल रहे हैं। आज का युवा पढ़ा लिखा व संचार माध्यमों को अच्छे से जानता है। वह राष्ट्र की अधिकांश समस्याओं को भी जानता है।

सूचना व सोशल मीडिया के दौर में युवा नेतृत्व वैश्विक व घरेलू समस्याओं से आसानी से निपट सकता है। हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता के संघर्ष में भगत सिंह व चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा क्रांतिकारियों के नेतृत्व में एक नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण हुआ था ।वर्तमान में व अगले 50 वर्षों में भारत की जनसंख्या में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व युवाओं का होगा। ऐसे में भारत में युवाओं को राजनीतिक क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा आना चाहिए व आधुनिक भारत के निर्माण में सहयोग करना चाहिए।

भारत अगले दो दशकों में विश्व का नेतृत्व आसानी से कर सकता है यदि भारत का युवा भारत में ही रहकर राजनीति की बागडोर अपने हाथों में संभाल ले। वर्तमान में एक दो राजनीतिक दलों को छोड़कर किसी दल में आतंरिक लोकतंत्र नहीं है।

अधिकांश राजनीतिक दल परिवारवाद, वैचारिक कट्टरता व जातिवाद की राजनीति के सहारे ही चल रहे हैं और अपने परिवार का विकास करने तक ही सीमित हैं। ऐसे में वर्तमान भारतीय युवा पीढ़ी को आगे आना चाहिए व राजनीति में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर एक आधुनिक, शक्तिशाली, शिक्षित व विकसित भारत के निर्माण में अपना सर्वांगीण योगदान देना चाहिए।

मध्य प्रदेश के देवास में आधारित भूपेंद्र अधिवक्ता एवं लेखक हैं। वे @AdvBhupendraSP के माध्यम से ट्वीट करते हैं।