श्रद्धांजलि
अंग्रेज़ों के विरुद्ध यतींद्रनाथ दास (बाघा जतिन) का अंतिम अभियान- भाग 4

यह यतींद्रनाथ दास की कहानी का चौथा भाग है। पहला, दूसरा और तीसरा भाग क्रमशः यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ें।

“यदि सेना खड़ी की जा सकती या भारतीय बंदरगाह पर हथियारों को पहुँचाया जा सकता तो ब्रिटिश युद्ध हार जाते।”– चार्ल्स टेगार्ट

दुलरिया और गार्डन रीच की डकैतियों के बाद अंग्रेज़ सरकार द्वारा यतींद्र के नाम से इश्तिहार छपने लगे। यतींद्र को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने वाले को ईनाम देने की घोषणा की गई। यतींद्र द्वारा सियालदाह के करीब आर्य निवास में क्रांतिकारी सदस्यों की एक बैठक बुलाई गई। यतींद्र ने अपने सबसे बड़े अभियान; अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सरे-आम सैनिक विद्रोह यानी ‘हिंदू-जर्मन प्लॉट’ के लिए यह बैठक बुलाई थी।

यतींद्र ने क्रांतिकारियों को संबोधित करते हुए कहा– “यह मुहिम हमारे लिए सबसे बड़ी और अंतिम है। अंतिम इसलिए क्योंकि या तो हम विजयी होंगे या मारे जाएँगे। लेकिन दूसरा विकल्प तब सामने आएगा जब मुहिम ही शुरू न की गई हो। इस सैनिक विद्रोह की मुहिम शुरू होने के पश्चात अंग्रेज़ों के पास यहाँ से भागने के अलावा और कोई विकल्प न बचेगा।”

सभा के एक सदस्य ने टोकते हुए कहा– “लेकिन यतींद्र दा फिलहाल हमारे कई साथी पकड़े गए हैं। पिंगले बमों की संदूक के साथ पकड़े गए हैं और रास बिहारी बोस को जापान की ओर रवाना होना पड़ा। अगर ऐसे में…..” यतींद्र ने बात काटते हुए कहा– “ऐसे में नहीं तो फिर कैसे में। अब अगर-मगर जैसी चीज़ों के लिए हमारी सभा में कोई स्थान नहीं। इससे अच्छा मौका अब नहीं मिल सकता। रासबिहारी बोस और पिंगले के न होने से हमारी बनी हुई रणनीतियों में कोई फ़र्क़ नहीं आना चाहिए।”

मनोरंजन सेन– लेकिन यतींद्र दा आगे की क्या सोची है? आख़िर हमारा प्लान क्या होगा?” यतींद्र– “उसके लिए मैंने सब सोच लिया है। अब सब ध्यान से सुनें।

सितंबर 1915 में ‘मवेरिक’ नामक जर्मन जहाज़ उड़ीसा में बालासोर के तट पर उतरेगा। उसमें पर्याप्त युद्ध की सामग्री होगी। हममें से कुछ लोग मार्च के महीने में ही बालासोर पहुँचेंगे। वहीं थोड़ी दूर ही मालदीव में एक आश्रम है। मैं साधु का वेश धारण करके वहाँ रहूँगा। मनोरंजन सेन और चित्तप्रिय मेरे शिष्य बनकर मेरे साथ रहेंगे। वहीं थोड़ी दूर तालडीह नाम के गाँव में नरेंद्रनाथ दास और चंद्रपाल खेती बाड़ी के काम में लिप्त रहेंगे।

हमारे अन्य साथी ‘यूनिवर्सल इम्पोरिअल’ नाम से साईकल और घड़ी की दुकान खोलकर वहाँ एकजुट रहेंगे। हमारा काम होगा बालासोर से जहाज़ के तमाम हथियारों को एक सुरक्षित जगह पहुँचाना। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिंगापुर, आगरा, लाहौर, फिरोज़पुर, रंगून, मेरठ और बनारस इत्यादि जगहों पर हमारे सिपाही तैयार हैं। हथियारों को बरामद करने के बाद अंग्रेज़ों और हमारा खुलकर सामना होगा। इसमें कोई दुविधा? सब तैयार हैं?”

सबने एक साथ हामी भरते हुए कहा– “हम तैयार हैं।”
यतींद्र ने तेज़ आवाज़ में आक्रोश के साथ कहा– “अमरा मोरबो जगत जागबे।” और सबने एक साथ हुँकार भरी– “अमरा मोरबो जगत जागबे…..अमरा मोरबो जगत जागबे….!

यतींद्र कुछ पल सभा के बीच शांत रहा और फिर सभी को संबोधित करते हुए कहा– “आप सबसे एक दरख़्वास्त है। अगर मैं युद्ध लड़ता हुआ शहीद हो जाऊँ तो मेरे बाद मेरे परिवार की देख-रेख आप लोगों पर ही निर्भर होगी। क्या यह एक वादा आप मुझसे कर सकते हैं?”

यह बात कहते हुए यतींद्र की आँखों में आँसू भरे हुए थे पर छलकते न थे। जाने कितने पत्थरों को पिघलाकर वे आँसू अपने आकार को स्थिर करने में समर्थ रहे होंगे। और इस तरह यतींद्र के सारे आँसू उसकी आँखों की पुतलियों पर जम गए। यतींद्र ने अपने आप को संभाला। सभी साथियों ने यतींद्र को आश्वासन देते हुए ‘बाघा यतींद्र’ की जय-जयकार का आह्वान किया। सभा समाप्त हुई और सभी क्रांतिकारी दल इस मुहिम की तैयारी में जुट गए।

उड़ीसा के लिए यतींद्र, नरेन, मनोरंजन, चित्तप्रिय और यतीश ट्रेन के एक कम्पार्टमेंट में बैठे हुए थे। यतींद्र के चेहरे पर सुकून था जैसे यतींद्र का स्वप्न उसके बगल में बैठकर उसके साथ ही सफ़र कर रहा हो। पाँचों क्रांतिकारी अपने ख़यालों में खोए हुए थे। इतने में कुछ एंग्लो-इंडियन यात्री कम्पार्टमेंट में चढ़े और उनमें से एक ने नरेन और चित्तप्रिय से कहा– “उठो यहाँ से, यहाँ हम बैठेंगे।”

नरेन ने आँखें उठाई और उन्हें घूरने लगा। दूसरे यात्री ने कहा–“घूर क्या रहा है? सुनाई नहीं देता, उठ यहाँ से।” इससे पहले कि नरेन और चित्तप्रिय अपने आवेश को नियंत्रण से बाहर करते यतींद्र ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया और उन एंग्लो-इंडियन यात्रियों से कहा–

“कृपया आप शांत रहें। यह तो हमारा कर्तव्य है कि जहाँ आप बैठने का हुक्म करें, हम उसका पालन करें। हमारा क्या है हम तो एक ही जगह सिमट कर सारे बैठ जाएँगे। आप बैठिये। तुम दोनों देख क्या रहे हो? उठो और साहब को बैठने दो।”

यतींद्र के साथियों को एक पल को विश्वास न हुआ कि यह बात यतींद्र ही उनसे कहा रहा है। नरेन और चित्तप्रिय वहाँ से उठकर बाकी साथियों के साथ जा बैठे। कुछ समय बाद वे एंग्लो-इंडियन यात्री उस कम्पार्टमेंट से उतर गए। तब यतींद्र ने गर्म लहजे में कहा–

“क्या तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि इनके चक्कर में कैसा बखेड़ा खड़ा हो सकता था।। बंगाल पुलिस हमारी तलाशी में लगी हुई है और हम हैं कि ज़रा-ज़रा-सी बात को लेकर उत्तेजित होने लगते हैं। मैं चाहता तो अकेला ही इन चारों को कंपार्टमेंट से बाहर फेंक सकता था। लेकिन हमें फिलहाल इन बखेड़ों से दूर रहना है। हमारा स्वप्न बहुत नज़दीक है और मैं नहीं चाहता कि हम अपनी मूर्खताओं से उसको बर्बाद कर दें।”

नरेन– “क्षमा करना यतींद्र दा अबसे ऐसी मूर्खता नहीं होगी।”
उड़ीसा पहुँचकर योजना के अनुसार सब अपने अपने व्यापार और वेश धारण कर अपने काम में जुट गए। दिन बीत रहे थे और क्रांतिकारियों की उत्तेजना तीव्र होती जा रही थी।

एक दिन यतींद्र के पास एक पत्र पहुँचा। यतींद्र ने उत्सुकता वश पत्र खोला और पढ़ना शुरू किया– “30,000 राइफ़लें, डेढ़ करोड़ कारतूस और लाखों रुपये लेकर कुछ दिनों में जहाज बालासोर पहुँचने वाला है। सभी तैयार रहें।”

दूसरी तरफ़ ‘विक्टर वोस्का’ जो कि अमरीका का सीक्रेट इंटेलिजेंस ऑफिसर था, वह यतींद्र और उसके साथियों के ‘हिंदू-जर्मन प्लॉट’ के बारे में पड़ताल कर रहा था। उसके द्वारा इस प्लान की खबर अमरीका पहुँची, अमरीका से इंग्लैंड और इंग्लैंड से भारत।

यतींद्र इस दौरान ‘कपटीपाड़ा’ में था। उसके साथियों ने उसे वहाँ से निकलने को कहा। क्योंकि बंगाल की मिलिट्री फ़ोर्स यतींद्र को ढूंढते-ढूंढते यूनिवर्सल इम्पोरिअल में पहुँच चुकी थी। और वहाँ से उन्हें पता चला कि यतींद्र और उसके साथी कपटीपाड़ा में मौजूद हैं।

बालासोर और बंगाल की मिलिट्री फ़ोर्स कपटीपाड़ा के लिए रवाना हुई। यतींद्र के साथ मनोरंजन सेन और चित्तप्रिय थे। यतीश और बिरेन भी उन तीनों के साथ हो लिये। पाँचों ने वहाँ से जंगलों के रास्ते से होकर कपटीपाड़ा से निकलना ठीक समझा। पूरे तीन दिनों तक वे जंगलों में कीचड़ों से लथपत भटकते रहे।

कलेक्टर किल्वी ने जंगलों में हाथियों की मदद से उन्हें ढूंढना शुरू किया। पूरे उड़ीसा में ये खबर पहुँचा दी गई कि यतींद्र और उसके साथियों को पकड़ने वाले को मुँह मांगा ईनाम दिया जाएगा। तीन दिन बाद यतींद्र और उसके साथियों की मुठभेड़ किल्वी के नेतृत्व में उसकी मिलिट्री फ़ोर्स से हुई।

यतींद्र और उसके साथियों पर गोलियाँ बरसाई जा रही थीं। चित्तप्रिय ने आगे बढ़कर एक अंग्रेज़ पर गोली चलाई लेकिन उसी क्षण चित्तप्रिय के सीने में एक गोली जा लगी। यतींद्र ने उसे अपने हाथों में थामते हुए अंग्रेज़ों से मुठभेड़ जारी रखी। सवा घंटे तक अंग्रेज़ों और यतींद्र द्वारा यह संघर्ष जारी रहा।

इस मुठभेड़ के चलते यतींद्र के पेट पर गोली जा लगी। यतींद्र अब समझ गया कि इस जद्दोजहद से अब कोई फ़ायदा नहीं। उसने मनोरंजन सेन और अपने अन्य साथियों को सफ़ेद कपड़ा दिखाते हुए शांति की घोषणा की। यतींद्र ने मनोरंजन को पानी लाने के लिए कहा।

इतने में किल्वी ने अपनी टोपी में पानी भरकर यतींद्र को पिलाया। इसके बाद यतींद्र व उसके साथियों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। यतींद्र की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। चित्तप्रिय दम तोड़ चुका था। जिस दौरान यतींद्र को होश आया तब किल्वी, चार्ल्स टेगार्ट, व अन्य अधिकारी वहाँ मौजूद थे।

यतींद्र ने किल्वी से कहा–“मेरी आपसे एक प्रार्थना है। इन सबके पीछे सिर्फ़ मेरा हाथ था। इसकी सज़ा केवल मुझे मिलनी चाहिए। मेरे अन्य साथियों को छोड़ दिया जाए। ये सब तो बच्चे हैं। इन्हें मैं जैसा कहता हूँ ये तो वैसा ही करते हैं। याद रखें ये सब निर्दोष हैं, सज़ा सिर्फ़ मुझे दी जाए।”

यतींद्र की यह बात सुनकर किल्वी ने उसके प्रति एक सम्मान का भाव महसूस करते हुए कहा– “यू आर अ वॉरियर। बट यू डिड फ़ॉर योर कंट्री वुड डेफिनेटली बी रिमेम्बर्ड, हू हैज़ वोन इन द वॉर इट डज़ नॉट मैटर, बट द मोस्ट इम्पॉर्टेन्ट थिंग इज़ डेट; हू मेड अ ग्रेट सैक्रिफाइस टू बिकम अ विक्टोरियस। एंड यू डिड इट।”

चार्ल्स टेगार्ट ने यतींद्र से कहा –“तुम्हारी कोई आख़िरी इच्छा?”
यतींद्र ने मुस्कुराते हुए कहा– “वह आप पूरी नहीं कर सकते।” और यह कहते हुए यतींद्र ने अपनी आँखें बंद कर लीं और जलती हुई मशाल धीरे-धीरे बुझने लगी।