राजनीति
यासीन मलिक के आजीवन कारावास पर क्यों बेचैन हुआ पाकिस्तान

कहावत है कि खुद का घर संभलता नहीं, चले हैं दूसरे को नसीहत देने! पाकिस्तान का भी कुछ ऐसा ही हाल है। कश्मीर के सबसे प्रमुख अलगाववादी नेताओं में से एक और पाकिस्‍तान-परस्त यासीन मलिक को आतंकी फंडिंग मामले में दिल्ली की एनआईए न्यायालय द्वारा उम्रकैद की सज़ा क्या सुनाई गई, पाकिस्तान में खलबलाहट मच गई है।

मलिक को सजा यहाँ हुई, लेकिन इसका दर्द पाकिस्तान में बैठे कुछ हुक्मरानों और सेलेब्रिटीज़ को हुआ है। राजनीतिक नेतृत्व से लेकर सैन्य कमान तक सभी के अंदर यासीन की सजा को लेकर बेचैनी देखने को मिल रही है। पर आखिर इस बेचैनी का सबब क्या है?

अलगाववादी यासीन को सजा की खबर आग की तरह चारों तरफ फैल गई। देश-विदेश, हर तरफ इसकी चर्चा जोर-शोर से होने लगी। सोशल मीडिया पर यह एक ट्रेंडिंग टॉपिक बन गया। एक तरफ भारत ने अपने एक गुनहगार को सज़ा सुनाई तो दूसरी तरफ इसकी प्रतिक्रिया पाकिस्तान में देखने को मिली। पाकिस्तान को भारत का यह निर्णय चुभने लगा।

चुभे भी क्यों नहीं, पाकिस्तान आखिर आतंकियों और अलगाववादियों का पैरोकार जो है। पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व से लेकर क्रिकेट खिलाड़ियों और यहाँ तक कि सैन्य कमान ने अपना-अपना राग अलापा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी एक ट्वीट किया और भारतीय लोकतंत्र और उसकी न्यायप्रणाली पर ही प्रश्न उठाने की हिमाकत कर बैठे।

यही नहीं, उन्होंने यासीन मलिक को बहादुर स्वतंत्रता सेनानी की भी संज्ञा दी। अब कोई इनसे जाकर बस इतना पूछे कि भाई यासीन मलिक कब से स्वतंत्रता सेनानी हो गया? बात इतने पर ही नहीं रुकी। हाल ही में पाकिस्‍तान के विदेश मंत्री बने बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने इसकी निंदा करते हुए कहा कि इस संघर्ष में पाकिस्तान हर संभव मदद करता रहेगा।

पिछले दिनों बिलावल भुट्टो ने राष्ट्र मानवाधिकार के उच्चायुक्त मिशेल बाचेलेट को पत्र भी लिखा था, जिसमें यासीन मलिक को सभी आरोपों से बरी करने का आग्रह करने के लिए कहा था। बिलावल ने इस्लामिक देशों के संगठन, ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के महासचिव हिसेन ब्राहिम ताहा को भी पत्र लिख कर कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाया है।

इमरान खान ने भी सोशल मीडिया का सहारा लेते हुए यासीन मलिक की सज़ा का विरोध किया। ऐसे में पाकिस्तानी सेना भला कैसे पीछे रह जाती। सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने यासीन पर लगाए गए आरोपों को मनगढ़ंत कहा।

इमरान खान सरकार में सूचना मंत्री रहे चौधरी फवाद हुसैन ने तो मलिक को अपना हीरो बताते हुए उसे मिली सज़ा की निंदा की, और कहा कि यासीन मलिक हमेशा हमारे हीरो रहेंगे। इससे भी पेट नहीं भरा तो पाकिस्तान के विदेश विभाग ने भारत के प्रभारी उच्चायुक्त को बुलाकर अपना कष्ट बयान करते हुए विरोध दर्ज करा दिया।

साथ ही साथ, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए भारत पर दबाव बनाने को कहा। गौरतलब है कि यासीन मलिक पर कई गंभीर दोष सिद्ध हुए हैं।

आपराधिक षड्यंत्र रचने, देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, कश्मीर में शांति भंग करने और साथ ही साथ अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्तता के कारण ही यासीन मलिक को सज़ा मिली है। यासीन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) की धारा 16 (आतंकवादी अधिनियम), 17 (आतंकी फंडिंग), 18 (आतंकी गतिविधि की साजिश), यूएपीए की धारा 20 (एक आतंकवादी संगठन का सदस्य होने के नाते) और भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और 124-ए (देशद्रोह) के आरोप थे, जिसे यासीन ने न्यायालय के सामने खुद स्वीकार किया।

इतना ही नहीं, यासीन पर जम्मू-कश्मीर के युवाओं को आतंकवाद हेतु उकसाने, एयरफोर्स के कई अधिकारियों की हत्या और हाफिज़ सईद जैसे आतंकवादी से लिंक होने के भी आरोप हैं। मज़े बात यह है कि पाकिस्तान जो कि खुद आतंकवाद की शरणस्थली के रूप में पूरे विश्व में जाना जाता है वह लोकतंत्र, मानवाधिकार, मानवीय अवस्था पर चिंतन जैसे मुद्दों की बात कर रहा है।

पूरा विश्व पाकिस्तान संचालित आतंकवाद से वाकिफ है। बलोचिस्तान में दशकों से होते आ रहे मानवाधिकार के उल्लंघन को ठीक करने के बजाय भारत की तरफ उंगली उठाना, पाकिस्तान को वैश्विक समुदाय के सामने हँसी का ही पात्र बना रहा है।

आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद(यूएनएचआरसी) में गैर-सरकारी संगठन के प्रतिनिधि जमील मकसूद ने यूरोपीय संघ को लिखे अपने पत्र के माध्यम से पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बल्तिस्तान के लोगों की दुर्दशा और मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताई थी।

इस पर यूरोपीय संघ ने संज्ञान भी लिया था। इसी साल भारत ने भी यूएनएचआरसी में आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को जमकर लताड़ लगाई थी। दरअसल, पाकिस्तान को दर्द इस बात का है कि अगर मोदी सरकार यूँ ही आतंकवाद पर नकेल कसती रही तो वोह अपने नापाक मंसूबों में सफल नहीं हो पाएगा और भारत को अस्थिर करने का उसका स्वप्न धरा का धरा रह जाएगा।

संभवतया पाकिस्तान इसी बहाने अपने देश में चल रही आतंकवादी गतिविधि,राजनीतिक स्थिरता, आंतरिक कलह, आर्थिक तंगी, भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी भटकाना चाहता हैं। समय की मांग है कि पाकिस्तान अपनी परिस्थितियों से चेते, अन्य दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के हालात से सबक ले, सफल एवं सकारात्मक रुख वाले राष्ट्रों से सीख ले, वरना वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान टूट कर बिखर जाएगा।

डॉ मुकेश कुमार श्रीवास्तव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली में वरिष्ठ सलाहकार हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।