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मोदी-जिनपिंग की भेंट से भारत और चीन को क्या आर्थिक और कूटनीतिक लाभ मिलेंगे

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का दो दिवसीय भारत दौरा खत्म हो चुका है। भारत के ऐतिहासिक शहर मामल्लपुरम में हुए इस अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर चर्चा हुई। हालाँकि दोनों देशों के राष्ट्र-प्रमुखों के बीच हुई इस बैठक के बाद कोई आधिकारिक प्रस्ताव जारी नहीं हुआ है।

बैठक के बाद भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेसवार्ता में बताया कि दोनों नेताओं ने विदेश नीति को स्वायत्त बनाने एवं द्विपक्षीय संबंधों को किसी तीसरे देश के विचारों एवं दृष्टिकोण से स्वतंत्र रखने की ज़रूरत भी स्वीकार की।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों में दोनों नेताओं ने बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की और विश्व व्यापार संगठन में सुधारों, जलवायु परिवर्तन के प्रयासों एवं संयुक्त राष्ट्र में सुधार के बारे में बात हुई।

दोनों नेताओं के बीच अफगानिस्तान के मसले पर भी चर्चा हुई। अफगानिस्तान वर्तमान में अमेरिका और तालिबान के बीच चल रहे द्वंद से परेशान है। अमेरिका ने पिछले दिनों ही अफगानिस्तान के उस प्रस्ताव को ठुकराया था, जिसमें अमेरिकी सैनिकों को वापस करने की बात कही गई थी।

इससे पहले, जिनपिंग के दौरा से पूर्व दोनों देशों की कंपनियों के बीच 129 प्रस्तावों पर समझौता (एमओयू) हुआ था। इनमें मुख्य रूप से कृषि, जल, कपड़ा और खाद्य पदार्थ शामिल हैं। इसके साथ ही दोनों देशों ने व्यापार और निवेश बढ़ाने पर ज़ोर दिया।

भारत और चीन के बीच विनिर्माण क्षेत्र के विकास पर भी चर्चा हुई। चीन और भारत परस्पर सहयोग से उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ज़ोर देंगे। इससे दोनों देशों में उत्पन्न रोजगार समस्या का निदान निकाला जा सकता है।

जिनपिंग और मोदी की भेंट में रक्षा क्षेत्र में सुधारों पर भी बातचीत हुई। जल्द ही भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह चीन दौरे पर जा सकते हैं। दोनों देशों के बीच डोकलाम सहित कई सीमा विवाद हैं, जिसके कारण अनेक बार सैन्य विवाद की खबरें सामने आती रहती हैं। जिनपिंग दौरे के बाद माना जा रहा है कि दोनों देशों के सेना एक साथ सैन्य अभ्यास कर सकते हैं।

भारत और चीन के राष्ट्र-प्रमुखों के इस मुलाकात में दोनों देशों के पर्यटन विकास पर भी चर्चा हुई। भारत ने मानसरोवर यात्रा में आ रहे व्यवधानों की ओर चीन का ध्यान आकृष्ट किया, जिसके बाद चीन के राष्ट्रपति ने इसका हल ढूँढने की बात कही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु और फुचियान प्रांत के बीच संबंध बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया‌। फुचियान में हाल ही में तमिल कलाकृतियाँ खोजी गई थीं।

दोनों देशों के राष्ट्र-प्रमुखों की मुलाकात को चीन के सरकारी समाचार-पत्र ने अहम बताया है। चीनी मीडिया ने इस भेंट से दोनों देशों में आर्थिक सहयोग बढ़ने की बात पर कहा है कि चीनी कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में भारत के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हुए निवेश में वृद्धि की है। वहीं भारतीय कंपनियों का भी चीन में निवेश बढ़ा है। इस दौरे के बाद इसमें और बढ़ोतरी होने की संभावनाएँ है।

इसके साथ ही मोदी-जिनपिंग के इस वार्तालाप में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) का मुद्दा भी उठा। भारत ने चीनी राष्ट्रपति को आरसीईपी से होने वाले नुकसान के बारे में बताया, जिसके बाद चीन के राष्ट्रपति ने जल्द इसका हल ढूंढने की बात कही।

आरसीईपी के लागू होने से भारत की निर्यात व्यवस्था में कमी आएगी, जिससे व्यापार घाटा होने की आशंका है। भारत को चिंता है कि आरसीईपी लगने से भारतीय बाज़ार में चीनी वस्तुओं की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे उसके उत्पाद पर असर पड़ेगा।

इस वार्ता में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत यह रही कि चीनी राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 370 पर कोई चर्चा नहीं की। विदेश सचिव गोखले ने एक सवाल पर कहा कि बातचीत में जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। इस बारे में भारत का पक्ष चीन को पहले से ही पता है।