दुनिया / विचार
यूएस के साथ हमें मित्रवत्, परंतु लेन-देन वाला संबंध रखना होगा

अफगानिस्तान से अंकल सैम की अपयशपूर्ण और अशोभनीय वापसी ने न सिर्फ यूएस को महाशक्ति के रूप में काफी छोटा कर दिया है, बल्कि भारत जैसे अर्ध-सहयोगियों सहित उसके कई सहयोगियों के लिए समस्याएँ भी खड़ी कर दीं हैं।

सऊदी अरब, इज़रायल और ताइवान से लेकर दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत तक, सभी ने देख लिया होगा कि जब संकट आता है तो यूएस में टिकने की शक्ति नहीं है। जैसा कि स्वामीनाथन अय्यर ने पिछले माह एक स्तंभ में लिखा था, यूएस एक अविश्वसनीय सहयोगी है और अपने मुख्य हितों की रक्षा के लिए देशों को आत्मनिर्भर बनना होगा।

स्पष्ट है कि यदि चीनी ताइवान पर बलपूर्वक अतिक्रमण करेंगे तो यूएस कुछ विरोध करने के अलावा इस द्वीप राष्ट्र के लिए कुछ नहीं करेगा। उसी प्रकार, सऊदियों को स्पष्ट हो गया होगा कि यूएस सेना उन्हें वैसे ही त्याग देगी जैसे इसने ईरान के शाह के साथ किया था जब अयतोल्लाह होमैनी के नेतृत्व में इस्लामवादी शत्रुओं से उसका सामना हुआ था।

ध्यान दें कि अमेरिका के विरुद्ध जिहाद छेड़ने का ओसामा बिन लादेन का मुख्य उद्देश्य अमेरिका को सऊदी राजसी परिवार एवं सरकार को संरक्षण देने से दूर रखना था। बिन लादेन अमेरिका को ‘पवित्र भूमि’ से बाहर देखना चाहता था।

भारत के लिए यह परिवर्तन का समय है। हमें अपनी विदेश नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा क्योंकि हमारे पास एक या दो नहीं, बल्कि चिंता के तीन कारण हैं। चीन और पाकिस्तान के अलावा संभावना है कि तालिबान भारत में इस्लामवादी आतंकवादियों का सहयोग करेगा।

यदि वह कुछ नहीं भी करता है, तब भी तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में आ जाने व अन्य बलों से उसे समर्थन मिल जाने से इस्लामिक स्टेट- खुरासान प्रांत से लेकर लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान-आधारित आतंकी संगठन भारत पर ध्यान केंद्रित करने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं।

नरेंद्र मोदी की ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सरकार को शत्रु के रूप में दिखाकर भारतीय मुस्लिमों को कट्टरवाद की ओर ले जाने के प्रयास तेज़ होंगे। अफगानिस्तान से अमेरिका के जाने से पहले भी पड़ोस के और आंतरिक खतरों के बारे में हम जानते थे लेकिन अब इन तीन प्रश्नों के आधार पर हमारी नीतियाँ निर्धारित होनी चाहिए।

पहला, अमेरिका के साथ अब हम अपने संबंध को आगे कैसे ले जाएँ? दूसरा, तालिबान के साथ हम क्या करें? और तीसरा, यदि हमारे विरुद्ध खड़े तीन बलों में से दो हम पर हमला करते हैं तो वह कौन होगा जो हमारी सहायता करने में सर्वाधिक इच्छुक होगा?

लगभग 140 करोड़ जनसंख्या वाले हमारे बड़े देश को भारतीय भूमि पर किसी दूसरे के सैन्य सहयोग की आवश्यकता नहीं होगी लेकिन नौसेना, रसद, उपकरण और भौतिक सहयोग हमें इज़रायल, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वयं यूएस, रूस और जापान से मिल सकता है।

जहाँ तक हमारी यूएस नीति की बात है तो अब तक एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हमें अपने संबंध को लेन-देन वाला बनाना होगा जिसमें परस्पर हित निहित हों, न कि लोकतंत्र का वागाडंबर। अमेरिकी और भारतीय हित लोकतंत्र में साझे विश्वास के कारण नहीं, बल्कि चीन से साझे खतरे के कारण जुड़े हुए हैं।

चीन, भारत और यूएस के ध्वज

जब हम लेन-देन वाले संबंध की बात कर रहे हैं तो उसका अर्थ हुआ कि हम अमेरिकी हथियार खरीदेंगे या उनके साथ व्यापार सौदे करेंगे लेकिन उनसे जुड़े नहीं रहेंगे। जब यूएस हमें लोकतंत्र व समावेशिता पर उपदेश देगा तो वह मात्र गीदड़ भभकी होगी।

वे कहते रहें, हमें सुनने या प्रतिक्रिया देने की कोई आवश्यकता नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वे निर्धारित नहीं करेंगे कि हमें और किसका सहयोगी बनना है, अपने हितों को देखते हुए अपनी समझ के अनुसार हम संबंध बनाएँगे।

लघु अवधि के लिए इसका अर्थ हुआ कि रूस से हमारे मज़बूत रक्षा संबंध हों और ईरान से निकटतर वार्ताएँ हों क्योंकि तालिबान को नियंत्रित करने एवं पाकिस्तान और चीन पर ईरान की अत्यधिक निर्भरता कम करने में दोनों के कुछ साझे हित हैं।

दीर्घ अवधि में निरंकुश इस्लामवाद सभी के लिए खतरा है, चीन के लिए भी, लेकिन अभी तो वह अपनी गोद में आतंकवाद को पालकर भारत पर ध्यान केंद्रित करके प्रसन्न है। एक बात जिसका हमें प्रयास करना चाहिए, वह है यूएस और रूस का मेल-मिलाप सुनिश्चित करना, हालाँकि यह पूर्ण रूप से हमारे नियंत्रण में नहीं है।

जिस तरह से पाकिस्तान ने यूएस और चीन में एक महत्त्वपूर्ण बिचौलिए का काम किया है, उसी तरह एशिया और अफ्रीका की नई भू-राजनीतिक परिस्थिति के बीच यूएस और रूस के बीच एक युद्धविराम संधि की आवश्यकता है।

वर्तमान में एशिया में चीन का अत्यधिक प्रभुत्व है। जब बात स्वयं तालिबान की आती है, तब हमें अलग सोच की आवश्यकता है। अधिकांश मीडिया टिप्पणी सिर्फ इसपर बात कर रही है कि क्या तालिबान 2.0 तालिबान 1.0 से अधिक दयावान और शांत है।

लेकिन भारत को इससे फर्क नहीं पड़ता है। यूएस की तरह हमारे ऊपर एक समावेशी अफगानिस्तान बनाने का कोई दायित्व नहीं है। लेकिन हमें उनसे वार्ता करनी चाहिए यह देखने के लिए कि अपनी सीमाओं से बाहर आतंकवाद को जाने से रोकने में वे कितने सक्षम हैं।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति महल में तालिबान (15 अगस्त 2021)

यहाँ हम मानकर चल रहे हैं कि भले ही तालिबान चीन और पाकिस्तान के प्रति कृतज्ञ है लेकिन उसे उनका दास बनने की आवश्यकता नहीं है। जब इस्लामवाद फैलाने का प्रारंभिक उत्साह शांत हो जाएगा, तब वे उस देश का शासन करना चाहेंगे जिसे उन्होंने युद्ध से जीता है।

इसके लिए उन्हें चीनी और पाकिस्तानी हितों के साथ-साथ रूसी और भारतीय हितों को संतुलित करना होगा। कोई देश नहीं चाहता कि उसपर किसी और का नियंत्रण हो। तीसरे मोर्चे पर भारत की विदेश कूटनीति को दो बातों पर ध्यान देना चाहिए- व्यापार और रक्षा।

दोनों ही क्षेत्रों में हमें अधिक आत्मनिर्भरता और उदारीकरण की आवश्यकता है। इसका अर्थ हुआ कि अधिक से अधिक भारत की रक्षा आवश्यकताओं का भारत में विनिर्माण एवं भारत से बाहर आपूर्ति होनी चाहिए, भले ही लघु से मध्यम अवधि में हम सबसे विश्वसनीय विक्रेता से सैन्य उपकरण खरीदते रहें।

यूएस एक स्रोत हो सकता है यदि वह उपकरण आपूर्ति करने पर शर्तें न रखे। व्यापार में यदि हम चीनी आयात पर निर्भरता कम करना चाहते हैं तो हमें विदेशी कंपनियों को उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन देने से अधिक और कुछ करना होगा।

हमें धीरे-धीरे यूरोपीय संघ एवं अमेरिका के साथ व्यापार खोलना चाहिए जहाँ सेवाएँ भी भूमिका निभाएँगी। मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) सिर्फ वस्तुओं के लिए नहीं हो सकते, बल्कि सेवाओं के लिए भी होने चाहिए।

यदि हम चीनी आधिपत्य वाले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी का भाग नहीं हो सकते हैं तो हमें पश्चिमी व्यापार गठबंधन का भाग होना चाहिए, जब तक वह नियम-आधारित चलता है। हमने दो वर्ष कोविड से निपटने में गवा दिए हैं।

यदि हम 2030-32 तक 100 खरब (10 ट्रिलियन) डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहते हैं तो हमें अपने कूटनीति व व्यापार केंद्र पर पुनर्विचार करना होगा। चीन समस्या है। इस दशक में शी जिनपिंग के बाहर होने से चीन को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन तब तक भारत के लिए विश्व एक खतरनाक स्थान है। और शेष सभी के लिए भी ऐसा है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।