दुनिया
ट्रम्प का आईना- विरोधियों के नुकसान के लिए राजनेता उपयोग करेंगे जानकारी

आशुचित्र- ट्रम्प सही कह रहे हैं कि बहुत कम लोग ही ऐसी सूचना के उपयोग को अनैतिक समझते हैं जो उन्हें राजनीतिक या आर्थिक लाभ प्रदान करे और राजनेता तो बिल्कुल नहीं।

उनसे कोई कितनी भी घृणा करे लेकिन उनमें कहीं तो सत्यता है जो उन्होंने जस के तस यह कह दिया।

पिछले कुछ वर्षों से डॉनाल्ड ट्रम्प पर इस संदेह पर जाँच चल रही है कि उनकी टीम रूसी साइबर-जासूसों की सहायता से कुछ जानकारी प्राप्त की जिसके सहयोग से वे 2016 के राष्ट्रपति चुनावों को अपने पत्र में मोड़ पाए। उनके कुछ सहयोगियों ने इसे हिलेरी क्लिंटन की चाल बताई लेकिन ट्रम्प ने सादगी दिखाते हुए इसे कोई समस्या नहीं माना। बल्कि उन्होंने यह कहा कि कोई भी जानकारी जो उनके अभियान में सहायता करेगी, वे उसका उपयोग करेंगे।

एबीसी  के एक पत्रकार ने ओवल ऑफिस में ट्रम्प से उनके साथियों और रूसियों के बीच 2016 में ट्रम्प टावर में हुई बैठक के संबंध में पूछा जिसमें क्लिंटन को हानि पहुँचाने वाली जानकारी का प्रस्ताव मिला था। ट्रम्प ने कहा कि वे इसे स्वीकार करते और यूएस के राष्ट्रपति चुनावों में इसे विदेशी हस्तक्षेप नहीं मानते।

वे कहते हैं, “ये कोई हस्तक्षेप नहीं है, अगर उनके पास जानकारी है, मुझे लगता है मैं इसे स्वीकार करता।”, अपनी बात में वे आगे कहते हैं, “अगर मुझे लगता कुछ गलत है तो मैं एफबीआई के पास जाता , अगर मुझे लगता कि कुछ गलत है।”

भारत समेत कहीं भी शायद ही कोई राजनेता होगा जो ऐसी जानकारी से मना करेगी जिससे उसके विरोधी को हानि पहुँचती हो या ऐसा कुछ जो उन्हें चुनाव जीता सकता हो। बस यह है कि वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

शीत युद्ध के समय कई भारतीय राजनेताओं को सोवियत केजीबी वित्तीय रूप से पोषित करता था, यह बात मित्रोकिन आर्काइव्स नामक एक पुस्तक में बताई गई है जिसमें कांग्रेस पार्टी की इंदिरा गांधी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया से केजीबी के संबंध की बात है। वसीली मित्रोकिन एक सोवियत अधिकारी थे जो 1992 में देशद्रोह करके कई सोवियत जासूसों की जानकारी के साथ 1992 में ब्रिटेन चले गए थे।

मीडिया को भी विदेशी सूत्रों से कई स्वार्थपूर्ण जानकारी मिलती है और वे इसका उपयोग बिना इसकी परवाह किए करते हैं कि इससे किसको लाभ पहुँचेगा। इसी प्रकार विदेशी स्वार्थों, संभवतः सीआईए, के चलते भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को निशाना बनाया गया था जो यह चाहते होंगे कि भारत में क्रायोजेनिक इंजन के विकास को विलंबित किया जाए। 1994 में नारायणन और एक अन्य इसरो अधिकारी को केरल पुलिस ने इस आरोप पर गिरफ्तार किया था कि वे पाकिस्तान को क्रायोजेनिक इंजन की गुप्त जानकारी दे रहे थे। भले ही इस इंजन का निर्माण 2014 में हुआ लेकिन इसकी परवाह न पुलिस ने की न खुफिया एजेंसियों ने जिन्होंने इससे 20 साल पहले नारायणन को गिरफ्तार किया था।

निस्संदेह ही ट्रम्प सही हैं जब वे कहते हैं कि वे ऐसी सूचना के उपयोग को अनैतिक नहीं समझते हैं जो उन्हें राजनीतिक या आर्थिक लाभ प्रदान करे और एक राजनेता होने के नाते तो बिल्कुल नहीं।

मीडिया, जो इसी प्रकार की लीक हुई प्रेरित जानकारी से लाभ उठाती है, ने अपने सूत्रों से इसके पीछे निहित स्वार्थ के बारे में पूछना छोड़ दिया है। तो फिर क्यों वे सिर्फ ट्रम्प पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं कि वे नीतिहीन हैं?

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।