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विश्व हिन्दू कांग्रेस 2018 पर विरोध
विश्व हिन्दू कांग्रेस 2018 पर विरोध

प्रसंग
  • विश्व हिन्दू कांग्रेस को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘नर सेवा, नारायण सेवा’ के अपने मूल में रहकर काम करना चाहिए जिससे वह अपनी सफलता को लेकर निश्चिंत हो जाए

वामपंथियों और सामाजिक मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठाने वाले समूहों ने, विशेषकर सोशल मीडिया पर, धावा बोलने की तैयारी कर ली है, और अपनी पुरानी यादों को फिर से ताजा कर लिया है क्योंकि इस सप्ताह 7 से 9 सितबर को विश्व हिंदू कांग्रेस (विहिक) एक कार्यक्रम का आयोजन करने जा रहा है।

इस मामले में पहला विवाद तब सामने आया जब इस कार्यक्रम के आयोजन से ठीक एक महीना पहले #SJW की एक अमेरिकी शाखा ने माँग की थी कि विश्व हिन्दू कांग्रेस की महिला सदस्या तुलसी गबार्ड स्वयं को विश्व हिन्दू कांग्रेस के कार्यक्रमों से अलग कर लें और सार्वजनिक रूप से “हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों” से कोई नाता न रखें। ‘कारवां’ पत्रिका द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में, “ ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ माईनोरिटीज ऑफ इंडिया” नामक एक समूह के सार्वजनिक वक्ता पीटर फ्रेडरिच द्वारा आरएसएस को एक अमेरिकी संगठन ‘केकेके’ के समान बताने वाले बयान को प्रकाशित किया गया था। उसने दावा किया था कि हिन्दुत्व और सफेद राष्ट्रवाद के बीच में ज्यादा अंतर नहीं है, आरएसएस ने भारत में अपनी अच्छी पैठ बना ली है और यह भारत को  प्रभावित कर रहा है फिर “….केकेके संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में है।” इसके बाद उसने गबार्ड के प्रतिनिधि को चेतावनी देते हुए कहा था कि “भागवत के साथ रहना डेविड ड्यूक के साथ मंच साझा करने जैसा है।”

इन लोगों को पता है कि हिन्दुओं को कैसे दबाया जाए, इन लोगों को यह भी पता है कि हिन्दू और हिन्दुत्व रहित भारत के तलाश करने वालों को कैसे बढ़ावा देना है। यह लोग यह भी जानते हैं कि गबार्ड की लोकप्रियता को कैसे कम किया जाए, जो भगवत गीता पर शपथ लेने वाली अमेरिकी कांग्रेस की पहली महिला सदस्या हैं।

गबार्ड के ऑफिस से प्राप्त होने वाले पत्रों और ई-मेलों में यह दावा किया गया था कि वह विश्व हिन्दू कांग्रेस की अध्यक्षा नहीं थीं इसीलिए वह इस कार्यक्रम से किसी भी तरह से संबंधित नहीं हैं। वह विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में भाग लेने से इंकार करती हैं क्योंकि “कई पक्षपाती भारतीय राजनेता इस कार्यक्रम को संबोधित करेंगे जो विश्व हिन्दू कांग्रेस का संचालन कर रहे हैं…।” (पत्र डॉ. अभय अस्थाना, समन्वयक, विश्व हिन्दू कांग्रेस, 26 अप्रैल 2018  को प्रेषित)। गबार्ड काफी चालाकी से अपनी बात कहती हैं कि पक्षपाती राजनेता कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। वह न तो उनको पहचानती है और न ही हमें बता सकती हैं  वह किस प्रकार के राजनेताओं का विरोध करती है, क्योंकि सभी राजनेता पक्षपाती हैं।

अमेरिकी राजनीति के अत्यंत पक्षपातपूर्ण रवैये को देखते हुए, भारत और साथ ही अमेरिका में कई प्रतिभागियों ने स्वयं ही इस प्रकार के कार्यक्रम में आने की बात कही है, इस तरह से भारत के कुछ पक्षपातपूर्ण समूहों ने हिन्दू और हिन्दुत्व के आचरण वाले लोगों, समूहों और कार्यक्रमों में विध्न उत्पन्न किया है, उनको किस तरह के वक्ताओं को कार्यक्रम में आमंत्रित किए जाने की उम्मीद थी? वह जो हिन्दुत्व का विरोध करने वाले है? वह जो हिन्दुओं और उनकी भावनाओं को आहत करते हैं? वह जिन्होंने भारत को हिन्दुत्व से छुटकारा दिलाने के लिए अपने राजनीतिक जीवन में कड़ी मेहनत की है? अब जब खुद गबार्ड के ऑफिस से ऐसे संदेश मिल रहे हैं कि वह इस कार्यक्रम में भाग नहीं ले रही हैं तो क्या हिन्दुओं का विरोध करने वाले लोग यह दावा नहीं करेंगे कि गबार्ड ने स्वयं को विश्व हिन्दू कांग्रेस से दूर कर लिया है, क्योंकि वह दावा करती थीं कि यह एक पक्षपात पूर्ण कार्यक्रम है और ऐसा करने के लिए उन पर दबाव डाला गया है?

इस चुनावी माहौल में और लोकतांत्रिक पार्टियों द्वारा हाशिये पर रखने के बाद भी गबार्ड अपनी मनमानी कर रही हैं और उम्मीद कर रही हैं कि लोग उनकी इच्छा और क्रोध को नजरअंदाज कर दें। गबार्ड के लिए खुद को हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों से दूर कर लेना आसान है क्योंकि उनको पता है कि वे सुचारू रूप से चल रहे हैं। चलिए पुरानी बातों को भूलकर उन लोगों के साथ हाथ मिलाते हैं जो चुनाव प्रचार अभियानों में अपना पैसा लगाना जारी रखेंगे और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की राष्ट्रपति बनने की उनकी क्षमता पर लिखते रहेंगे। लेकिन शायद ऐसा नहीं हो सकता।

हम जानते हैं कि हिंदू विरोधी शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं के द्वारा फैलाईं गईं बेबुनियाद खबरें भारत में पाठ्यक्रम की तरह है, और इन शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं को कट्टर राजनेताओं द्वारा प्रेरित एवं वित्त पोषित किया गया है तथा लगातार भारत के विभाजन की मांग की योजनाओं और कार्यों को प्रस्तुत किया गयाहै। इन अभिनेताओं को मुख्यधारा / वामपंथी उदार मीडिया के साथ-साथ भारत, यूरोप और अमेरिका में शिक्षाविदों से भी बहुत अधिक लाभ और समर्थन प्राप्त हुआ है। जब मीरा कामदार जैसी लेखिका ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के संपादकीय विभाग का हिस्सा बनती हैं, या अपराध को बढावा देने वाली प्रोफेसर वेंडी डोनिगरया या पीएचडी धारक ऑड्रे ट्रुस्के शिकागो विश्वविद्यालय के पवित्र हॉल या स्टानफोर्ड या रुतगेर से संचालन करती हैं, तो यह देखना आश्चर्यजनक नही है  कि भारतीय मामलों पर समाचार पत्रों ने नकारात्मकता छापी और हिंदुओं पर पश्चिमी अकादमी से जिल्द का उभरता हुआ भडकाऊ पांडित्य ,उनकी आदतें, उनके मंदिर, उनकी महिलाएं, और उनकी संस्कृति पर छापा।

जब ऐसे लोग विवादों को न्यौता देते हैं तो अन्य इसे स्वीकार क्यूं नहीं करेंगे?और वास्तव मेंयदि कोई भी चुनौती स्वीकार करनाचाहता है,तो पिछले पांच वर्षों में प्रकाशित न्यू यॉर्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट और द लॉस एंजिल्स टाइम्स जैसे समाचार पत्रों यापश्चिमी शिक्षाविदों द्वारा उस समय से हिंदुओं / हिंदू धर्म / भारत के बारे में प्रकाशित किताबों,जब भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पार्टी के लिए एक व्यवहार्य राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी,का एक सामग्री विश्लेषण करना पड़ेगा। डिट्टो, बीबीसी और इसी तरह के कई अन्य ब्रिटिश समाचार पत्र के लिए काम करते हैं।

तो, इस याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले समूह कौन हैं कि गबार्ड खुद को विश्व हिंदू कांग्रेस से दूर कर रही हैं? इनमें निम्नलिखित शामिल हैं और इनमें से कुछ समूह / नए संघ होने का दावा करते हैं, लेकिन वे पुनर्वित्त और नामित इकाइयों से अधिक नहीं हैं जो पिछले तीन दशकों से संयुक्त राज्य अमेरिका में काम कर रहे हैं, यदि अधिक न हों तो:

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन, सैन फ्रांसिस्को, सीए (www.asata.org)

अम्बेडकर किंग स्टडी सर्किल, सैन जोस, सीए (www.akscusa.org)

भीम राव अम्बेडकर सिख फाउंडेशन, केंट, डब्ल्यूए (www.brasf.org)

शिकागो देसी यूथ राइजिंग (सीडीवाईआर), शिकागो, आईएल (www.chicagodesiyouthrising.wordpress.com)

शिकागो साउथ एशियन फॉर जस्टिस, शिकागो, आईएल

इंडिया सिविल वॉच, न्यूयॉर्क, एनवाई

इंडियन- अमेरीकन मुस्लिम काउंसिल, बोस्टन, एमए (www.iamc.com)

ऑर्गनईजेशन फॉर मिनोरिटिस ऑफ इंडिया (www.ofmi.org)

पेरियार अम्बेडकर स्टडी सर्कल-अमेरिका, सैन जोस, सीए (www.pascamerica.org)

साधना: आ कोलिशन ऑफ प्रोग्रेसिव हिंदुज, न्यूयॉर्क, एनवाई(www.sadhana.org)

सिख इन्फॉर्मेशन सेंटर, स्टॉकटन, सीए (www.sikhinformationcentre.org)

और इन समूहों में केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एजेंडा और संघ के प्रति हिंदुत्व के शास्त्र के खिलाफ ही आक्रोश नहीं है, बल्कि उनके लक्ष्य पर पूर्ण हिंदुत्व और सभी हिन्दू हैं। उनके काम एवं विचारधारा, उनके कार्यक्रमों और प्रकाशनों, उनके संबद्धताओं एवं नेटवर्कों का विश्लेषण एक अज्ञात लेखक द्वारा किया गया है, जिन्होंने सावधानीपूर्वक उपलब्ध स्रोतों की जांच की और उसकी गणना की। यहां उनके विस्तीर्ण परिणाम को नाम दिया गया, “रेत का घर: जनसंहार के खिलाफ गुटबंदी और पक्षपाती राजनीति,” और यहाँ, अच्छे दोस्त के द्वारा, जो तेज है, “फोइले”र्स के ब्लेड की तरह तेज निकासी उन सभी के लिए  ज़रूरी है जो भारत को निराशाजनक मानते चाहते हैं।

जो लोग इन समूहों के काम करने के ढंग और इसके संस्थापकों, नेताओं और प्रमोटरों की संबद्धताओं का विश्लेषण करने में कुछ समय और ऊर्जा खर्च करने के इच्छुक हैं, उन्हें इन दो ऑनलाइन स्त्रोतों का गुप्त खजाना प्राप्त होगा। “दक्षिण एशियाई” समूह ने हिंदू-अमेरिकियों को बहुत लंबे समय तक बैकफुट पर रखा है, और वे 6 सितंबर को न्यूयॉर्क शहर में फिर से ऐसा करने की कोशिश करेंगे, जैसा कि हिंदुओं को अभी तक भारत और दुनिया भर में अपने स्वीकृत दुश्मनों से लड़ने का कोई रास्ता नहीं मिला है- केवल इस तथ्य के कारण कि हिन्दू और हिन्दू सिद्धांत, विविधता को प्रोत्साहित करते हैं और स्वीकार करते हैं; ज्यादातर हिंदू धर्मनिरपेक्ष नहीं है; हिंदू और हिंदू धर्म भगवान और सत्य पर एकाधिकार का दावा नहीं करता; और हिंदुओं ने इसे हिंदू विश्व बनाने के लिए अपना एजेंडा नहीं बनाया है जैसा कि ईसाईयों ने दुनिया को ईसाई बनाने की मांग की है, मुसलमानों ने दुनिया को मुस्लिम बनाने की मांग की है, या कम्युनिस्टों / समाजवादियों ने दुनिया को लाल या गुलाबी रंगों में बदलने की मांग की है।

इस अल्पकालीन समीक्षा का उद्देश्य गबार्ड को दी गई याचिका के ग्यारह हस्ताक्षरकर्ताओं में से प्रत्येक पर नजर रखना और स्पष्ट व्याख्या करना नहीं है। लेकिन यह जरूरी है कि हम उनमें से कुछ की थोड़ी सी तहकीकात करें, क्योंकि उनका एजेंडा “भारत को बिखेरने” के लिए राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन के शब्दों का उपयोग करना है।

इसलिए, यहाँ पर ग्यारह सूचीबद्ध संगठनों में से कुछ के अतीत, पृष्ठभूमि और संबद्धताओं का एक प्रतिरूप है।

हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची में पहला “एलाईंस ऑफ टेकिंग ऐक्शन (एएसएटीए) का गठबंधन” है। हाउस ऑफ कार्ड्स के लेखक निम्नलिखित टिप्पणी करते हैं-

“एएसएटीए के एक करीबी परीक्षण से पता चलता है कि यह अब भी एफओआइएल (भारतीय वामपंथी समूह/इंकलाबी वामपंथी समूह) का एक अंग है। वास्तव में यह जोशीली युवा एकजुटता और संगठनकारी युवाओं का एक नया अवतार है।”

“संक्षेप में, एएसएटीए और बीएएसएस का नेतृत्व करने वाले कार्यकर्ताओं ने न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को और अन्य स्थानों पर कट्टरपंथी वामपंथी कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षण लिया है। इन कार्यकर्ताओं ने अब दक्षिण एशियाई युवाओं की एक नई पीढ़ी के बीच एफओआईएल के कट्टरपंथी वामपंथी विचारों का विस्तार करने के लिए एएसएटीए का गठन किया है। इस तरह की सक्रियता, जैसा कि यहाँ एफओआईएल के तहत उदाहरण सहित दी गई है, में हिंदूवाद-जाति-जातिवाद के रूप में त्रुटिपूर्ण तथा अपमानजनक विचार और इस तरह की धारणा शामिल है कि दक्षिण एशिया (भारत) में सभी डरावने कृत्य “हिंदू हिंसकों” के कारण होते हैं।

इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी), जो कि सूची में छठे स्थान पर है, पर हाउस ऑफ कार्ड्स के लेखक ने व्याख्या की कि शईक उबैद आईएएमसी के संस्थापक सदस्यों में से एक था जो आतंकवादी संगठनों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था। एक अन्य संस्थापक सदस्य, उमर खलीदी था जो अमेरिका, यूरोप और भारत में विभिन्न मंचों  पर लंबे समय से भारत और हिंदुओं के बारे में अपने पक्षपातपूर्ण विचारों का व्यापक रूप से प्रसार कर रहा था।

हर हफ्ते या 15 दिनों में आईएएमसी के यहाँ से ईमेल जाते हैं जो अविश्वासी पठन पर होते हैं क्योंकि इस समूह में हर तरह के अपराध तथा पीड़ितों के रूप में मुसलमान शामिल हैं और यह इसका दोषारोपण कुछ रूढ़िवादी/हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों या समूहों पर करने का प्रयास कर रहा है। यहाँ,  शिकायतों जैसी एक सतत श्रृंखला संभव है क्योंकि मुस्लिमों पर कथित हमलों को उजागर करने और हिंदुओं के खिलाफ या अन्य समूहों के खिलाफ मुसलमानों द्वारा किए गए अपराधों को छिपाने में भारत में अंग्रेजी मीडिया की भी एकसमान भागीदारी है।

यह समन्वित मुहिम एक पेशेवर और रणनीतिक फैशन के रूप में चलाई जाती है, फिर पाश्चात्य मीडिया और/या कांग्रेस के प्रतिनिधियों या सभासदों (सीनेट के सदस्यों) या अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता (यूएससीआईआरएफ) पर आधारित संयुक्त राज्य आयोग द्वारा इस पर फिर चर्चा की जाती है। इसके बाद कांग्रेस की सुनवाई या यूएससीआईआरएफ की वार्षिक रिपोर्ट में इसे बढ़ावा मिलता है। इन रिपोर्टों को फिर से भारत और नरेंद्र मोदी सरकार में “रूढ़िवादी / हिंदू राष्ट्रवादी” समूहों के खिलाफ ताजा साक्ष्य के रूप में फिर से प्रस्तुत किया जाता है।

अम्बेडकर किंग स्टडी सर्कल 2016 में स्थापित एक रोचक समूह है। यह संदेहास्‍पद है कि अम्बेडकर, जिनकी मृत्यु 1956 में हुई, मार्टिन लूथर किंग जूनियर के बारे में बहुत कुछ जानते थे। लूथर 1954 में केवल नागरिक अधिकार आंदोलन के कारण लोकप्रिय हुए थे या उन्होंने अम्बेडकर और उनके कार्यों का विश्लेषण किया था। तमिल प्रवासी (यहाँ देखें) सदस्यों वाले उनके कार्यकारी नेतृत्व के साथ हम अनुमान लगा सकते हैं कि उनके संविधान के अनुच्छेद III में निम्नलिखित कथन क्यों शामिल है:

वर्ग, वंश, जाति, लिंग और विश्वव्यापी स्तर पर धार्मिक उत्पीड़न जो कि भारतीय लोगों में विशेष रूप से है, के मामले में संगठित राज्यों में लोगों को संवेदनशील और शिक्षित बनाने के लिए हॉल मीटिंगों, विरोध प्रदर्शनों और जुलूसों में भाग लें।

ऐसा लगता है कि “अध्ययन मंडल” एक स्पष्ट वामपंथी/कम्युनिस्ट एजेंडा और पृष्ठभूमि है क्योंकि वे लोग सहयोगी (कामरेड/काम )उपसर्ग का उपयोग उन वक्ताओं को संदर्भित करने के लिए करते हैं जिन्हें वे संबोधित करने के लिए आमंत्रित करते हैं। उनके 2018 के सम्मेलन में आमंत्रित वक्ताओं में से एक विवादास्पद सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेटलवाड़ हैं जो डब्ल्यूएचसी के समकालीन हैं और जिन पर उनके संगठन द्वारा धन गबन करने का आरोप लगाया जा चुका है जो कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान पीड़ितों के लिए था। यहाँ पर एक बार फिर हम साथी यात्रियों और सह षड्यंत्रकारियों के दोषपूर्ण दायरे को देखते हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य निर्वाचित सरकार में योजनाबद्ध तरीके से उथल पुथल करके धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचानों के आधार पर भारत का विभाजन करना है।

भीम राव अम्बेडकर सिख फाउंडेशन केवल एक कागजी संगठन प्रतीत होता है क्योंकि brasf.org या ambedkarsikh.org को सर्च करने पर यह उपयोगकर्ता को  एक ऐसी साइट पर ले जाता है जिस तक पहुँचा नहीं जा सकता है। एक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सिख फाउंडेशन, चैरिटी नेविगेटर साइट पर सूचीबद्ध, जो गैर-लाभकारी / दान संगठनों की निगरानी और मूल्यांकन करती है। साइट दिलचस्प जानकारी प्रदान करती है:  2015 में स्थापित होने के बाद से इस 501 (3) (सी) संगठन ने शून्य डॉलर की वृद्धि की, इसके पास शून्य डॉलर की संपत्ति है और ऐसा लगता है कि यह संगठन अपनी राजनीतिक गतिविधियों को छिपाने से ज्यादा कुछ नहीं है।

जैसा कि इस संगठन ने मिलकर उन लोगों पर वार और उन्हे गंदा किया जिन्होने प्राकृतिक आपदा या मानवीय मुसीबत में फंसे लोगों की जी जान लगाकर मदद की । यह लोग ‘साउथ एशियनस फॉर जस्टिस’ के मेम्बर थे जो अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं।  ऐसा नहीं है कि विश्व हिंदू महासम्मेलन ने कार्यक्रमों की योजना और अधिक कुशलतापूर्वक बनाई है, या वे अधिक सावधानी से जाँच नहीं कर पाए और विभिन्न पैनलों का गठन कर कर दिया। इनमें से कुछ समस्याएं किसी भी प्रत्यक्ष पूर्वाग्रह की वजह से नहीं, बल्कि हिंदू-अमेरिकी आबादी के मेकअप और भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी और इस तरह की सामुदायिक गतिविधियों में भारतीय प्रसार के कारण उत्पन्न हुई हैं। हालांकि, इन मामलों के लिए एक पेशेवर, जागरूक, सावधानीपूर्ण और संवेदनशील दृष्टिकोण कुछ समस्याओं को कम कर सकताहै और / या उनका समाधान कर सकता है:

विश्व हिंदू महासम्मेलन की आयोजन समिति के सदस्य विरोध करने में असमर्थ व्यक्ति हैं और दक्षिण भारत से बहुत ही कम संख्या के साथ अधिकांश उत्तर और मध्य भारत के हैं।

इसी प्रकार, पूर्ण सत्र वक्ताओं की सबसे बड़ी संख्या उत्तर / मध्य भारतीय मूल और पुरुषों की है।

यह “आर्थिक सम्मेलन वक्ताओं”, “शैक्षिक सम्मेलन वक्ताओं”, “मीडिया सम्मेलन वक्ताओं,” “संगठनात्मक सम्मेलन वक्ताओं” आदि की सूची के साथ समान है।

सभा कक्ष / हॉल का नाम उन लोगों के नाम पर रखा गया है जिन्हें भारत के “धर्मनिरपेक्ष / वाम पंथी / प्रगतिशील” समूहों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है: उदाहरण के लिए, “अशोक सिंघल हॉल,” “महामना मालवीय हॉल” या “लोकमान्य तिलक हॉल”। निश्चित रूप से, वे एक सभागार को केवल भारत भर के हिंदू नेताओं और कार्यकर्ताओं की श्रेणी को शामिल न करते हुए “राजाजी हॉल” या एक अन्य “नारायण गुरु हॉल” से नामित कर सकते थे, लेकिन उपस्थित लोगों और सम्मेलन-पर्यवेक्षकों को उत्साहित और विचार करने के लिए यह सब किया गया था।

जैसा कि विश्व हिंदू महासम्मेलन की वेबसाइट पर विस्तृत कार्यक्रम,  अधिवेशनों को शामिल करने के बारे में कोई जानकारी नहीं देता है जो जाति / वर्ण विभाजन; मंदिर में प्रवेश और मंदिर प्रबंधन मामलों; क्षेत्रीय और भाषा विभाजन आदि का निपटान करते हैं।

सामाजिक विज्ञान / मानविकी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले या वक्ताओं को आमंत्रित करने का प्रभार संभालने वाले एवं विषयगत सभाओं का आयोजन करने वाले इत्यादि, बहुत कम भारतीय शिक्षाविद / विद्वान देखने में आते हैं।

बेशक, खेमे के बाहर खड़े होकर खेमे के अंदर होने वाली गतिविधियों की आलोचना करना आसान है। लेकिन हमने बार-बार देखा है कि मतलबी हिंदू अनावश्यक गलती करते हैं और मीडिया द्वारा उनकी निंदा की जाती है। विश्व हिंदू महासम्मेलन को वास्तव में एक बड़े कार्यक्रम की जरूरत है जिसके लिए भारत और अमेरिका दोनों में हिंदू समूहों और कार्यकर्ताओं के स्थापित नेटवर्क से परे लोगों से कुछ सहयोग की आवश्यकता है। इस कार्यक्रम द्वारा पुराने विरोधियों और लुटेरों को एक साथ लाना आश्चर्यजनक नहीं है, लेकिन हिंदुओं को लक्षित करने के लिए इन समूहों को वही युद्ध सामग्री प्रदान करना चिंताजनक है।

अंत में, यह याद रखना महत्वपूर्ण है: हिंदुओं का विरोध नहीं करने के लिए शहरी नक्सल समूहों, सामाजिक न्याय योद्धा समूहों, वामपंथी / उदारवादी शिक्षाविदों का नेटवर्क और अंग्रेजी मीडिया के गूंज कक्षों, सभी ने गठबंधन किया है, लेकिन जो हिंदुओं का विश्वास और उनका प्रतीक है – ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (दुनिया एक परिवार है) और ‘नर सेवा, नारायण सेवा’ (मानवता की सेवा ईश्वर की सेवा करना है)। यदि विश्व हिंदू कांग्रेस पैनल प्रस्तुतिकरण और आमंत्रित वक्ता इन दो सिद्धांतों के बारे में अच्छी तरह से और लगातार निगाह  रखते हैं, तो विश्व हिंदू कांग्रेस 2018 सफल होगा।

रमेश एन राव, कोलंबस स्टेट यूनिवर्सिटी में संचार विभाग के प्रोफेसर हैं