दुनिया
विश्व समुदाय के समक्ष आधुनिक शब्दों में लिपटी हुई सामने आई पाकिस्तान की धर्मांधता

संयुक्त राष्ट्र संघ के 74वें सत्र से भारत और पाकिस्तान की वापसी के साथ एक-ध्रुवीय विश्व या एकीकृत मानव समाज की परिकल्पना पुन: द्विध्रुवीय शीतयुद्ध के समय को लौट गई है। ‘हाऊडी मोदी’ के बाद असंतुलित हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के शोर का अंतिम, संतुलित सारगर्भित उत्तर विदेश मंत्रालय की प्रथम सचिव विदिशा मैत्रा ने दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमेरिका गए शिष्ट मंडल को पूर्णरूपेण सफल किया।

इस संयुक्त राष्ट्र सत्र ने स्थापित किया कि नई वैश्विक व्यवस्था विचारधारा नहीं, धर्म पर बँट रही है, और एक ओढ़ी हुई नैतिकता इस सत्य से मुँह फेरने में असमर्थ है। पाकिस्तान ने धर्मांन्धता को आधुनिक शब्दों से लपेट कर विश्व समुदाय को परोसा और एक वाकपटु इस्लामिक स्टेट की परिकल्पना विश्व पटल पर प्रस्तुत की।

विडंबनाओं में उलझे हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी धारा पर कश्मीरी राग गाते रहे, और भारतीय प्रधानमंत्री पर्यावरण, विकास, अर्थ व्यवस्था पर एक बड़ी शक्ति के रूप में विश्व में भारत के स्थान पर चर्चा करते रहे। इमरान काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन की वार्ता में अपने ही विरोधाभासों में घिरे दिखे।

पाकिस्तानी व्यवस्था में फ़ौज के अलोकतांत्रिक दख़ल पर इमरान कहते हैं कि ऐसा नहीं है और आगे कहते हैं कि उनकी सब नीतियाँ पाकिस्तानी फ़ौज से समर्थित हैं। किस लोकतांत्रिक सरकार को फ़ौज से नीतियों को मान्य कराना होता है? इमरान ने यह भी कहा कि पाकिस्तानी फ़ौज ने अल-क़ायदा जैसे आतंकवादी संगठन को प्रशिक्षण दिया, और 9/11 के बाद आतंक के विरोध में काम करने पर पाकिस्तानी शासकों पर फ़ौज ने ही हमले करवाए।

कश्मीर में लोकतंत्र का प्रलाप करने वाले पाकिस्तान का स्वयं का हाथ इस पर कितना तंग है, इसीसे स्पष्ट है कि चुने हुए प्रधानमंत्री को वह रिपोर्ट तक देखने को नहीं मिली जिसमें पाकिस्तान में 3,000 अमरीकी हत्याओं के आरोपी ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तानी शरण पर जाँच के निष्कर्ष हैं। एक कथित लोकतंत्र के लिए नितांत लज्जा का विषय है परंतु पाकिस्तान इस सब नैतिकता के छद्मावरण से निकल कर ठेठ धार्मिक आतंकवाद होने को अग्रसर है।

पर्यावरण जैसे विकासोन्मुखी विषयों पर जहाँ भारत ने वैकल्पिक ऊर्जा, जल संरक्षण, प्लास्टिक आदि पर बात की, पाकिस्तान का सिर्फ़ यह कहना था कि 2.5 प्रतिशत वन आवरण वाले देश ने छह वर्षों में सौ करोड़ वृक्ष लगाए, और धनी राष्ट्रों को पर्यावरण के लिए मदद देनी चाहिए। तमाम विश्व को धमकाते हुए भी जिस निर्लज्जता के साथ आर्थिक सहायता माँगी जा सकती है, इस कला में इमरान निपुण होते हुए जान पड़े।

पड़ोसी देशों के मामलों में नाक घुसाते-घुसाते, आतंक को विदेश नीति का हिस्सा मानने वाले देश के लिए सच मानें तो यह को चकित करने वाली बात नहीं है। मिथ्याभाषण पाकिस्तानी चरित्र का भाग हो चुका है, तभी अपने सभी पूर्ववर्ती चुने हुए प्रधानमंत्रियों को जेल में डाल कर या देश निकाला देकर भी इमरान विश्व पटल पर भारतीय कश्मीर में लोकतंत्र पर चिंता करते हैं।

वैश्विक आतंकवाद का स्त्रोत बन चुका पाकिस्तान विश्व के लिए एक राष्ट्र कम, एक तैरता हुआ आतंकी जहाज़ अधिक है। इसके भीतर क्या होता है, विश्व अधिकांशतः इससे अनभिज्ञ है। कंगाली के मुहाने पर बैठा पाकिस्तान धर्म के नाम पर मीडिया में दुष्प्रचार के माध्यम से एक मिथ्या राष्ट्र का भ्रम बनाए हुए है।

अन्यथा क्या कारण हो सकता है कि 5 अगस्त को जब अपने ही राज्य कश्मीर में भारत धारा 370 की अस्थाई धारा को हटाता है, और पाकिस्तानी आतंकवाद से ग्रसित भारतीय क्षेत्र में क़ानूनी प्रतिबंध लगाता है, उसी दिन स्वयं पाकिस्तान अपने क़बीलाई क्षेत्रों में लगे सैनिक शासन को खैबर पख़्तूनवा में बढ़ा कर भी भारतीय कश्मीर में आतंकवाद विरोधी संवैधानिक कदमों का विरोध करता है और उसके इस विरोधाभास पर कोई प्रश्न नहीं उठता है।

इस संयुक्त राष्ट्र सत्र का यह लाभ अवश्य रहा कि पाकिस्तान ने कश्मीर में अपनी नैतिक चिंता का सारा भ्रम स्वत: ही समाप्त कर दिया जब इमरान ने संयुक्त राष्ट्र संघ के पटल से इसे इस्लामिक युद्ध के रूप में घोषित कर दिया।

इस्लामोफोबिया, जिसका अर्थ इस्लाम से अतार्किक भय होता है, पर बात करते हुए इमरान इसके पक्ष में बोल रहे थे या विरोध में, समझना कठिन था। उन्होंने सलमान रूशदी की पुस्तक सैटेनिक वर्सेज़, जिस पर ईरान जैसे देशों में उनपर मृत्युदंड घोषित हुआ, से लेकर चार्ली हैब्डो पर हुई हिंसा को उचित बताया।

इमरान ने एक तरह से पाकिस्तान के क्रूर धर्म-निंदा के प्रावधान को सारे विश्व में लगाने की भूमिका बनाई। उनके भाषण का सार यह था कि क्योंकि मुस्लिम बंधु इस्लाम को लेकर भावुक होते है, बाक़ी धर्मों का कर्तव्य है कि उनकी भावनाओं को आहत करने वाली नीति, कला और लेखन से बचें अन्यथा उसके उत्तर में होने वाली आतंकी हिंसा के लिए आप स्वयं ज़िम्मेदार हैं। यदि इस विचार का मूल समझे तो इमरान इस्लामोफोबिया यानि इस्लाम के प्रति भय कम करने की नहीं बल्कि और अधिक भय का समर्थन कर रहे थे।

इसके सामने उचित ही था कि भारत ने तथ्यात्मक रूप से एक वैध आतंकी आईसीस या देश के रूप में स्थापित होने के लिए प्रयासरत पाकिस्तान को प्रतिबिंब दिखा कर विश्व को एक संभावित आतंकवाद के नए रूप के प्रति चेताकर मानवीय कर्तव्य का निर्वहन किया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ का यह 74वाँ सम्मेलन भारतीय नहीं, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में धार्मिक अतिवाद के आगामी संकट की पूर्वसूचना है जिसपर विश्व को समय रहते काम करना होगा। पाकिस्तान उस नए इस्लामिक आतंकवाद का सूचक है, जो सिर्फ़ बंदूक़ नहीं उठाएगा, कलम से दुष्प्रचार भी करेगा और न्यूक्लियर युद्ध का भय भी तमाम धरती पर खींचेगा। पाकिस्तान आने वाले समय में धार्मिक आतंकवाद के अंतर्राष्ट्रीय ध्रुव के रूप में स्वयं को स्थापित करने का प्रयास कर रहा है और कश्मीर को इसकी एक सीढ़ी के रूप में देख रहा है।