दुनिया
मीडिया द्वारा एनआरसी प्रक्रिया को गलत साबित करने का प्रयास वास्तविकता से परे है

प्रसंग
  • अंग्रेजी मीडिया दो प्रकार के प्रवासियों, जैसा कि नागा स्थिति पुष्टि करती है, के बीच अंतर न करके आग के साथ खेल रही है।
  • असम में कोई हिंदू-मुस्लिम समस्या नहीं है; यह ईसाई-मुस्लिम है। उत्तर-पूर्व में एक बड़ी अवैध प्रवासन समस्या है और जितनी जल्दी हम इसे महसूस करेंगे, उतना ही बेहतर होगा।

असम में नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) में कुछ लोगों को बाहर रखने पर चुनिन्दा रूप से ध्यान केन्द्रित करके मुख्यधारा की मीडिया ने हमें एक बड़ी क्षति पहुंचाई है। इंडियन एक्सप्रेस इंगित करते हुए इस हद तक चला गया कि एनआरसी के मसौदे, जो सुधार का विषय है, में छोड़ दिए गए 40 लाख लोग क्रोएशिया या पांच भूटानों की आबादी के बराबर हैं। यह, यह समझाने में असफल रहा कि 1.3 अरब लोगों के देश में एक छोटा प्रतिशत भी एक बड़ी संख्या हो सकती है। 40 लाख का मतलब है भारत की आबादी का 0.3 प्रतिशत।

इससे भी बदतर यह है कि मीडिया ने इस प्रकार के सांख्यिकीय कपट से उस पतली रेखा को मिटाने का प्रयास किया है जो सताए हुए शरणार्थियों (ज्यादातर हिन्दूओं और कुछ बौद्धों) को उन प्रवासियों (अधिकांश मुस्लिम) से अलग करती है जिन्होंने अपनी आर्थिक संभावनाओं में सुधार के लिए देश की सीमा को पार किया है।

यह उदारवाद का ढोंग करते हुए एक फर्जी खबर है। आर्थिक प्रवासियों के लिए भारत की जिम्मेदारी सिर्फ दयालु व्यवहार के अलावा कुछ और तो बनती ही नहीं है लेकिन भारत पर उन प्रवासियों को नागरिकता दिलाने की प्रक्रिया को तेजी करने का एक गंभीर दायित्व है जिन्हें बांग्लादेश में कट्टरपंथ के चलते भागना पड़ रहा है।

जबकि असम में भावनाएं हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही प्रवासियों के विरुद्ध हो सकती हैं लेकिन दोनों समूहों के अधिकारों को समान बनाने का प्रयास निंदनीय है। हिन्दू शरणार्थियों को कुछ अन्य राज्यों में स्थानांतरित कर के असमिया भावनाओं को शांत किया जा सकता है ताकि एक छोटे राज्य पर आर्थिक बोझ न पड़े; लेकिन भारत आर्थिक प्रवासियों के लिए नागरिक अधिकारों के लिए तब तक उत्तरदायी है जब तक कि वह प्रथम स्थान में इनसे वंचित नहीं किये गए हो। हम उन्हें जीवनयापन के लिए भारत में रहने और काम करने की अनुमति दे सकते हैं लेकिन उन्हें नागरिकता के अधिकार सिर्फ तभी दिए जा सकते हैं जब उनकी अवैध स्थिति को पहले स्वीकार किया जाए और इसकी पुष्टि की जाये।

त्रिपुरा के गवर्नर और बांग्लादेश से प्रवासन के करीबी पर्यवेक्षक तथागत रॉय ने 9 अगस्त को इकॉनोमिक टाइम्स के साथ एक वार्ता में इस मुद्दे को सीधे-सीधे सामने रखा था। उन्होंने समाचार पत्र को बताया: “देश में कई स्थानों पर रहने वाले बांग्लादेशी मुसलमान शरणार्थी नहीं है बल्कि अवैध अप्रवासी हैं… सभ्य देश शरणार्थियों को शरण देते हैं। लेकिन कोई भी देश अवैध प्रवासन की अनुमति नहीं देगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, मूल रूप से एक शरणार्थी वह व्यक्ति होता है जो जाति, धर्म, राष्ट्रीयता या राजनीतिक मत के कारण उत्पीड़न के भय से अपने गृह देश से बाहर रह रहा होता है। इसमें वे लोग शामिल नहीं होते हैं जिन्होंने नौकरियों की तलाश में भारत में प्रवेश किया है।

रॉय यह स्पष्ट करते हैं कि एनआरसी प्रक्रिया वैध है और सिर्फ इसलिए, कि शायद कुछ वास्तविक नागरिकों को उनके द्वारा स्वीकार्य दस्तावेज प्रदान न कर पाने के कारण रजिस्टर से बाहर रखा गया हो, पूरी प्रक्रिया को गलत नहीं कहा जा सकता है।

साधारण मैक्रो डेटा से हमें यह पता चलेगा कि हिन्दू ही बड़े पैमाने पर बांग्लादेश से बाहर आए हैं। 1951 में बांग्लादेश में 21 प्रतिशत हिन्दू थे जो अब घटकर 8 या 9 प्रतिशत से भी कम रह गए हैं।

ढाका यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर डॉ. अबुल बरकत के अनुसार, अगर पलायन की मौजूदा दर पर ध्यान नहीं दिया गया तो अगले 30 सालों में बांग्लादेश में एक भी हिन्दू नहीं रह जाएगा। पिछले दो दशकों  के हिन्दुओं का पलायन तेज हो गया है। हाल ही की एक पुस्तक में, बरकत ने अनुमान लगाया है कि धार्मिक उत्पीड़न और भेदभाव के कारण, 632 व्यक्ति प्रतिदिन की दर से, 1964 से 2013 के बीच 11.3 मिलियन हिन्दुओं ने बांग्लादेश से पलायन किया है।

बांग्लादेश की आजादी के बाद दो दशकों, 1971 से 1991 तक, पलायन धीमा रहा था लेकिन अब यह फिर अपनी पुरानी दर पर वापस आ गया है। अब इसकी हालत और भी ज्यादा बदतर हो गई है। जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था तब पलायन की यह दर 705 व्यक्ति प्रतिदिन थी।

अगले दो दशकों (1971 से 1981-91) में यह दर 512 से 438 हो गई थी, लेकिन उसके बाद से यह दर बढ़कर सन 1971 से पहले वाली दर के ही बराबर हो गई। 1991-2001 और 2001-2012 के बीच 767 से 774 व्यक्ति प्रतिदिन पलायन की दर देखी गई है। संक्षेप में कहें तो, कुछ ज्यादा ही “धर्मनिरपेक्ष” शेख हसीना के शासन के तहत, पूर्वी पाकिस्तान से पलायन की दर पहले से भी बदतर हो गई है।

यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जितने अधिक हिंदू देश छोड़ेंगे, उतने ही बचे हुए हिंदू खुद को देश में असुरक्षित महसूस करेंगे जिससे अंत में देश से भागने की ज़रुरत बढ़ती ही जाएगी।

एनआरसी झूट नहीं है, झूठी तो मीडिया द्वारा कही गई यह वास्तविकता है कि सताए गए हिंदुओं और आर्थिक प्रवासियों के बीच कोई अंतर नहीं है। न केवल असम में बल्कि उत्तर-पूर्वी भारत के शेष राज्यों में भी ऐसे ही हालात हैं। नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन ने हाल ही में गैर-स्थानीय लोगों, जिनके पास भारतीय दस्तावेज नहीं हैं, की पहचान करने और उनके निर्वासन की तलाश करने की योजना की घोषणा करी है। नागालैंड में अवैध रूप से रहने वाले लगभग एक से तीन लाख के बीच लोग अनुमानित हैं, और 2015 में एक मुस्लिम व्यक्ति की नागा महिला के साथ संबंधों के चलते भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। उन दोनों का संबंध सहमतिपूर्ण होते हुए भी, आदमी को जेल से बाहर खींचकर मार डाला गया था।

अंग्रेजी मीडिया दो प्रकार के प्रवासियों के बीच अंतर स्पष्ट न करके खतरे से खेल रही है जिसकी नागाओं की स्थिति अतिरिक्त रूप से पुष्टि कर रही है। इस राज्य में हिंदू-मुस्लिम को लेकर कोई समस्या नहीं है; यह ईसाई-मुस्लिम राज्य है। उत्तर-पूर्व में अवैध प्रवासन एक जटिल समस्या है और जितनी जल्दी हम इसे महसूस करेंगे, उतना ही बेहतर होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के सम्पादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।