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विश्व भूख सूचकांक में भारत की खराब स्थिति से जुड़ी गलतफहमियाँ और भ्रांतियाँ

वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) की नई सूची सामने आई है, जिसमें 117 देशों में भारत का स्थान 102वाँ है। सूची के सामने आते ही इसपर हंगामा खड़ा हो गया है। राजनीतिक दलों से लेकर समाजिक कार्यकर्ताओं तक इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है।

सरकार के विकास के दावों पर राजनीतिक दलों ने प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए ‘सबका विकास’ के दावे को असफल बताया है।

विश्व भूख सूचकांक प्रत्येक साल अपनी रिपोर्ट जारी करती है। इस बार रिपोर्ट में भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान और नेपाल से भी पीछे है, लेकिन इस सबके बीच विश्व भूख सूचकांक की रिपोर्ट में ही कई तरह का अंतर्विरोध सामने आए हैं। सूचकांक की रिपोर्ट में ही कई खामियाँ है।

2014 में भारत की रैंकिंग 55वीं थी, जबकि 2019 में 102वें रैंक पर पहुँच गई, तो क्या सच में भूख के मामले में भारत की स्थिति इतनी खराब है?

2014 में विश्व भूख सूचकांक अपनी रिपोर्ट उन देशों का चर्चा करता ही नहीं था, जिनकी स्थिति बहुत खराब होती थी। 2014 में 76 देशों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी, जबकि 2019 में 117 देशों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

दूसरी गलतफहमी जो यह रिपोर्ट फैला रही है, वह यह है कि भारत में भूख की समस्या बढ़ती जा रही है। यह सत्य नहीं है क्योंकि 1992 में भूख की समस्या 46.2 से घटकर 2019 तक 31.4 और 2019 में 30.3 हो गई है।

इतना ही नहीं, विश्व भूख सूचकांक ने अपनी रिपोर्ट में पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष क्या नई प्रगति हुई इसकी चर्चा भी नहीं की है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू जनसंख्या के अनुपात पर भी यह रिपोर्ट खड़ी नहीं उतरी है। शीर्ष के कई देशों की जनसंख्या भारत की जनसंख्या से कई गुणा कम है, जीएचआई की रिपोर्ट में इस आधार पर कोई आँकड़ा जारी नहीं किया गया है।

सकल घरेलू उत्पाद और वित्तीय घाटे जैसे आर्थिक आँकड़ों की बात करें तो साल दर साल तुलना की जाती है। उदाहरण के लिए भारत ने 2019 की पहली तिमाही में जीडीपी में 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। तुलना के बाद यह पाया गया कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में यह वृद्धि 1.8 प्रतिशत कम थी।

इसी तरह, भारत की मौजूदा वैश्विक भूख रैंकिंग की तुलना भी साल-दर-साल होनी चाहिए, जो कि जीएचआई अपने आँकड़ों के साथ नहीं करती है। साथ ही वह यह भी कहती है कि इस रिपोर्ट की तुलना पिछली रिपोर्टों से नहीं की जा सकती है।

दो साल पहले नीति आयोग दो सदस्यों ने अपने एक लेख में इस पर गंभीर प्रश्न उठाए थे। 2017 में जीएचआई ने रिपोर्ट जारी और बनाने के लिए चार आधारों को मानक बनाया था।

  • कुपोषित जनसंख्या का प्रतिशत
  • बाल मृत्यु दर
  • पाँच वर्ष से कम के बच्चों में उम्र के अनुपात में कम लंबाई वालों का प्रतिशत
  • पाँच वर्ष से कम के बच्चों में लंबाई के अनुपात में कम वजन वालों का प्रतिशत

बाल मृत्यु दर और कुपोषण की मात्रा कुल अंक की एक तिहाई है, लेकिन भारत में यह केवल 11.5 प्रतिशत लोगों को कवर करती है। इस प्रकार 70.5 प्रतिशत वेटेज पाँच वर्ष से कम आयु वाले उन बच्चों को दिया गया है जो जनसंख्या का मात्र 18.5 प्रतिशत हैं।

वैश्विक भूख सूचकांक ने अपनी रिपोर्ट में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की वजन और लंबाई नहीं बढ़ने को शामिल किया है‌। इसमें जीएचआई ने सभी जगहों पर जाकर पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई मापते हैं, लेकिन रिपोर्ट में इस बात की चर्चा नहीं की जाती है कि कम पाए गए बच्चों की लंबाई भूख के कारणों से है या अनुवांशिक है?

नीति आयोग के सदस्यों ने अपने लेख में तर्क दिया है कि भारत के कई ऐसे बच्चें हैं, भरपूर पोषण मिलने के बाद भी जिनकी लंबाई नहीं बढ़ी।