दुनिया
भारत-यूएस और पाकिस्तान-चीन: पुलवामा के बाद ये संबंध रखते हैं मायने
मयंक सिंह - 21st February 2019

आशुचित्र- जहाँ चीन अपने पैर पसारने में व्यस्त है और अमेरिका अपनी अस्थिर नीतियों पर टिका हुआ है, ऐसे में भारत को आतंकी चुनौतियों का जवाब देने हेतु प्रतिक्रियात्मक होने के बजाय अधिक सक्रिय होना होगा।

पुलवामा हमले के बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव सारा सैंडर्स ने इस आतंकी हमले की निंदा की और कहा, “पाकिस्तान आतंकवादियों को सहायता और सुरक्षित आश्रय देना तुरंत बंद करे जिनका एकमात्र लक्ष्य अराजकता, हिंसा और दहशत को बढ़ाना है।“ भले ही इस उक्ति का स्वागत करना चाहिए लेकिन यदि भारत को ऐसा लगता है कि अमेरिका आतंकवाद को खत्म करने के लिए पूर्णतया भारत का साथ देगा तो यह भारत की बेवकूफी होगी।

तब भी बयानबाजी के बावजूद आतंकवाद के प्रति अमेरिकी नीति में एकमात्र स्थिरता इसकी अस्थिरता ही रही है। वह अमेरिका ही था जिसने 1989 में सोवियत हमले के बाद अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों को वित्तीय सहायता प्रदान की, उनको प्रशिक्षित किया और उनको हथियार भी दिए और इस तरह अमेरिका ने ही जिहाद को जन्म दिया और उनका भरणपोषण किया। इराक से सीरिया तक फिर लीबिया तक और अब अफगानिस्तान तक अमेरिका एक ऐसे राष्ट्र के रूप में सामने आया है जिसे सहयोगी देशों के प्रति किसी भी नैतिक दायित्वों को नियमित रूप से खारिज करने के जुनून के कारण एक अविश्वसनीय सहयोगी के रूप में देखा जा रहा है।

पाकिस्तान ने लंबे समय से अमेरिका के साथ एक प्रेमघृणा संबंध साझा किया है क्योंकि यह उनकी विदेश नीति का उपरिकेंद्र बन गया था जब उसने 1979 में अफगानिस्तान पर आक्रमण करने के बाद सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया था। हथियारों, निधियों और मौलानाओं द्वारा दिया गया जिहाद का संदेश तब तक अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के माध्यम से जाता रहा जब तक सोवियत संघ ने घुटने नहीं टेके।

जैसे ही इस क्षेत्र में अमेरिका की दिलचस्पी कम हुई पाकिस्तान ने युद्ध से तबाह अफगानिस्तान पर नियंत्रण करने के लिए और भारत के खिलाफ रणनीति बनाने हेतु तालिबान का निर्माण किया। युद्धग्रस्त मुजाहिदीन को कश्मीर भेजा गया जहाँ उन्होंने केवल पाकिस्तान की लड़ाई को शारीरिक रूप से लड़ा बल्कि स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित और प्रेरित करके भी युद्ध किया। घाटी से कश्मीरी पंडितों की जातीय सफाई अफगान युद्ध के दिग्गजों को इस दृश्य में पेश करने का ही परिणाम था। यह संकरित युद्ध तब से लेकर अब तक चलता आया है।

अमेरिका ने अपने हित के लिए 9/11 के बाद इस क्षेत्र में अपनी दिलचस्पी को पुनर्जीवित किया और पाकिस्तान पर यह कहकर दबाव डाला किउनपर बमबारी करके वापस पाषाण युग में परिवर्तित कर दिया जाएगा। यह महसूस करते हुए, कि अफगानिस्तान में तालिबान पर अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो युद्ध को पाकिस्तान के उपकरण और सामग्री के परिवहन की ज़रूरत थी, पाकिस्तान की बेशर्मी और बढ़ गई।

पाकिस्तान से आतंकी समूहों विशेषकर हक्कानी (जो नाटो सेनाओं के बीच महत्त्वपूर्ण हताहतों का कारण बनता है) के लिए सामग्री और वित्तीय सहायता के बारे में क्रमिक अमेरिकी राष्ट्रपतियो द्वारा गुस्सा और झुंझलाहट के अलावा उनसे और कुछ भी नहीं हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के 2018 के नए साल का ट्विटर पाकिस्तान के खिलाफ था। उन्होंने ट्वीट किया-

उन्होंनेआतंकवादी संगठनों, तालिबान और अन्य समूहों के लिए पाकिस्तान के सुरक्षित ठिकानों के बारे में अब चुप रहने का वादा किया इसके पहले उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी और तालिबान विद्रोहियों के समर्थन के लिए नोटिस दिया था।

यह सच है कि लोकतंत्र का ढोंग करने के बावजूद देश को नियंत्रित करने वाला पाकिस्तान अमेरिका को हानि पहुँचाने  में अडिग रहा। यह तब भी था जब उन्होंने आतंक के खिलाफ युद्ध के लिए अपना समर्थन बढ़ाने का नाटक किया था।

अंतरिम रूप से नए शीत युद्ध ने चीनपाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सी-पेक) की छत्रछाया में चीन और पाकिस्तान को बांधे रखा है। पाकिस्तानी परमाणु प्रसार के लिए चीनी समर्थन के बावजूद दोनों देशों के बीच “सदाबहार दोस्तीकाफी हद तक छुपी रही। अब यह दोस्ती समस्त दुनिया के सामने चुकी है क्योंकि चीन शेनानिगों की सहायता कर रहा है। चीनी ऋणों ने अमेरिका के घटते अनुदानों की पूर्ति की है

अफगान राष्ट्रीय सेना और नाटो बलों के हक्कानी और तालिबानी समर्थकों ने अफगान युद्ध को अमेरिका के लिए अपरिहार्य बना दिया है और इसमें पाकिस्तानी राज्य को खून भी बहा है। हताश होकर दो दशक पहले अफगानिस्तान से बाहर निकलने की जल्दबाजी में अमेरिका ने पाकिस्तान राज्य के ज़रिये तालिबान के साथ एक शांति ’समझौते के लिए सहमति व्यक्त की थी। समझौते की शर्तों के तहत जो एक प्रकार का आत्मसमर्पण था, अमेरिका ने तालिबान से एकमात्र वादे के बदले अफगानिस्तान से अपनी सभी सेनाओं को वापस बुलाने की सहमति व्यक्त की थी और यह शर्त थी कि तालिबान किसी अन्य आतंकवादी नेटवर्क को अफगान क्षेत्र पर परिचालन नहीं करने देगा।

पुलवामा हमले से एक दिन पहले ईरानी क्षेत्र में बढ़ी हिंसा (जिसमें ईरान के सिस्तानबलूचिस्तान सीमा प्रांत में आत्मघाती बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 27 कुलीन ईरान क्रांतिकारी गार्ड मारे गए थे) पाकिस्तान के बढ़ते विश्वास का प्रतीक है। यह विश्वास इस धारणा से उपजा है कि अफगानिस्तान को खाली करने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के समर्थन की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तालिबानशांति’-सौदे से इंकार करे।

इसलिए पाकिस्तान को खुद पर अत्यधिक विश्वास है कि अमेरिकी प्रतिष्ठान से निकलने वाली कोई भी प्रतिशोधी धमकी उसके आत्मसंरक्षण में बाधा नहीं बनेगी।

पाकिस्तानचीन ’सदाबहारमैत्री

शहद से भी अधिक मीठाचीनपाकिस्तान का संबंध अपने आप में दोनों राष्ट्रों के बीच प्रचलित वैचारिक और धार्मिक मतभेदों से ऊपर स्वार्थों को रखने का परिचायक है प्रारंभ में भारत के साथ साझा दुश्मनी पर रिश्ते को मजबूत किया गया था। धीरे-धीरे इंडो-पैसिफिक और मलक्का दुविधा के अमेरिकी सिद्धांत का मुकाबला करने के लिए चीन की खोज ने इन चोक बिंदुओं को दरकिनार करते हुए एक ऐसे ज़मीनी रास्ते की तलाश की जो उसे बंदरगाह तक पहुँचा सके।

पाकिस्तान को वित्तीय संकट से बचाने के लिए और भारत के लिए एक सैन्य काउंटर के रूप में ग्वादर के उद्भव को सुनिश्चित किया है जो उन्हें लगता है कि भारत के साथ शत्रुता के मामले में उन्हें सांस लेने की जगह देगा। चीनी उपस्थिति की यह प्रकृति किसी भी ऐसे भारतीय सैन्य कार्रवाई के खिलाफ मुसीबतें पैदा करेगी जो आतंकी गतिविधियों के प्रतिशोध के रूप में कार्य करेगी।

यह वास्तव में एक क्रूर विरोधाभास है कि एक ओर पाकिस्तान कश्मीरी मुसलमानों के लिए अपने समर्थन का दावा कर रहा है और दूसरी ओर चीन के शिनजियांग में एक लाख मुसलमानों के चीनी नव बंदी गृहों में रहने के बारे में चुप्पी साधे हुए है।

पाकिस्तान ने चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पूरी तरह से आँख मूंद ली है। एहसान के बदले चीन यूएनएससी 1267 समिति द्वारा जैशमोहम्मद के मसूद अज़हर कोवैश्विक आतंकवादीके रूप में नामित होने से बचा रहा है। इतने लंबे समय तक मसूद अज़हर की रक्षा करने के परिणामस्वरूप चीन पुलवामा हमले में अपनी जटिलता को कम नहीं कर सका।

ज़ाहिर है राष्ट्रपति ट्रम्प के अधीन अमेरिका की संकीर्ण विदेश नीति में व्यक्तिगत प्रभाव की वृद्धि के साथ चीन भी अपने पड़ोस में पैर पसारने में लगा हुआ है इसलिए भारत को अपनी प्रतिक्रिया को ठीक से तैयार करना होगा। भारत को प्रतिक्रियाशील होने के बजाय सक्रिय होने पर भरोसा करना होगा और यह आमतौर पर होता आया है।