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एक इस्लामी समूह ओआईसी से वार्ता निष्फल होगी, एक-एक देश से बात करे भारत

आशुचित्र- ओआईसी वह फोरम नहीं है जिसमें भारत को उलझना चाहिए, इससे बेहतर लाभ भारत को मुस्लिम देशों से एक-एक कर बातचीत करके मिलेगा क्योंकि यह अपना पक्ष बेहतर तरीके से रख पाएगा और द्विपक्षीय वार्ताओं का लाभ ले पाएगा।

कुछ दिनों पूर्व इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) की आबू धाबी में हुई बैठक में भारत विशिष्ट अतिथि था और पाकिस्तान इसमें सम्मिलित भी नहीं हुआ था, इससे भारत की उच्च स्थिति का संकेत मिलता है। लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही ओआईसी ने “भारत अधिकृत कश्मीर” में मानवाधिकार के हनन की निंदा की।

प्रश्न यह है कि क्या मुस्लिम देशों में समन्वय स्थापित करने के लिए गठित हुई ओआईसी भारत के मुद्दों को गंभीरता से लेगी या इसे छोड़ दिया जाएगा।

भले ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को अपना पक्ष रखते हुए ऋगवेद, क़ुरान और गुरुनानक जी की बात कहने का अवसर मिला लेकिन इससे “हिंदू भारत” के प्रति इस्लामी विचार नहीं बदलेंगे। इस्लाम और इस्लामी समन्वय की सेवा में गठित संस्था किसी देश की मात्र इसलिए सहायता नहीं करेगी क्योंकि इसके पास एक बड़ी मुस्लिम आबादी है।

ओआईसी के इस संकल्प ने कश्मीर मुद्दे पर मात्र पाकिस्तान का ही राग नहीं दोहराया बल्कि बुरहान वानी की हत्या को अन्यायिक औक कश्मीर में भारत के आतंक की बात कही। स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के बहिष्कार को स्वीकार करने के बाद संस्था ने भारत की निंदा कर दुष्ट देश को सांत्वाना देना पड़ा।

ओआईसी वह फोरम नहीं है जिसमें भारत को उलझना चाहिए, इससे बेहतर लाभ भारत को मुस्लिम देशों से एक-एक कर बातचीत करके मिलेगा क्योंकि यह अपना पक्ष बेहतर तरीके से रख पाएगा और द्विपक्षीय वार्ताओं का लाभ ले पाएगा।

ये कई कारण हैं जिससे भारत को ओआईसी की वार्ता में नहीं उलझना चाहिए-

पहला, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत को धार्मिक राजनीतिक समूह का सहारा नहीं लेना चाहिए। भले ही भारत में 18 करोड़ मुस्लिम हैं लेकिन कोई भी सरकार केवल उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है। वैसे भी इस्लाम में धर्म और राजनीति में अंतर नहीं किया जाता (पैगंबर राजनेता थे, धर्मप्रचारक थे और शुरुआती मुसलमानों के सेनापति भी थे)। इसलिए ओआईसी राजनीतिक और धार्मिक हितों को मिला सकता है। भारत नहीं। भारत का मात्र राजनीतिक उद्देश्य इसे ओआईसी समूह से कमतर करता है।

दूसरा, जब मुस्लिम देशों के बड़े समूह की बात करें तो भारत को अपने हितों को बढ़ावा देने की बजाय उनकी लाग-लपेट में उलझना होगा। उदाहरण के रूप में ओआईसी की कश्मीर पर अपनी मुद्रा हो सकती है लेकिन भारत यह कहने में संकोच करेगा कि कश्मीर में मानवाधिकार हनन में मुस्लिमों और जिहादी ताकतों का हाथ है जिनके कारण 50 लाख पंडितों को 80 और 90 के दशक में कस्मीर छोड़कर भागना पड़ा था। कोई भी ओआईसी इसे स्वीकार नहीं करेगी जो बुरहान वानी को वीर बताती है।

तीसरा, हम सोच सकते हैं कि ओआईसी से वार्ता कर भारत को क्या मिलेगा क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बात को कभी आगे नहीं बढ़ा पाएगा क्योंकि इसके सदस्यों की आम सहमति अपने-अपने राज्यों में इस्लामी प्राथमिकता पर है। क्या बदले में कभी भारत ओआईसी से सऊदी अरब और अन्य जगहों पर हिंदू मंदिर व गुरुद्वारों के निर्माण की बात कर पाएगा? हालाँकि द्विपक्षीय वार्ता से यह यूनाइटेड अरब एमिरेट्स (यूएई) और ओमान में ऐसा करवाने में सक्षम हुआ है। क्या भारत ओआईसी से आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में समर्थन प्राप्त कर पाएगा? लेकिन कभी-कभार यूएई और सऊदी अरब जैसे मित्रवत देशों से द्विपक्षीय वार्ता से यह संभव हो जाता है।

सीधी बात यह है कि एक समूह ओआईसी से वार्ता का कोई लाभ नहीं होगा। एक वैश्विक ईसाई परिषद ओआईसी से बराबरी वाले की तरह बाच कर सकता है लेकिन एक धर्मनिरपेक्ष भारत नहीं। एक दर्शक की उपाधि मिलने से कुछ नहीं होगा जब भारत इस्लामी एकता के बीच तक अपना संदेश ही नहीं पहुँचा पाएगा।

सुषमा स्वराज के इस नेतृत्व में भारत को सीख लेनी चाहिए कि यह ओआईसी के सदस्य सभी 57 देशों से एक-एक कर वार्ता करे। एक सामूहिक स्तर पर वार्ता से भारत के लिए दोनों ओर से हार है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।