दुनिया
खेल बहिष्कार से आगे जिहादी पाकिस्तान के विरुद्ध भारत अपना सकता है ये विकल्प

आशुचित्र-

  • हमें यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए कि हम अपने लोगों से कहें कि शांति सिर्फ लाहौर तक एक बस यात्रा जितनी दूर है।
  • शत्रु को हानि पहुँचाने के संकल्प का स्थान सद्भाव नहीं ले सकता।

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के इस्लामवादी और जिहादी संगठनों से लड़ने के लिए भारत के पास अधिक विकल्प नहीं हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो हम बहिष्कार और दंडित करने के अन्य माध्यम नहीं अपना रहे होते। यह सत्य है, चाहे दिल्ली की सत्ता किसी के पास भी हो।

जैश-ए-मोहम्मद द्वारा पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर किए गए हमले ने राष्ट्रीय आक्रोश को उद्वेलित किया और हमने दो कार्य किए- एक यह कि पाकिस्तान से अधिकतम सहायता प्राप्त करने वाले देश का दर्जा छीन लिया जो सैंकड़ों करोड़ों के द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करेगा और दूसरा कश्मीर घाटी के अलगाववादियों को दी गई सुरक्षा वापस ले ली गई।

दोनों ही महत्त्वपूर्ण निर्णय हैं और उन्हें बहुत पहले ही ले लिया जाना चाहिए था। आप उस देश के साथ व्याापर नहीं करते जो आपसे नफरत करता है और आपको उसकी रक्षा करने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है जो भारतीय संविधान में विश्वास ही नहीं करता। यदि वे सुरक्षा चाहते हैं तो उस भारतीय संविधान को स्वीकार करें जो कश्मीर में भी उतना ही मान्य है।

एक और विचार जो ज़्यादातर टीवी चैनलों पर प्रचारित किया जा रहा है कि पाकिस्तान के साथ सांस्कृतिक और खेल संबंधों का बहिष्कार किया जाए। एक बार फिर यह सही बात है क्योंकि आप उन लोगों के साथ नहीं खेलते हैं जो आपको मारना चाहते हैं या आपका विनाश चाहते हैं।हालाँकि इसका मतलब यह है कि यदि भारत किसी मैच को जीतने के लिए या विश्व कप में पाकिस्तान के साथ खेलने से इनकार करता है तो देश को इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत खेल में सबसे समृद्ध योगदानकर्ता है और इसलिए दुनिया हमारे बहिष्कार को हल्के में नहीं लेगी। 1974 में हमने डेविस कप के फाइनल में दक्षिण अफ्रीका का बहिष्कार किया था और ख़िताब को खो दिया, वह भी तब जब देश के पास ऐसा करने के लिए केवल नैतिक कारण थे। दक्षिण अफ्रीका से  हमें कोई खतरा नहीं था। इसलिए विश्व कप का ख़िताब या फाइनल तक पहुँचने के रास्ते को त्यागना भारत को बचाने के लिए एक छोटा- सा मूल्य है

एक और विचार जो आता रहता है, वह यह है कि पाकिस्तान को एक आतंकवादी राज्य घोषित कर दिया जाए। हालाँकि यह हमें मानसिक संतुष्टि दे सकता है लेकिन इसके बाद जो होगा उसका भी हमें समान रूप से अनुमान है– पाकिस्तान हमारे साथ भी ऐसा ही करेगा और हमें उसके साथ फिर से समझौता करना होगा। इससे बेहतर विकल्प यह होगा कि भारत पाकिस्तान से एक आतंकवादी राज्य की तरह व्यवहार करे जो यह वैसे भी है और दूसरे देशों के साथ मिलकर इसकी आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए इसका निधिकरण रोके। हमें फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर आतंकी फंडिंग के लिए पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट कराना चाहिए। यह पहले से ही एफएटीएफ की ग्रे सूची में है और यदि भारत पुलवामा में पाकिस्तानी समूहों की भागीदारी का पुख्ता सबूत दे सकता है तो पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करना और भी सहज हो जाएगा।

लेकिन इनमें से कोई भी विकल्प पाकिस्तान में पल रहे जिहादी सांप को पनपने से नहीं रोक पाएगा, जिसे पाकिस्तान पोषित करता रहता है। तो हमारे वास्तविक विकल्प क्या हैं?

पाकिस्तान को मुख्य लाभ इस बात का है कि यह कुछ मुसलमानों को कट्टरपंथी बनाने और बहकाने में काबिल है और कश्मीर (या अन्य जगहोंपर कम कीमत पर युद्ध लड़ने की क्षमता भी रखता है। पुलवामा में हमारे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 44 जवानों को मारने के लिए इसे केवल एक आत्मघाती आदिल अहमद डार की ज़रूरत थी। आतंकवाद हमेशा भड़काने के लिए सस्ता तरीका होता है जबकि इसके खिलाफ पारंपरिक रक्षा एक उच्च लागत विकल्प है। दीर्घकालिक रूप से पाकिस्तान का लक्ष्य कश्मीर को बनाए रखने के हमारे संकल्प को कमज़ोर करना है और इसी कारण से यह बारबार भड़काने का प्रयास करता है। चर्चा है कि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध एक दीर्घकालिक कम लागत के युद्ध को जारी रखने के लिए चीन का दास बनेगा और वैश्विक निंदा को भी आमंत्रित कर लेगा।

इसलिए हमारे विकल्पों को गैर-पारंपरिक युद्ध पर ध्यान केंद्रित करके इस लागत विषमता को संबोधित करने की आवश्यकता है।तार्किक विकल्प हैं कि बलूच और सिंधी अलगाववाद को हथियार देकर ईंधन प्रदान करना और साथ ही खैबर पख्तूनख्वा और अन्य जगहों पर जनजातीय समूहों को पाकिस्तान से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना है। 1947 में उत्तर- पश्चिम सीमांत प्रांत की स्वतंत्रता को मान्यता देने से इनकार कर जो गलती हमने की थी, उसे सुधारने की ज़रूरत है।

इस विषमता को संबोधित करने का दूसरा तरीका कश्मीर घाटी में एक अपरंपरागत बल का बढ़ावा देना है जो जिहादियों की जानकारी  भी रखे और साथ ही इनकी हत्या भी करे। यह सब के लिए नहीं हो सकता और हमें वह करने की आवश्यकता है जो अमेरिका जिहादी ताकतों के साथ करता है- एक ऐसा न्यायिक सेल हो जो सबूतों की जाँच-पड़ताल करे और राष्ट्र-विरोधी एवं हिंसक तत्वों द्वारा की गई हत्याओं की पुष्टि करे। अंततः अपरंपरागत युद्ध को केवल भारत की अपरंपरागत रक्षासहअपराध क्षमताओं से हराया जा सकता है।सीआईए ठीक यही करता हैऔर 9/11 के बाद एक विवादास्पद 2001 कानून के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति इस तरह की कानूनी हत्याओं को कानूननसैन्य बल का उपयोग करने के लिए अधिकृत किया गया। राष्ट्रपति ओबामा ने भी इस कानून का इस्तेमाल अनवर अवलाकी की हत्या करवाने के लिए किया था जो कि एक अमेरिकी नागरिक था और येमेन में जिहाद का प्रचार अमरीका और अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ कर रहा था

रही बात वार्ता की तो हमें इसे नहीं नकारना चाहिए। अगर पाकिस्तान जिहाद और आतंकवाद की तरफ अपना रवैया असल ढंग से बदलने को तैयार है तो हमें उसके बात करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। भविष्य में अगर पाकिस्तान की सेना खुद युद्ध से परेशान हो जाए, तो हमें इस चीज़ का फायदा उठाना चाहिए। इस बात-चीत को फिर वही अमन की आशा जैसी बकवास बातों पर आधारित नहीं होना चाहिए। यह बातें कठोर लहज़ें में होनी चाहिए और पाकिस्तान को अपने इस्लामवाद को त्यागने पर दबाव बनाने वाली होनी चाहिए। ये बातें कश्मीर को या इसके कुछ हिस्से को पाकिस्तान को दे देने के संबंध में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।

अब हम कश्मीर के मुद्दे पर आते हैं। स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 370 और 35ए अपनी उपयोगिता से अधिक जी चुके हैं। अनुच्छेद 370 तब हटाया जा सकता है जब हम संविधान को संशोधित कर राज्यों को अधिक शक्तियां दें। और अनुच्छेद 35ए जो कि जम्मू और कश्मीर राज्य विधानसभा को भेदभावपूर्ण कानून बनाने कि अनुमति देता है, उसको भी हटाना चाहिए क्योंकि 1954 में यह संसद की अनुमति के बिना लागू किया गया था। इस अनुच्छेद को कोई विधायी समर्थन प्राप्त नहीं और हम आशा करते हैं कि उच्चतम न्यायलय इसे असंवैधानिक ठहराएगा।

जम्मू-कश्मीर राज्य को तीन राज्यों में बाँट देना चाहिए, जिनमें से जम्मू और लद्दाख को अलग कर देना चाहिए। और इन दोनों राज्यों को इनके अलग होने के बाद इन्हें इनके बकाया संसाधन देने के अलावा घाटी की जनसंख्या को इस्लामवादी प्रवृत्ति से दूर रखने का कार्य करना चाहिए। वहाँ के लोग खुद यह स्पष्ट करें कि वे दूसरे राज्यों के भारतीयों से भेदभाव नहीं करेंगे जो वहाँ बसना चाहते हैं। इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन को इस तरह आयोजित करना चाहिए कि ऐसा संदेश दिया जा सके कि विभाजन का समर्थन करने से दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

इस समय हमें अपने लोगों को यह सिखाना चाहिए कि सामान्य भावुकता को कैसे त्यागें और और उन्हें यह बताना पड़ेगा कि हम एक 100 साल के संघर्षन युद्ध की तैयारी कर रहे हैं। हमें हमारी जनता को यह बताने की भूल कभी नहीं चाहिए कि शांति सिर्फ लाहौर तक एक बस यात्रा जितनी दूर है या हमारे प्रधानमंत्री के पाकिस्तान जाने पर ही मिलेगी।शत्रु को हानि पहुँचाने के संकल्प का स्थान सद्भाव नहीं ले सकता।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।