विचार
हिंदूफोबिया से हिंदू-घृणा पर पहुँच गया है पश्चिमी शैक्षिक वर्ग, क्या कर सकता है भारत

पश्चिमी शैक्षिक वर्ग अप्रत्यक्ष हिंदूफोबिया (भय) से आगे बढ़कर खुली हिंदूमीसिया- पूर्ण रूप से हिंदू-घृणा पर उतर आया है। जब तक हिंदुओं से घृणा ऑड्रे ट्रुश्के जैसे कुछ शैक्षिकों तक सीमित थी, जो भगवान् श्रीराम को “मतांध सुअर” और भगवद्गीता को नरसंहार की नियम-पुस्तिका कहती है, तो हम उसे अनदेखा कर सकते थे।

परंतु अब यह घृणा विस्तृत हो चुकी है जहाँ 40 विश्वविद्यालय एक ऐसे सम्मेलन का समर्थन कर रहे हैं जिसकी साहित्य और प्रचार सामग्रियाँ कहती हैं- “वैश्विक हिंदुत्व का विघटन”। यहाँ पर एक राजनीतिक विचारधारा की तरह हिंदुत्व के विरोध की बात नहीं हो रही है, बल्कि उसे “विघटित” करने की बात हो रही है।

इस सम्मेलन में योगदान और समर्थन करने वाले प्रायोजकों में कुछ कुलीन माने जाने वाले विश्वविद्यालय हैं जैसे नॉर्थवेस्टर्न, हारवर्ड, यूपेन्न, प्रिन्सटन, स्टैनफोर्ड, कॉर्नेल, यूसी बर्कली और एमरी। इसके अलावा ट्रुश्के का विश्वविद्यालय रटगर्स, जहाँ हाल ही में हिंदू छात्रों ने उसका विरोध किया था, भी इस सूची में है।

दिखाया जा रहा है कि हिंदुत्व का विघटन सही है व हिंदुफोबिक नहीं है लेकिन वास्तविकता है कि इनमें से कोई भी विश्वविद्यालय “इस्लामवाद का विघटन” या “ईसाई इवेंजलिज़्म के विघटन” जैसे शीर्षकों पर सम्मेलन आयोजित करने का साहस नहीं रखता है। जबकि ये दोनों मत विश्व के उन क्षेत्रों में शांति के लिए खतरा हैं जो मुस्लिम या ईसाई बहुल नहीं हैं।

स्पष्ट है कि उनके लिए राजनीतिक इस्लाम, राजनीतिक ईसाइयत और राजनीतिक बौद्ध धर्म सही हैं लेकिन राजनीतिक हिंदू धर्म, आखिर हिंदुत्व यही है, वह गलत है। हिंदुत्व का उद्देश्य है जाति-आधारित भेदभाव और विभाजन को कम करके समान हितों की रक्षा के लिए हिंदुओं को एकजुट किया जाए।

अब जब हिंदुत्व के विघटन की बात हो रही है तो हिंदुओं को विभाजित किए बिना यह संभव नहीं है। 10-12 सितंबर को होने वाले इस सम्मेलन की उपलब्ध जानकारी इसका उद्देश्य स्पष्ट कर देती है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लोगों का प्रतिनिधि चित्र है जिन्हें कील की तरह निकाला जा रहा है।

यहाँ पर आरएसएस की विचारधारा का विरोध नहीं हो रहा है, परंतु उन्हें वैसे ही लक्ष्य किया जा रहा है जैसे हिटलर ने यहूदियों को लक्ष्य किया था। आपको याद हो तो केरल में एक इस्लामवादी संगठन पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया के जुलूस में आरएसएस की पोशाक में दो लोगों को बेड़ियों में घुमाया गया था।

तब “फैक्ट-चेकर” मामले में कूद पड़े थे और पीएफआई को किसी भी घृणा विचार के दोष से मुक्त कर दिया था यह कहकर कि ये लोग सिर्फ आरएसएस कार्यकर्ताओं का भेष धारण किए हुए हैं और वास्तव में संघी नहीं हैं। यहाँ कितनी सरलता से मान लिया गया कि बेड़ियों में बांधने के अमानवीय कृत्य का प्रदर्शन घृणा नहीं है।

मुख्यधारा की मीडिया ने पीएफआई को घृणा करने वाले की जगह पीड़ित के रूप में दिखाया जिनपर वास्तविक आरएसएस कार्यकर्ताओं को बेड़ियों में बांधने का झूठा आरोप लगा था। इससे जो संघ के प्रति झुकाव नहीं रखते, वे समझेंगे कि संघ व इसके समर्थकों को डराना-धमकाना या उनपर हिंसा तक करना गलत नहीं है।

सोचिए क्या प्रतिक्रियाएँ होतीं अगर मामला इसके उलट होता- आरएसएस की रैली में पीएफआई कार्यकर्ताओं को बेड़ियों में बंधा दिखाया जाता। हिंदू धर्म और हिंदुत्व में अंतर को औपचारिक रूप से स्पष्ट करने के बाद भी ईसाई प्रचारवादी, वोक उदारवादी और इस्लामवादियों के बीच एक गठजोड़ है जो हिंदू अधिकारों की बात करने वालों को हिंदुत्व एक्टिविस्ट व इस्लामोब का ठप्पा लगा देता है।

इसी तरह यहूदी-विरोध शुरू हुआ था, लोगों का अमानवीयकरण किया गया और उनके बारे में सबसे बुरा सोचा गया। इसके परिणाम प्रायः संजातीय सफाई और नरसंहार होते हैं, जैसा कि हमने पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भारत के भीतर कश्मीर घाटी में भी देखा।

हिंदुओं के विरुद्ध भेदभाव होता है और उनकी सहायता के सभी प्रयासों को इस्लामोफोबिया कह दिया जाता है, जैसा कि हमने नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में प्रदर्शनों में देखा। हिंदू संगठनों को निशाना बनाना तब शुरू हुआ जब रटगर्स में हिंदू छात्रों ने ऑड्रे ट्रुश्के पर कार्रवाई की माँग की लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ नहीं किया।

बल्कि सिर्फ हिंदुओं के लिए चिंता में कुछ शब्द कह दिए और ट्रुश्के की कोई आलोचना नहीं की गई। इसके बाद ही हिंदू अमेरिकी संघ को निशाना बनाया गया लेकिन संघ ने आरोप लगाने वालों, इस्लामवादी टीवी चैनल अल जज़ीरा समेत, पर अमेरिकी न्यायालयों में झूठ के आधार पर अपमानित करने के प्रयास का मुकदम दर्ज कर दिया है।

सितंबर में होने वाले हिंदुमीसिया सम्मेलन में जाने-माने हिंदुओं से घृणा करने वाले, आरएसएस-विरोधी और स्वयं से घृणा करने वाले हिंदू व मुस्लिम सम्मलित हैं जिसमें एक भी वक्ता विपरीत विचार रखने वाला नहीं है। वक्ताओं में आनंट पटवर्धन, आइशा किदवई, क्रिस्टॉफे जैफ्रेलॉट, कविता कृष्णन, मोहम्मद जुनैद, नंदिनी सुंदर और मीना कंडासामी हैं।

इनमें से दो हिंसक माओवादियों के मुखर समर्थक हैं लेकिन उनके लिए माओवादियों को “विघटित” करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह खुला युद्ध है जहाँ “हिंदुत्व के विघटन” के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। हिंदुओं को जागने की आवश्यकता है। दो चीज़ें की जानी चाहिए।

पहली, हिंदुओं को समझना होगा कि हिंदू-घृणा वाली ताकतें और शैक्षिक धिम्मी जो हर इस्लामवादी अपराध को छुपाने पर तुले रहते हैं, वे अब खुले रूप से उन्हें निशाना बना रहे हैं। हिंदुओं के पास स्वयं को संगठित करने और शत्रुओं से वैचारिक युद्ध लड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

दूसरी, नरेंद्र मोदी सरकार को समझना चाहिए कि बात सिर्फ राजनीतिक विरोध की नहीं है बल्कि विदेशों में हिंदुओं को थोक में निशाना बनाया जा रहा है जिसकी छाया शीघ्र ही भारत तक पहुँचेगी। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में तीन हिंदुफोबिक ताकतों की बड़ी जीत ने वैश्विक स्तर पर हिंदू-घृणा को नया उत्साह दे दिया है।

सरकार को इस विषय में एक परामर्श-पत्र जारी करके सक्रिय रूप से भारतीयों को ऐसे विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने से हतोत्साहित करना चाहिए जहाँ हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है। हिंदू छात्रों के लिए सुरक्षित घोषित करने से पहले सरकार को विश्वविद्यालयों से गारंटी लेनी चाहिए कि वे हिंदू-घृणा से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं।

यदि सरकार इतना भी नहीं कर सकती तो उसे हिंदू राष्ट्रवादी कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।