दुनिया
‘तीसरी दुनिया’ का अधिनायकतंत्र- पश्चिमी घोर बाज़ारवादी नीतियों का प्रतिफल

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी होती है और फिर एक उभरते हुए लोकतंत्र की हत्या सौभाग्य से बिना किसी बड़े रक्तपात के हो जाती है। प्रश्न है कि अमेरिका का वहाँ 20 वर्षों तक डेरा डाले रहने का उद्देश्य क्या अफगानिस्तान में एक सशक्त लोकतंत्र का निर्माण करना था, या इसके पीछे उसके आर्थिक और सामरिक निहितार्थ थे।

अमेरिका और पश्चिमी देशों का किसी अन्य देश में जाना और आना कम-से-कम कोई लोकतांत्रिक उद्देश्य तो कतई नहीं माना जा सकता, क्योंकि इतिहास में ऐसे अनगिनत अध्याय हैं जिससे एक ही बात उभरकर सामने आती है कि पश्चिमी देशों का प्रवेश ‘तीसरी दुनिया’ के लिए अस्त होने का ही कारण रहा है।

‘तीसरी दुनिया’ को श्रम, पूँजी और संसाधन प्राप्त करने का स्रोत माना गया और पश्चिमी देशों ने वहाँ उभरते हुए लोकतंत्र को मटियामेट कर दिया और साथ ही नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके विकास के आत्मनिर्भर प्रारूप को भी ध्वस्त कर दिया जिसके फलस्वरूप वहाँ भयंकर विपन्नता का प्रसार हुआ। इस कहानी को संक्षेप में हम यहाँ समझने का प्रयास करते हैं।

1940 के दशक में प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी अर्थशास्त्री राउल प्रेबिस ने विश्व के अर्थतंत्र में विद्यमान विषमता के कारणों पर एक महत्त्वपूर्ण विमर्श को जन्म दिया जिसमें उन्होंने बताया कि ‘तीसरी दुनिया’ की विषमता और गरीबी का कारण इसकी यूरोपीय देशों और अमेरिका पर निर्भरता, और इसमें अंतर्निहित असंतुलित आर्थिक संरचना है।

इसलिए अगर ‘तीसरी दुनिया’ को एक संतुलित और न्यायपरक विकास चाहिए तो इसे अपनी इस आर्थिक परतंत्रता से मुक्त होना होगा। उनका  मानना था कि इस गंभीर विषमता और भूखमरी के लिए वैश्विक औपनिवेशिक अर्थतंत्र की वह प्रणाली ज़िम्मेदार है जिसमें ‘तीसरी दुनिया’ उनके लिए मात्र एक साधन मात्र हैं।

प्रेबिस के इन आर्थिक विचारों से प्रभावित होकर लैटिन अमेरिकी देशों ने अपने अर्थतंत्र को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया। उन्होंने अपने अर्थतंत्र की पश्चिमी निर्भरता से विमुख होकर अपने मार्ग स्वयं खोजने का निर्णय लिया। जैसे अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जॉन पेरों (1946-55) ने अपने देश में भारी उद्योगों पर अत्यधिक व्यय किया।

इन्होंने इसके अतिरिक्त सार्वजानिक शिक्षा, स्वास्थ्य सामाजिक सुरक्षा, आवास आदि की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य किया। धीरे-धीरे इसी तरह के राज्य-पोषित विकास  और आत्मनिर्भरता पर ‘तीसरी दुनिया’ के अन्य देशों में भी कार्य होने लगे थे, जैसे घाना में एन्क्रूमा, मिस्र में कर्नल नासिर, इंडोनेसिया में सुकर्णों आदि।

यह एक आर्थिक-राजनीतिक विचारधारा के रूप में तीव्रता से ‘तीसरी दुनिया’ के अन्य देशों में भी फैलने लगा। यह ध्यान देने की बात है कि ऐसी आर्थिक क्रांति से पारंपरिक वैश्विक अर्थ तंत्र की संरचना डगमगाने लगी थी जिसका सीधा प्रभाव पश्चिमी देशों के आर्थिक हितों पर ही पड़ रहा था।

ऐसे में पश्चिमी देशों के पास सबसे उपयुक्त तरीका यही था कि वे ‘तीसरी दुनिया’ के इन देशों में ऐसी सरकारों का गठन करें जो बाहरी तौर पर तो एक लोकतांत्रिक और स्वायत्त सरकार की तरह दिखे, लेकिन भीतरी रूप से पश्चिमी राष्ट्रों के उदार-बाज़ारवादी नियमों के निर्देशन में ही कार्य करें।

इसलिए इस दौर में हुए अनगिनत राष्ट्रों में सत्ता परिवर्तन में इन पश्चिमी शक्तियों के हाथ को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। यहाँ कुछ देशों के उदाहरणों के साथ हम यह दिखलाना चाहेंगे कि कैसे लोकतंत्र और विकास के नाम पर अलोकप्रिय सरकारों का निर्माण किया गया, और जिनकी कार्यावधि में विकास के नाम पर भयंकर रूप से आर्थिक लूट-पाट हुई।

यह एक बड़ी विडंबना है कि पश्चिम की लोकतांत्रिक सरकारों द्वारा ‘तीसरी दुनिया’ के विभिन्न देशों में अपने आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए अलोकतांत्रिक और अधिनायकवादी सत्ता का गठन करवाया गया; यहाँ कुछेक देशों में हुए सत्ता-परिवर्तन पर एक दृष्टि डालते हैं-

ईरान- जब 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति ऐजेनहोवर सत्ता में आए तो उन्होंने अपने इस अभियान का प्रारंभ ईरान से ही किया था जिसे उनके बाद के राष्ट्रपतियों ने भी जारी रखा। ईरान के लोकप्रिय और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए और पेरिस के उदार राजनीतिक विचारों में प्रशिक्षित नेता मोहम्मद मुसादेग अपने आर्थिक सुधारों के द्वारा ईरान को एक राष्ट्र के रूप में गढ़ना चाह रहे थे।

उन्होंने बेरोजगारी भत्ता, बंधुआ कृषि मजदूरी के उन्मूलन के साथ ही अमीरों पर करों को बढ़ाया और उस राशि को निर्धन ग्रामीण अर्थव्यस्था में लगाया। मुसादेग ने देश के संसाधनों जैसे तेल के अधिकार पर से ब्रिटेन के आधिपत्य को हटाना चाहा और अंततः इसका राष्ट्रीयकरण भी कर दिया।

इससे बौखलाकर ब्रिटेन और अमेरिका ने ईरान पर सैन्य आक्रमण का विचार किया, लेकिन सोवियत संघ के हस्तक्षेप की संभावना के कारण इसने प्रत्यक्ष युद्ध को स्थगित कर दिया। फिर इन्होंने एक गोपनीय योजना बनाई जिसका नाम रखा गया ऑपरेशन-एजेक्स।

और इस षड्यंत्र के द्वारा वहाँ की लोकप्रिय सरकार को उखाड़कर रजा-शाह पहलवी को सत्ता में लाया गया जो मूलतः पश्चिमी आर्थिक तंत्र के एक मोहरे मात्र थे। फिर बाद में यह सत्ता भी स्थाई नहीं रही और परिणामतः आज ईरान एक “मजहबी” राष्ट्र बनकर रह गया है।

ग्वेतामाला- 1931 से 1945 तक ग्वेतामाला पर जॉर्ज उबिको का शासन था, जो एक अधिनायकवादी शासक था। यहाँ पुनः ध्यान देने की आवश्यकता है कि इसका गठन भी अमेरिका के ही देख-रेख में हुआ था।

उबिको की अराजक और दमनकारी नीतियों से उबकर वहाँ की जनता ने एक व्यापक जन आन्दोलन किया और फलस्वरूप दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जॉन जोस अरेवलो के नेतृत्व में एक लोकतांत्रिक सरकार का गठन 1945 में किया गया।

उन्होंने भी राज्य के संरक्षण में सामाजिक और आर्थिक नीतियों को बढ़ावा दिया। और सफलतापूर्वक कार्यकाल के छह वर्ष पूरे करने के उपरांत चुनाव का निर्णय लिया, लेकिन क्रमिक रूप से परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती गई और अमेरिकन कंपनी और अमेरिकी सरकार के षड्यंत्र से प्रोफेसर अरेवेलो को हटाकर वहाँ एक अलोकतांत्रिक सरकार का गठन करवा दिया गया।

सत्ता में आते ही तानाशाह कार्लोस अर्मास ने अरेवेलो की आर्थिक नीतियों को उलट दिया। और इस तरह ग्वेतामाला में लोकतंत्र की हत्या उसके शैसव काल में ही कर दी गई और तबसे लेकर 1996 तक वहाँ सैनिक शासन का वर्चस्व रहा जिसपर अमेरका का ही नियंत्रण रहा।

ब्राज़ील- लोकप्रिय शासक जोओ गुलार्ट ने 1960 के दशक में ब्राज़ील में चुनाव सुधार किए, अशिक्षित लोगों को भी मताधिकार मिले जो पूर्व में अप्रचलित था। इसके अलावा आर्थिक रूप से निर्बल वर्गों के लिए उसने कई योजनाओं को चालू किया और साथ ही और भी अन्य अनगिनत आर्थिक बड़े निर्णय लिए गए जिससे पश्चिमी कंपनियों का आर्थिक हित प्रभावित हो रहा था।

1964 में अमेरिका और ब्रिटेन ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन ब्रदर सैम के माध्यम से वहाँ सत्ता परिवर्तन कर दिया। गुलार्ट को हटाकर वहाँ जुंटा (विशेष सैन्य अधिकारी) का शासन स्थापित किया गया जो कि लगभग 20 वर्षों तक चला। नई सत्ता ने पश्चिमी पूँजी के लिए अपने द्वार खोल दिए। गुलार्ट ने अपने शासनकाल में जो कुछ भी आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियाँ अर्जित की थीं, वे तीव्रता से तहस-नहस कर दी गईं।

घाना- वर्ष 1957 में घाना अफ्रीका के उन देशों में था जिन्होंने औपनिवेशिक दासता से स्वयं को मुक्त कर लिया था और चुनाव के माध्यम से कुआमे एन्क्रूमा इसके प्रथम राष्ट्रपति बनाए गए थे। एन्क्रूमा ने अपने कार्यकाल में आर्थिक सुधारों के द्वारा घाना की पश्चिमी देशों पर निर्भरता को कम करने का महत्वपूर्ण प्रयत्न किया।

साथ ही उन्होंने राज्य के सामाजिक और आर्थिक सरोकारों को देखते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के द्वारा ग्रामीण व्यवस्था में सुधार किया। विश्व की द्विध्रुवीय सामरिक दलबंदी से इतर उन्होंने गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों में अपना विश्वास दिखाया, जिससे पश्चिमी शक्तियाँ सशंकित हो गई थीं।

अपनी प्रसिद्ध पुस्तक नियो-कोलोनियलिज़्म (1965) में उन्होंने ‘तीसरी दुनिया’ में पश्चिमी हस्तक्षेप का मुखर विरोध किया। उनके विचारों ने ‘तीसरी दुनिया’ के दमित करोड़ों लोगों को एक वैचारिक और राजनीतिक दिशा प्रदान की। पश्चिमी शक्तियों के निशाने पर आने के लिए यह सब पर्याप्त था।

ब्रिटेन व अमेरिका ने उन्हें सत्ता से हटाने के लिए षड्यंत्र रचने प्रारंभ कर दिए और परिणामतः 1966 में पश्चिमी देश अपने लक्ष्य में सफल हो गए। एन्क्रूमा का देश निकाला हो गया और पूरा जीवन उन्हें कोंकेरी, गुवेना में बिताना पड़ा। एन्क्रूमा के स्थानवपर सीआईए ने जुंटा को सत्ता सौंप दिया जिसने आर्थिक तंत्र को एक बार पुनः पश्चिमी अराजक पूँजी के लिए खोल दिया।

इंडोनेशिया- डच शासन से मुक्ति के उपरांत इंडोनेशिया के राष्ट्रवादी नेता सुकर्णों ने यहाँ कई जनोन्मुखी आर्थिक सुधार के माध्यम से विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रभावों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने कई बड़े आर्थिक निकायों का राष्ट्रीयकरण किया और साथ ही देश के भीतर सैनिक तंत्र के प्रभावों को कुचलकर एक लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण की दिशा में उल्लेखनीय पहल की।

लेकिन यह सबकुछ पश्चिमी कॉरपोरेट हितों के प्रतिकूल था। इसके लिए उन्होंने सुकर्णों के धुर-विरोधी सुहर्तों की सहायता ली और सुहर्तों को सैन्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाई। इस सहायता से सुहर्तों ने अनुमानतः 5-10 लाख लोगों का नरसंहार किया जो कि 20वीं सदी के सबसे खौफनाक नरसंहारों में से एक माना जाता है। 1967 तक लगभग सुकर्णों के सारे समर्थकों का सफाया किया जा चुका था।

फिर वहाँ वर्ष 1998 तक सैनिक शासन का बोलबाला रहा जिसने राष्ट्रीय हितों को किनारे रखकर पश्चिमी पूँजी के लिए सेवाएँ दी। सुहर्तों के आर्थिक सलाहकारों में वे लोग थे जो कैलिफोर्निया और बर्कले विश्विद्यालय के पूंजीवादी आर्थिक दर्शन में प्रशिक्षित थे, और इसके लिए फोर्ड फाउंडेशन ने उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता भी प्रदान की। “बर्कले माफिया” के नाम से कुख्यात इन आर्थिक चिंतकों ने सुहर्तों को अपनी अर्थव्यस्था को पश्चिमी पूँजी के लिए खोल देने का विध्वंसक परामर्श दिया।

यूगांडा- वर्ष 1962 में यूगांडा की स्वतंत्रता के उपरांत मिल्टन ओबेतो को चुनाव के द्वारा प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने कार्यकाल के प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने अलोकतांत्रिक पद्धतियों और हिंसा का अनुकरण किया, लेकिन अंतिम वर्षों में उन्होंने अपनी नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन किए।

उसके वर्ष 1969 के ‘कॉमन मैन चार्टर’ का संसद में स्वागत किया गया जिसमें उन्होंने लिखा- “गणराज्य के सभी पुत्र-पुत्रियों के लिए यूगांडा में पूर्ण सुरक्षा, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और कल्याण के प्रति हम समर्पित हैं। कुछ के लाभ के लिए हम भौतिक एवं मानव संसाधनों का दोहन नकारते हैं।”

“निर्धनता, अज्ञानता, रोग, उपनिवेशवाद, नया-उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरुद्ध हम निरंतर लड़ेंगे। लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुसार हमें चलना चाहिए, राजनीतिक शक्ति बहुसंख्याकों के हाथ में होनी चाहिए, अल्पसंख्यकों के नहीं।”, उन्होंने आगे लिखा। यूगांडा का पूर्व औपनिवेशिक शासक ब्रिटेन इससे क्रुद्ध हो गया।

विशेषकर तब जब ओबेतो ने देश के कुछ बड़े औधोगिक प्रतिष्ठानों का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया जिसमें ब्रिटेन की भी कुछ कंपनियाँ थीं। ब्रिटेन और कुछ अन्य पश्चिमी शक्तियों ने मिलकर ओबेतो को सत्ता से बाहर कर दिया और उसके स्थान पर दुनिया के निर्मम तानशाहों में से एक ईदी आमीन को राष्ट्रप्रमुख बनाया गया।

ईदी आमीन ब्रिटिश सेना का एक अधिकारी हुआ करता था और उसने ब्रिटेन को खुश करने के लिए देश के संविधान को निरस्त कर दिया और उसके स्थान पर सैनिक शासन को स्थापित किया। एमनेस्टी इंटरनेशनल के आँकड़े के अनुसार उसने अपने कार्यकाल में कम-से-कम 5 लाख लोगों को मरवा डाला।

कॉन्गो- वर्ष 1960 में पैट्रिस लुमुम्बा एक अखिल-अफ्रीकी आंदोलन का एक लोकप्रिय युवा नेता था, जिसे चुनाव के द्वारा कॉन्गो का उत्तर-औपनिवेशिक शासन का नेतृत्व सौंपा गया था, लेकिन उसे बेल्जियम और अमेरिका ने मिलकर मरवा डाला, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति आइजेन्होवर का प्रत्यक्ष हाथ माना जाता है।

लुमुम्बा अपने दो महीने के अल्प शासनकाल में ही यह स्पष्ट कर चुका था कि विकास का उसका प्रारूप कॉन्गो की जनता और उसके हितों को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा, न कि पश्चिमी बाज़ारवादी दबावों में आकर। उसकी संभावित नीतियों ने पश्चिमी शक्तियों को भयभीत कर दिया था।

लुमुम्बा को केवल मारा ही नहीं गया, बल्कि उसके मृत शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए गए और फिर उसे आग में डाल दिया गया। उसके स्थान पर मोबुतु सेसे सेको को सत्ता में लाया गया जो इतिहास के खूंखार तानशाहों में से एक माना जाता है। अमेरिका और बेल्जियम की सहायता से मोबुतु ने करीब चार दशकों तक कॉन्गो में तानाशाही की। और इन वर्षों में कोंगो विपन्नता का एक बड़ा केंद्र बन गया।

उपरोक्त देशों के अतिरिक्त विश्व के अनेक विकासशील देशों में इस तरह के तख्ता-पलट के प्रयास हुए जैसे गुवेना, क्यूबा आदि देशों में। गुवेना, जो दुनिया की प्रथम लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सत्ता का केंद्र था, उसे 1953 में ब्रिटेन और उसके सहयोगियों ने मिलकर उखाड़ फेंका।

इन सत्ता परिवर्तनों को वैधता प्रदान करने के लिए इन पश्चिमी शक्तियों के पास कोई भी तर्कपूर्ण आधार नहीं था। अगर लोकतांत्रिक संदर्भों में देखें तो इनके हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को या तो कमज़ोर किया या फिर उसे जड़-से ही उखाड़ फेंका। और अगर विकास के संदर्भ में देखें तो इन वर्षों में ये देश विपन्नता के दलदल में ही धँसते चले गए।

अफगानिस्तान में अमेरिका की 20 वर्षों तक उपस्थिति और फिर उसका पलायन पश्चिमी देशों के इन्हीं आर्थिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र निर्माण या आर्थिक विकास से इनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

लेख के लिए कुछ जानकारियाँ जेसन हिकेल (2017) की पुस्तक ‘द डिवाइड: अ ब्रीफ गाईड टू ग्लोबल इनेकुअलिटी एंड इट्स सॉलुसंस’ से ली गई हैं।

केयूर पाठक लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में सहायक प्राध्यापक हैं। चित्तरंजन सुबुद्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में सहायक प्राध्यापक हैं।