विचार
चीनी-आधारित इथेनॉल के ईंधन में सम्मिश्रण की बजाय यह करे सरकार

केंद्र सरकार ने जून 2021 में एक उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना की घोषणा की थी जिसके तहत 2023 तक ईंधन कंपनियों को 20 प्रतिशत इथेनॉल सम्मिश्रण वाला ईंधन बेचना होगा। पहले यह लक्ष्य 2025 के लिए तय किया गया था लेकिन पुनर्विचार के बाद 2023 कर दिया गया जो दर्शाता है कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सरकार कितनी तत्पर है।

कच्चे तेल के बढ़ते मूल्यों ने तेल आयात पर खर्च काफी बढ़ा दिया है जिससे सरकार शीघ्रातिशीघ्र चाहती है कि आयातित तेल पर निर्भरता कम की जाए। वित्तीय वर्ष 2022 की पहली तिमाही (जिसका 30 जून को अंत हुआ) में तेल आयात पर 24.7 अरब डॉलर का खर्च हुआ था। वहीं, आधिकारिक डाटा के अनुसार, पिछले वर्ष इसी अवधि में 8.5 अरब डॉलर खर्च हुए थे।

पिछली अवधि से मात्रा में मात्र 15 प्रतिशत की वृद्धि है लेकिन खर्च तीन गुना हो गया। अब जब कोविड पाबंदियों को हटाया जा रहा है और आर्थिक गतिविधियों सामान्य स्तर पर आ रही हैं तो अपेक्षा नहीं है कि तेल के मूल्यों में अधिक गिरावट होगी।

इथेनॉल उत्पादन संयंत्र लगाने के लिए सरकार निजी कंपनियों को प्रोत्साहन दे रही है। राज्य सरकारों से भी कहा गया है कि वे सहयोग करें और इथेनॉल संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहित करें। कई वर्षों से भारत में चीनी की अधिकता रही है जिससे चीनी-आधारित इथेनॉल बनाने की ओर झुकाव देखा जा रहा है।

चीनी के उत्पादन में लागत अधिक है परंतु न्यूनतम समर्थन मूल्य, राजनीतिक समर्थन और सब्सिडी पर मिले संसाधनों के कारण भारत गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। उच्च लागत के कारण सरकार को निर्यात सब्सिडी भी देनी पड़ती है ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय चीनी को प्रतिस्पर्धा योग्य बनाया जा सके।

कर्नाटक में हो रही गन्ने की खेती

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र देश में चीनी के सबसे बड़े उत्पादक हैं। वहाँ एक चीनी लॉबी है जो राजनेताओं के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करती है। इन राज्यों में चीनी उद्योग में राजनेताओं का भी निहित स्वार्थ होता है जिससे इस क्षेत्र को अत्यधिक सहयोग मिल रहा है और गन्ने की खेती बढ़ती जा रही है।

चिंता का विषय यह है कि गन्ने की खेती बहुत पानी का उपयोग करती है। महाराष्ट्र में पानी का अभाव देखा जाता है लेकिन इसके बावजूद भी गन्ने की खेती पर राज्य अपना काफी पानी व्यय कर देता है। रिपोर्ट किया गया है कि राज्य में खेतीहर भूमि के मात्र 4 प्रतिशत क्षेत्रफल पर गन्ना उगाया जाता है लेकिन राज्य के सिंचाई जल का 70 प्रतिशत का उपयोग गन्ने के लिए होता है।

पिछले कई वर्षों से गन्ने की खेती का क्षेत्रफल तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। लगभग हर वर्ष पानी का अभाव झेलने वाले मराठवाड़ा में भी गन्ना उगाया जाता है। देवेंद्र फडणवीस सरकार ने ओसमानाबाद जिले में गन्ने की खेती पर निर्भरता कम करने के लिए एक योजना आरंभ की थी परंतु क्रियान्वयन समस्याओं के कारण यह विफल रही।

इसके साथ ही, पर्यावरण के लिए किसानों को उनके आर्थिक लाभ को छोड़ने के लिए मनाना भी कठिन हो जाता है। अब जब इथेनॉल को सरकार का समर्थन मिल रहा है तो चीनी के मूल्य बढ़ेंगे जो किसानों को गन्ने की खेती के प्रति और प्रोत्साहित करेंगे।

विश्लेषण बताता है कि एक किलोग्राम चीनी के लिए 2,500 लीटर पानी का उपयोग होता है। शोध में पाया गया है कि अपनी अतिरिक्त चीनी का उपयोग इथेनॉल बनाने के लिए करने वाले ब्राज़िल ने जल कुप्रबंधन के कारण कई सूखे झेले हैं।

गन्ना खेती का दृश्य

कुल मिलाकर यह पूरी प्रक्रिया भारत के पर्यावरण का अहित कर सकती है। हो सकता है कि किसान अनाज की खेती की बजाय गन्ने की खेती ही करने लग जाएँ जो हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती खड़ी करे। अधिक जल का उपयोग करने वाली धान की खेती का स्थान सरलता से गन्ने की खेती ले सकती है यदि चीनी के मूल्य बढ़ते हैं तो।

सही उद्देश्यों के बावजूद चीनी-आधारित इथेनॉल का ईंधन में सम्मिश्रण करना भारत में पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। सरकार को गन्ने की बजाय कम पानी का उपयोग करने वाली माड़ीदार फसलों को इथेनॉल के लिए बढ़ावा देना चाहिए।

चीनी उत्पादन में भारत के पास कोई तुलनात्मक बढ़त भी नहीं है, जिसे आप इस तथ्य से समझ सकते हैं कि निर्यात के लिए सरकार को सब्सिडी देनी पड़ती है। वहीं, मक्का, चारा फसल और अन्य अनाजों से इथेनॉल बनाया जा सकता है और अधिकता होने पर इनका घरेलू उपभोग या निर्यात भी किया जा सकता है।

एक चीनी पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की बजाय इन फसलों को उगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। अवश्य ही गन्ने से अल्कोहोल बनाना कुशल होता है लेकिन चीनी उत्पादन को बढ़ाना या वर्तमान स्तरों पर भी बरकरार रखना कई खेतीहर भूमियों को सूखा प्रभावित कर सकता है।

चीनी पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने अनाज-आधारित डिस्टिलरियों को प्रोत्साहित करने के लिए भी योजनाएँ शुरू की हैं लेकिन इन डिस्टलरियों में कच्चे माल का अभाव न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को दूसरी फसलों के उत्पादन को भी प्रोत्साहित करना होगा।