इन्फ्रास्ट्रक्चर / भारती
टीकाकरण अभियान का शहरी क्षेत्र में विस्तार समझें डाटा से

28 अप्रैल को जब कोविड की दूसरी लहर तेज़ी से बढ़ रही थी, तब स्वराज्य  ने एक लेख में सुझाव दिया था कि शहरों में टीकाकरण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके पीछे का तर्क सरल और सीधा था।

यदि संसाधन सीमित हैं, इस मामले में टीका खुराकों की उपलब्धता, तो उन्हें वहाँ तैनात किया जाना चाहिए जहाँ से सर्वाधिक लाभ हो। अप्रैल अंत तक दूसरी लहर में भारत के शीर्ष शहरों का कोविड आँकड़ों में योगदान प्रत्यक्ष था।

महाराष्ट्र में कुल सक्रिय मामलों में 52 प्रतिशत से अधिक पाँच उच्च शहरी जिलों से थे- पुणे, नागपुर, ठाणे, मंबई और नाशिक। उत्तर प्रदेश, जहाँ शहरीकरण विकसित राज्यों की तुलना में कम है, वहाँ कुल सक्रिय मामलों के एक-तिहाई लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और प्रयागराज से ही आए।

कर्नाटक के सक्रिय मामलों में बेंगलुरु शहरी जिले का योगदान 68 प्रतिशत का था। राजस्थान के एक-तिहाई मामले सिर्फ दो जिलों- जयपुर और जोधपुर से आए। गुजरात में 61 प्रतिशत सक्रिय मामले सिर्फ दो जिलों- अहमदाबाद और सूरत में थे।

हरियाणा के लगभग आधे सक्रिय मामले भी दो जिलों से ही थे- गुरुग्राम और फैज़ाबाद। और यह सूची आगे भी इसी प्रकार है। यदि हम उस समय के भारत के सक्रिय मामले मानचित्र से सर्वाधिक प्रभावित 50 शहरों को निकाल दें तो न तो कोई दूसरी लहर थी, न ऑक्सीजन, वेंटीलेटर या बेड का अभाव।

लेकिन उस समय टीकाकरण की जो गति थी, क्या हम उसके अनुसार बड़े शहरों को पूर्ण रूप से टीकाकृत कर सकते थे? उत्तर है- हाँ, अधिकांश को। हमारे शीर्ष 100 शहरों की कुल जनसंख्या 15 करोड़ है।

मान लें कि 70 प्रतिशत जनसंख्या 18 वर्ष से अधिक आयु की है और 70 प्रतिशत कवरेज का लक्ष्य रखें तो 7.35 करोड़ लोगों को 14.7 करोड़ खुराकें देनी थी। वास्तव में उस समय तक 15 करोड़ खुराकें दी जा चुकी थीं।

यानी समस्या टीका उपलब्धता की नहीं, बल्कि रणनीति की रही। यदि हम टीकाकरण के पहले चरण में सिर्फ शहरों को ही लक्ष्य करते तो शीर्ष 100 शहरों में 70 प्रतिशत के पूर्ण टीकाकृत होने से सामूहिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता के स्तर पर पहुँच जाते।

ऐसे में हम दूसरी लहर से भी बच सकते थे और देश को लाखों मौतों एवं लाखों करोड़ों रुपये के आर्थिक नुकसान से भी बचा सकते थे। दूसरी लहर के बाद तो हमें समझदारी दिखानी चाहिए थी। हमारी बड़ी जनसंख्या के आगे सीमित संसाधनों को देखते हुए सबसे भेद्य क्षेत्र- हमारे शहरों को टीकाकृत करना चाहिए था।

इन्हीं शहरों से तीसरी लहर आने की संभावना है, ये ही अधिकांश मामलों में योगदान करते हैं, अस्पतालों में उच्च भर्ती एवं मृत्यु दर भी यहीं है। तो पिछले चार महीनों में हमने क्या किया? भारत के सर्वाधिक शहरी जिलों को देखें जिनमें 15 लाख से अधिक जनसंख्या के सर्वाधिक जनसंख्या वाले 22 शहर हैं।

इसमें हम गुरुग्राम और नोएडा को भी जोड़ रहे हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी के निकट होने के कारण वे महत्त्वपूर्ण आर्थिक केंद्र हैं। नीचे दिए चार्ट में अगस्त 2021 तक के आधार डाटाबेस के आधार पर शहरी जिलों में रहने वाले 18 वर्ष की आयु से अधिक के लोगों की अनुमानित जनसंख्या है।

100 प्रतिशत से अधिक सैचुरेशन का अर्थ है कि पिछली जनगणना की तुलना में अतिरिक्त लोगों ने इन शहरों में प्रवासन किया। यह वास्तविक जनसंख्या को बेहतर बताता है इसलिए इसे अपर लिमिट जनसंख्या माना जा सकता है।

वहीं, जिन जिलों में सैचुरेशन 100 प्रतिशत से कम है, वहाँ सैचुरेशन को 100 प्रतिशत मानकर जनसंख्या का अपर लिमिट निकाला गया है। हैदराबाद में कितने प्रतिशत लोगों के पास आधार कार्ड है, इसका डाटा उपलब्ध नहीं है।

उपरोक्त चार्ट में उक्त 24 जिलों में एक और दो टीका खुराक लेने वाले लोगों की संख्या है। ऊपर के दोनों चार्ट से हम निकाल सकते हैं कि कितनी प्रतिशत जनसंख्या टीकाकृत हुई है जिसे नीचे दिए गए तीसरे चार्ट में देखिए।

क्रमशः गुरुग्राम, कोलकाता और बेंगलुरु में 99, 94 और 83 प्रतिशत टीका कवरेज को आप अच्छा समझ रहे होंगे लेकिन कुछ और संभावनाएँ भी हैं। या तो आधार कवरेज जितने दिखा रहा है, उससे अधिक जनसंख्या वहाँ हो या हो सकता है कि आस-पड़ोस से लोग वहाँ टीका लेने आए हों।

उदाहरण स्वरूप, दिल्ली में टीके के अभाव के कारण गुरुग्राम और नोएडा में टीका लेने के लिए कई दिल्लीवासी गए थे। कितने प्रतिशत वयस्क जनसंख्या को टीका लगा है, इसके निम्न दिए गए चार्ट में भी उपरोक्त ट्रेंड देखने को ही मिलता है।

इसी चार्ट पर ध्यान दीजिए क्योंकि 18 से कम आयु के लोगों का टीकाकरण अभी शुरू नहीं हुआ है। हैदराबाद को छोड़कर, 23 में से 18 शहरी जिलों ने आधे से अधिक जनसंख्या को टीके की कम-से-कम एक खुराक दे दी है।

लेकिन जब बात पूर्ण टीकाकरण की आती है तो सिर्फ गुरुग्राम ही 50 प्रतिशत के आँकड़े को पार कर पाया है। उसपर भी चिंता की बात तो यह है कि जहाँ पूरे देश में 23 प्रतिशत वयस्क पूर्ण रूप से टीकाकृत हो चुके हैं, वहीं इस सूची के आधे जिले इस आँकड़े से नीचे हैं।

हालाँकि इसका दोष कोविशील्ड की दो खुराकों के बीच तीन महीने के अंतराल को भी दिया जा सकता है क्योंकि देश भर में कुल जितनी खुराकें दी गई हैं, उनमें से 88 प्रतिशत कोविशील्ड की ही थीं।

इस प्रकार हम यह मान सकते हैं कि अगले दो महीनों में दोनों खुराकों से टीकाकृत लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी व एक खुराक से टीकाकृत लोगों के आँकड़े के निकट पहुँच जाएगी। और फिर भारत के शहरी केंद्रों में रहने वाली बड़ी जनसंख्या में बेहतर रोग-प्रतिरोधक क्षमता होगी।

भविष्य से लौटकर वर्तमान में आएँ तो पाएँगे कि हम अपने शहरों और शहरी जिलों पर ध्यान देने में एक बार पुनः विफल हो गए हैं और भगवान् न करे कि इसके कारण तीसरी लहर आए, अन्यथा यह वही गलती होगी जो हमने दूसरी लहर से पहले की थी।

इन 24 जिलों की कुल जनसंख्या 12 करोड़ है और पिछले कुछ महीनों में भारत ने 53 करोड़ टीका खुराकें दी हैं। यदि हम इसका एक-चौथाई भी 25 सबसे बड़े शहरों पर केंद्रित कर देते तो तीसरी लहर की संभावना को नष्ट कर चुके होते।

अब जब टीका खुराकों की आपूर्ति काफी बढ़ गई है तो हमें आशा है कि दीपावली तक हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। किसी भी सूरत में भारत की वयस्क जनसंख्या को इस वर्ष के अंत तक पूर्ण रूप से टीकाकृत करने का लक्ष्य अभी भी हमारी पहुँच में है।