ब्लॉग
फिल्म वीरम् क्यों हुई फ्लॉप? उन्नियार्चा के माध्यम से जानें देवी और आसुरी गुण क्या हैं

जब 2017 में “वीरम्” फिल्म बनी और एक साथ तीन भाषाओं (मलयालम, हिंदी और अंग्रेज़ी) में रिलीज़ हुई तो यह काफी चर्चा में थी। चर्चित होने के बाद भी इसने बॉक्स ऑफिस पर कोई सफलता के झंडे नहीं गाड़े, उल्टा ये चारों खाने चित हो गई।

ऐसा तब था जब इसी कहानी पर आधारित फ़िल्में पहले कई बार सुपरहिट हुई हैं। एक ही कहानी पर कई फ़िल्में क्यों? क्योंकि यह एक लोकगाथा पर आधारित है। जैसे उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में आल्हा-उदल का गायन होता है, कुछ-कुछ वैसे ही वैसे ही दक्षिण में कुछ क्षेत्रों में “वडक्कन पत्तुकल” का गायन होता है।

बॉलीवुड में तो लोकगाथाओं पर फ़िल्में बनाने का साहस अब कम ही होता है, इसलिए आल्हा-उदल फिल्मों में नहीं दिखते, लेकिन दक्षिण में लोकगाथाओं पर अब भी फ़िल्में बन जाती हैं। इसकी कहानी समझने के लिए पहले थोड़ा सा इस लोकगाथा से परिचित होना आवश्यक है।

ये गाथा पुथूरम और थाचोली मनिक्कोथ परिवारों की कहानी हैं। दोनों दो अलग-अलग (थिय्यर और नायर) कुलों के परिवार हैं लेकिन दोनों कलारीपयट्टू की युद्धकला के पारंगत परिवार होते हैं। थिय्यर वंश में अरोमल और उसकी बहन उन्नियार्चा होते हैं, तो नायर प्रमुख थाचोली की भी कई कथाएँ इस गाथा में होती हैं।

जैसा कि लंबी लोकगाथाओं के साथ अक्सर होता है, फिल्म भी पूरी गाथा नहीं, उसके केवल एक भाग पर ध्यान देती है। इस गाथा में गौर करने लायक यह भी है कि इसमें जो उन्नियार्चा है, वह युद्ध कलाओं में उतनी ही प्रवीण नायिका है जितने कि पुरुष।

ये विशेष इसलिए होता है क्योंकि ये उस दौर की गाथा है जब युद्ध की नायिका रही जॉन ऑफ़ आर्क को एक रिलिजन के लोग “विच हंटिंग” में जीवित जला रहे थे। केरल के क्षेत्रों की गाथा की उन्नियार्चा का जिक्र शायद इसलिए नहीं होता होगा क्योंकि यह दशकों के परिश्रम से स्थापित किए गए “हिंदू स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी जाती थी” के नैरेटिव को तोड़ देता।

खैर, वापस लोककथा पर चलें तो अरोमल और उन्नियार्चा के साथ उनका एक दूर-दराज का अनाथ हो चुका रिश्तेदार चंदू भी कलारीपयट्टू सीख रहा होता है। उसे उन्नियार्चा पसंद थी, लेकिन उन्नियार्चा चंदू से नहीं किसी और से विवाह करती है।

इससे चंदू अंदर ही अंदर नाराज़ था और उसे लगता था कि अरोमल ने अपनी बहन की शादी उससे नहीं होने दी। एक बार जब अरोमल का अपने विरोधी अरिन्गोडर से द्वंद्व (अंगम– एक पक्ष की मृत्यु तक का द्वंद्व युद्ध) होता है तो चंदू को अरोमल की सहायता के लिए नियुक्त किया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस द्वंद्व में चंदू ने टूटने वाली कमज़ोर तलवार देकर अरोमल को मरवाने की कोशिश की थी लेकिन टूटी तलवार फेंककर मारने से ही अरोमल ने अरिन्गोडर को मार गिराया। द्वंद्व में घायल अरोमल जब सो रहा होता है तो चंदू सोते हुए अरोमल की हत्या कर डालता है। उन्नियार्चा अरोमल के बेटे को बचाकर ले भागती है।

बाद में उन्नियार्चा का बेटा अरोमल उन्नी और अरोमल का बेटा कन्नपन उन्नी जब बड़े होते हैं और पूरी कहानी जानते हैं, तो वे चंदू से प्रतिशोध लेते हैं। इस कथा का प्रभाव ऐसा है कि जो असर उत्तरी भारत में किसी ब्राह्मण को विभीषण कहने, या किसी राजपूत को मानसिंह कहने का होगा, वैसा ही असर केरल में किसी को चंदू कहने का हो सकता है।

कथा के कारण चंदू का नाम ही “चट्ठियन चंदू” (यानि चंदू धोखेबाज़) पड़ गया है। अब वापस फिल्म पर आते हैं। जैसे कई बार साहित्य में कर्ण की ओर से लिखते समय उसे परिस्थितियों का मारा बताया जाता है, वैसे ही “वीरम्” फिल्म लिखते समय हुआ।

लेखक एमटी वासुदेवन नायर को पहले ही उन्नियार्चा के चरित्र को वास्तविक लोकगाथा से कमज़ोर दर्शाने के लिए काफी कोसा गया था। कथित रूप से नवरसों पर आधारित फिल्मों की शृंखला बना रहे जयराज ने जब चंदू को नायक और उन्नियार्चा को खलनायिका-सा दिखाने का प्रयास किया तो ज़ाहिर है कि फिल्म को फ्लॉप तो होना ही था।

हिंदू सहिष्णु होते हैं, इसलिए किसी ने एमटी वासुदेवन की नाक काट लेने या जयराज का “सर तन से जुदा” के नारे नहीं लगाए हैं। जैसा कि कुछ लोग अंदाज़ा लगा चुके होंगे, हमने आपको लोककथाओं और उनपर आधारित “वीरम्” के ज़रिए, केवल फिल्म की कहानी तो बताई नहीं होगी।

फिल्म की कहानी के बहाने से हमने आपको भगवद्गीता के 16वें अध्याय के कुछ शुरुआती श्लोक बता दिए हैं। भगवान् श्री कृष्ण देवी और आसुरी गुणों की चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि किन 26 गुणों से युक्त कोई मनुष्य देवी स्थिति में आ जाता है–

श्री भगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3

इनका अर्थ (स्वामी रामसुखदास जी की टीका के अनुसार) है, “श्री भगवान् बोले– भय का सर्वथा अभाव; अंतःकरण की शुद्धि; ज्ञान के लिए योग में दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इंद्रियों का दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालन के लिए कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणी की सरलता (पहला श्लोक); अहिंसा, सत्य भाषण; क्रोध न करना; संसार की कामना का त्याग; अंतःकरण में राग-द्वेषजनित हलचल का न होना; चुगली न करना; प्राणियों पर दया करना, सांसारिक विषयों में न ललचाना; अंतःकरण की कोमलता; अकर्तव्य करने में लज्जा; चपलता का अभाव (दूसरा श्लोक); तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीर की शुद्धि, वैरभाव का न रहना और मान को न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन! ये सभी दैवी संपदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं। (तीसरा श्लोक)”

अब जब आप लोकगाथा के अरोमल और उन्नियार्चा को देखेंगे तो आपको यही गुण दिखाई दे जाएँगे। फिल्म की उन्नियार्चा में भले न हों, लेकिन फिल्म में भी जो अरोमल का किरदार है, वह कर्तव्य पालन पर ध्यान देता है।

वह सरल है, कोई छल कपट नहीं करता, राग-द्वेष से मुक्त है, कामनाओं का उसमें अभाव है, चुगली नहीं करता, बैर नहीं पालता, वह लोगों को प्रभावित करता है, क्षमा करता है। लगभग ये सभी 26 गुण अरोमल में दिख जाएँगे।

तुलनात्मक रूप से जब आप देखेंगे तो पाएँगे कि अगले ही श्लोक में भगवान् असुरी संपदा की बात करते हुए केवल छह अवगुण गिनवाते हैं! ज़ाहिर है कि अच्छा बनना कठिन होगा और दुष्ट बनना सरल, ये संकेत भी कर दिया गया है –

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4

हे पार्थ! दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी संपदा है। इस श्लोक को देखने के बाद आप सोच सकते हैं कि फिल्म की उन्नियार्चा में ये अवगुण थे क्या? तब आपको लगेगा कि कहानी को शेक्सपियर के “मैकबेथ” के हिसाब से तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश के बाद भी फ़िल्मकार उन्नियार्चा में ये गुण प्रत्यारोपित नहीं कर पाए हैं।

जबकि चंदू धोखेबाज के चरित्र में आसानी से आपको ये सभी दिख जाएँगे। अपने युद्ध कौशल के लिए उसे झूठा दंभ है, अपने उन्नियार्चा के लिए उचित वर होने का अज्ञान है, उसकी वाणी कठोर है, उसमें दर्प भी दिख जाएगा।

यहाँ गौर करने लायक यह भी है कि कभी-कभी भाषा को स्त्रीविरोधी या मर्दवादी घोषित किया जाता है। ऐसी अफवाहें उड़ाने वाले कहते हैं कि गालियाँ तक स्त्रियों के नाम पर दी जाती हैं। गौर कीजिए कि यहाँ “पारुष्य” शब्द आता है, जिसका अर्थ होगा, डाँटकर, असभ्य या गलत तरीके से बोलना या बात करना। यह शब्द भी स्थापित नैरेटिव पर फिट नहीं बैठता!

बाकी लोककथाओं के अनुसार उन्नियार्चा के पुत्र अरोमल उन्नी ने बाद में चंदू की पुत्री से विवाह किया था। वह स्वयं समर्थ थी, लेकिन उसने चंदू को मारा भी नहीं था। इसलिए उसपर आपको 16वें अध्याय के दूसरे श्लोक से राग-द्वेष, क्रोध का न होना, अहिंसा और लज्जा जैसे गुण भी दिख जाएँगे।

इनके अलावा भी कई श्लोकों को इन संदर्भों में देखा जा सकता है। हमने जो लोककथा और फिल्म के माध्यम से बताया है, वह नर्सरी स्तर का है, और पीएचडी के लिए आपको स्वयं भगवद्गीता पढ़नी होगी, ये तो याद ही होगा?