इन्फ्रास्ट्रक्चर
वास्तव में कोविड महामारी का डाटा कहता है कि भारत को खोलने का समय आ गया है

सितंबर से त्यौहारों का दौर शुरू हो जाएगा। मौसम परिवर्तन और मानसून की वापसी भी आरंभ हो जाती है। गणेश महोत्सव, नवरात्रि और दीपावली में ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्ति के बाद वर्ष अंत तक खरीददारियों का दौर भी चलता रहेगा।

इन सब की दृष्टि से पिछला वर्ष कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण फीका रहा था। लॉकडाउन से लोगों की आय प्रभावित रही तो त्यौहारों पर तुलनात्मक रूप से खर्च भी कम किया गया। अब जब पुनः वह समय आ गया है तो दुविधा है कि क्या किया जाए।

एक तरफ वे लोग हैं जो महामारी के कारण प्रलय का संकेत देते हैं, जो तीसरी लहर के नाम पर नाकारात्मकता और भय फैलाते रहते हैं। अपनी बात रखने के लिए वे हाल में बढ़ रही परीक्षण सकारात्मकता दर (टीपीआर) को प्रस्तुत करते हैं।

वे दावा करते है कि कई राज्यों ने जो विद्यालय खोलने का प्रस्ताव रखा है, उससे संक्रमण फिर बढ़ेगा। साथ ही केरल में कोविड कुप्रबंधन को देखते हुए भय फैलाने की संभावना काफी बनी हुई है और लोग मानते हैं कि तीसरी लहर का आना तय है।

यह सब दो तथ्यों के बावजूद है। पहला, भारत की टीकाकरण दर प्रतिदिन 60 लाख खुराकों से अधिक के औसत पर पहुँच गई है और विश्वास है कि सितंबर में टीकाकरण की दर 70 लाख खुराक प्रतिदिन रहेगी। दूसरा, चिंता का कोई नया प्रकार अभी तक नहीं उभरा है।

इसी बीच भारत एक दिन में 1 करोड़ टीका खुराकें देने का कीर्तिमान भी बना चुका है और कुछ दिनों पहले ही भारत ने अपनी 50 प्रतिशत वयस्क जनसंख्या को कम-से-कम एक कोविड टीका खुराक देने का मील का पत्थर भी प्राप्त किया था।

वहीं, दूसरी ओर स्वराज्य के संपादकीय निदेशक आर जगन्नाथन ने लिखा था कि अत्यधिक सावधानी का समय अब चला गया है और सभी कोविड नियमों के साथ अब सार्वजनिक स्थानों को खोलना होगा ताकि अर्थव्यवस्था गति पकड़ सके और लोगों को रोजगार मिल सके।

हमारे विकृत भय को त्यागने का समय आ गया है, वे कहते हैं और बताते हैं कि अधिकांश लोगों के लिए वायरस मात्र एक बाधा है। हालाँकि, सरकारों के लिए ऐसा निर्णय लेना राजनीतिक रूप से मुश्लिक है क्योंकि अयोग्य प्रशासन को कई बार पता ही नहीं होता कि क्या करना है।

उनकी सहायता मैं इस लेख के माध्यम से करना चाहता हूँ जिसमें इस प्रश्न पर बात होगी कि हम किसी डाटा को देख रहे हैं और वह डाटा वास्तव में कहता क्या है। उत्तर आलोकित करने वाले हैं (टीपीआर चार्ट देखें)। पहला, कुल राष्ट्रीय डाटा से निष्कर्ष निकालना भ्रामक है।

यह सही तरीका नहीं होगा क्योंकि केरल के कारण यह डाटा काफी विकृत है। दूसरा, यदि हम राष्ट्रीय डाटा और केरल डाटा को अलग कर दें तो पाएँगे कि टीपीआर वास्तव में घट रहा है, बढ़ नहीं रहा। तीसरा, पिनराई विजयन के क्षेत्र को छोड़कर शेष भारत खुलने के लिए तैयार है।

विश्लेषकों एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने काफी समय से टीपीआर पर अत्यधिक ध्यान दिया है। इसी कारण से कई टिप्पणीकार और ‘विशेषज्ञ’ रोने लगे जब राष्ट्रीय टीपीआई बढ़ने लगा (बैंगनी रेखा)। हालाँकि हम देख सकते हैं कि इस वृद्धि में अकेले केरल का ही योगदान है।

यदि हम केरल को हटा दें तो शेष भारत में स्थिर गिरावट दिखाई देगी। वास्तव में केरल को हटाकर राष्ट्रीय टीपीआर मात्र 0.9 प्रतिशत है, परंतु केरल के साथ 2.6 प्रतिशत है। यह 65 प्रतिशत का अंतर है जो चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि दैनिक मामलों का दो-तिहाई केरल से ही रिपोर्ट किया जा रहा है।

जब हम राष्ट्रीय संचयी सकारात्मकता (सीपी) का ग्राफ केरल के साथ और केरल के बिना बनाते हैं (उपरोक्त चार्ट) तो भी यही स्थिति देखने को मिलती है। एक अंधा सकल विश्लेषण हमें बताता कि राष्ट्रीय सीपी 7 प्रतिशत है (बैंगनी रेखा), जबकि केरल को हटाकर सीपी 6.5 प्रतिशत है (लाल रेखा)।

यह अंतर आपको अधिक नहीं लगेगा, परंतु है क्योंकि सीपी में गिरावट देखने में महीने भर से अधिक का समय लग जाता है। साथ ही, हम यह भी देख सकते हैं कि दोनों के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है यानी कुल सीपी की तुलना में केरल को छोड़कर राष्ट्रीय सीपी में अधिक तेज़ी से गिरावट हो रही है।

इसे समझाने के लिए हरी रेखा बनाई गई है जिसमें आप दे सकते हैं कि अंतर बढ़ता जा रहा है। यह चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि दुर्भाग्यवश केर में संचयी सकारात्मकता अब गिरने की बजाय बढ़ रही है। अब नीचे तीसरा चार्ट देखिए जो सीपी बनाम प्रति 10 लाख लोगों में परीक्षण का है।

लाल रेखा में देखिए कि केरल का सीपी बढ़ता जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है जो भारी कुप्रबंधन को दर्शाता है। यह उस दावे को भी खोखला सिद्ध कर देता है कि मार्कसवादी सरकार ने अच्छा प्रदर्शन किया है क्योंकि प्रति 10 लाख लोगों पर केरल में अधिक परीक्षण हुए हैं।

मैं स्पष्ट कर दूँ कि प्रति 10 लाख लोगों पर अधिक परीक्षण और अधिक लोगों का संक्रमित पाया जाना, अयोग्यता की निशानी है तथा इसमें सफलता की कोई बात नहीं है। अंतर समझने के लिए आप उत्तर प्रदेश को देखें (तीसरे चार्ट में काली रेखा)।

संक्रमण रोकने में कौन-सी सरकार सफल रही है, यह प्रत्यक्ष है। 10 प्रतिशत जनसंख्या का परीक्षण करने से पहले उत्तर प्रदेश ने महामारी को नियंत्रित कर लिया। साथ ही, 20 प्रतिशत जनसंख्या का परीक्षण होने से पहले सीपी 3 प्रतिशत के नीचे चला गया।

इसे कहा जाता है कार्य-कुशलता। वहीं, दूसरी ओर, केरल ने अपनी 60 प्रतिशत जनसंख्या का कोविड परीक्षण कर लिया है और सीपी अब भी 14 प्रतिशत है व बढ़ रहा है। निस्संदेह ही केरल में वामपंथी सरकार की यह अकुशलता पूरे देश के लिए खतरा है।

लेकिन यदि हमें आगे बढ़ना है तो शेष भारत का आकलन इस मार्कस्वादियों द्वारा खड़े किए गए खतरे को परे रखकर कना होगा। सकल डाटा एक उपयोग से मात्र एक भ्रामक नकारात्मक चित्र उभरता है। यदि आवश्यकता पड़े तो केंद्र को राज्य की सीमाएँ सील कर देनी चाहिए।

इसका कुछ राजनीतिक मूल्य होगा लेकिन कम-से-कम दूसरे राज्य तो तीसरी लहर के भय के बिना वापसी कर सकेंगे। कुल मिलाकर बात यह है कि राष्ट्र में महामारी की स्थिति जितनी सोची जा रही है, उससे बेहतर है।

इस प्रकार सितंबर का माह एक अवसर है जिसमें हम सामान्य गतिविधियों पर धीरे-धीरे और सोच-समझकर लौटने की ओर बढ़ें। आर्थिक गतिविधियों के शुरु हो जाने से शीघ्र ही कमाने और खर्च करने का समय आएागा।

अंतिम बात- भारत का टीपीआर वास्तव में गिर रहा है और गिरकर वह 1 प्रतिशत से भी कम हो गया है यदि हम केरल के डाटा को अलग रखें तो। ऐसा ही संचयी सकारात्मकता के साथ है। यह नई जानकारी उन सरकारों को विश्वास दिलाएगी जो शीघ्र गतिविधियाँ खोलने के पक्ष में हैं।

साथ ही टीकाकरण दर में भी वृद्धि जारी रहनी चाहिए, ताकि आने वाले त्यौहारी मौसम का लाभ खुदरा खरीद और बिक्री से सभी लोग उठा सकें।

वेणु गोपाल नारायणन एक स्वतंत्र पेट्रोलिम कन्सल्टेन्ट हैं जो ऊर्जा, भूराजनीति, समसामयिक विषयों व चुनावी आँकड़ों पर दृष्टि रखते हैं। वे @ideorogueके नाम से ट्वीट करते हैं।