विचार
समान नागरिक संहिता क्यों एक सांप्रदायिक नहीं, बल्कि हितकारी एजेंडा है

गृहमंत्री अमित शाह द्वारा हाल ही में दिए गए बयान कि “समान नागरिक संहिता को लागू किया जाएगा” पर देश में ज़ोरदार बहस चल रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक प्रकार के विचार हैं, होना भी चाहिए। कुछ लोग इसे अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, मुस्लिमों आदि की पहचान को मिटाने का षड्यंत्र और भाजपा का एक सांप्रदायिक एजेंडा बता रहे हैं।

उनका दावा है कि इससे राष्ट्र की बहुल-संस्कृति का नुकसान होगा और समाज में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ेगा, आदि। यह भी भ्रम फैलाया जा रहा है कि यह भोजन, पहनावे, रहन-सहन, सोच-विचार और आस्था आदि को एक समान किए जाने की भाजपाई नीति है।

ऐसे दावे कितने सही हैं इसपर चर्चा से पहले यह खास तौर पर ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भाजपा के राजनीतिक एजेंडे में आने से बहुत पहले से ‘समान नागरिक संहिता’ संविधान निर्माताओं, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, न्यायाधीशों के लिये गंभीर विमर्श का विषय रहा है और समय-समय पर इसकी अपरिहार्यता पर बल दिया गया।

एक ‘पंथनिरपेक्ष’ राष्ट्र-राज्य में एक समान संहिता का न होना कहीं-न-कहीं से मजहबी मतांधता और अलगाववाद को बढ़ावा देगा जिसका आभास डॉ अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद और केएम मुंशी आदि से लेकर अनेक संविधान निर्माताओं को था और इसलिए उन्होंने ‘समान नागरिक संहिता’ को लागू किए जाने की वकालत की थी।

लेकिन दुर्भाग्य से जब कभी इसे लाए जाने की बात शुरू होती है तो विभिन्न समुदायों को भ्रमित करने का राजनीतिक प्रयास किया जाता है। और यह विरोध अगर देखा जाए तो राजनेताओं, तथाकथित अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों आदि की तरफ से ही अधिकतर देखा जा सकता है, न कि आम जनता द्वारा।

इसे ऐसे दिखाया जाता है कि मानो इससे अल्पसंख्यक समुदायों का अस्तित्व खतरे में आ सकता है। यह वास्तव में वोट बैंक की राजनीति के कारण होता आया है। जैसे ‘पर्सनल लॉ बोर्ड’ को वैधानिक मान्यता दिया जाना इसी वोट बैंक में सेंध लगाने का एक माध्यम रहा है।

‘पर्सनल लॉ बोर्ड’ के नाम पर मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक के लिए प्रयोग करना देश हित में नहीं हो सकता। यह देश विभाजन का कारण बन सकता है जिसे हमने पहले भी भारत विभाजन के रूप में देखा है। संविधान सभा के एक सदस्य केएम मुंशी ने भी साफ-साफ लिखा था- भारत एक सेक्युलर राज्य है इसलिए ‘पर्सनल लॉ’, जैसे उत्तराधिकार, विवाह, तलाक आदि के कानून को मजहबी आधार पर नहीं स्वीकार किया जा सकता; एक मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए एक समान नागरिक संहिता आवश्यक है।

लेकिन इसके बावजूद जब कभी इसकी मांग की गई तो मुस्लिम “भावनाएँ आहत” होने के भय से इसे खारिज किया जाता रहा। यहाँ भावनाएँ नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के ‘वोट बैंकों’ के नुकसान का खतरा था। मजहबी कानूनों को अंतिम सच मानने वालों को समझना चाहिए कि बदलते हुए समय में इसकी सीमाएँ हैं और समय के साथ ही इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसे खारिज किया जा सकता है।

मजहबी कानूनों में नितांत रूप से समावेशी दर्शन का अभाव होता है। ऐसे कानून कई स्तरों, जैसे लिंग, जाति, प्रजाति आदि के आधार पर दमन और भेदभाव को बनाए रखते हैं। हिंदू कानून में भी ऐसी विसंगतियों को देखते हुए कई संविधानिक प्रावधान किए गए और जिसे हिंदू समाजों ने स्वीकार किया।

कई इस्लामी राज्यों ने भी ‘इस्लामिक कानूनों’ को समय के साथ या तो अमान्य करार दिया या फिर उसमें गंभीर बदलाव किये, और इस संदर्भ में ट्यूनीशिया का उदाहरण महत्वपूर्ण है। वैसे लोग जो यह मानते हैं कि ‘शरियत’ के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता उसे पाकिस्तान के लाहौर प्रांत के प्रख्यात न्यायाधीश जे हक़ के विचार पर मंथन करना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा-

‘यह सही नहीं होगा अगर यह माना जाए कि न्यायालय को यह अधिकार नहीं है कि वह पूर्व के न्यायाधीशों और इमामों द्वारा कुरान की व्याख्या में कोई हस्तक्षेप करें। इस तरह के विचार अपने आप में ही मजहब और इसके कानून के बहुआयामी और वैश्विक चरित्र को खतरे में डालने के समान है’।

स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण के समय संविधान सभा के कुछ “गणमान्य” मुस्लिम सदस्यों ने शरियत के ‘अचल’ होने का दावा किया था, लेकिन डॉ अंबेडकर ने इसे एक सिरे से खारिज कर दिया। यहाँ अंबेडकर ने जो कुछ कहा उसे उनकी ही पंक्तियों में समझा जा सकता है-

वर्ष 1935 तक शरियत कानून उत्तर-पश्चिम प्रान्त में प्रचलन में नहीं था। इसने उत्तराधिकार और अन्य मामलों में हिन्दू कानूनों का ही अनुकरण किया था। मुस्लिम प्रचलन से हिंदू कानूनों को तो वर्ष 1939 में केंद्रीय प्रावधानों के तहत हटाया गया था। इसके अतिरिक्त वर्ष 1937 तक केंद्रीय प्रांतों, मुंबई आदि के विशाल हिस्सों में मुस्लिम समाज उत्तराधिकार के मामलों में हिंदू कानूनों का ही पालन करता आया था।

इसी तरह उत्तरी-मालाबार में वहाँ का क्षेत्रीय विधान ‘मौरुमाक्काथ्यम’ हिंदू और मुस्लिम समाजों में समान रूप से स्वीकृत था। यह कितना बड़ा पाखंड है कि ‘दंड संहिता’ के मामलों में मुस्लिम विद्वानों और प्रतिनिधियों ने सांविधानिक प्रावधानों का कभी विरोध नहीं किया, जबकि आज भी अनगिनत मुस्लिम देशों में दंड संहिता इस्लामिक कानूनों से ही चलता है; सऊदी अरब इसका ज्वलंत उदाहरण है।

इनके मजहबी कानूनों में चोरी के आरोपी का हाथ काट दिया जाना, व्यभिचार के दोषी को मृत्युदंड दिया जाना प्रचलित है। इतना ही नहीं, महिलाओं की इन कानूनों में क्या हैसियत है इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि महिला गवाह की वैधता तय करने के मामलों में दो महिला गवाह एक पुरुष गवाह के बराबर माने जाते हैं। यह शर्मनाक है! इससे मजहबी कानूनों की महिला-विरोधी चरित्र का पता चलता है जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे की स्थिति प्राप्त है।

‘शरियत’ कानून को अमान्य करार देने से जिन्हें यह भय है कि इससे मुस्लिम पहचान संकट में आ जाएगी तो गोवा में पुर्तगालियों के समय से ही वहाँ यह लागू है, लेकिन मुस्लिम पहचान तो कभी वहाँ संकट में नहीं आई! सर्वोच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 44 से यह कहते हुए पल्ला नहीं झाड़ सकता कि यह महज संविधान के नीति निदेशक सिद्धांत का हिस्सा है और इसे सीधा-सीधा लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनेक विवादों में कई न्यायाधीशों ने इसके लागू किए जाने की अनिवार्यता पर बल दिया था, जैसे शाहबानो विवाद, चिनप्पा रेड्डी मामले आदि में।

‘पर्सनल लॉ’ और इसके दुरुपयोग को देखते हुए कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘समान  नागरिक संहिता’ लागू करने की बात की, जिसे मुदगल बनाम भारतीय गणराज्य (1995) और कुलदीप सिंह बनाम सहाई (1995) के मामलों में देखा जा सकता है।

कई इस्लामिक कानून से चलने वाले देशों में भी ‘इस्लामिक कानून’ के सभी पक्ष मान्य नहीं हैं। तुर्की के सिविल कानून के अनुच्छेद 74 के तहत न्यायालय दूसरे विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है अगर पहले से ही पहली पत्नी है। पाकिस्तान में वहाँ के एक कानूनी काउंसिल की अनुमति से ही दूसरा विवाह मान्य माना जाता है। और महिला का पति अगर दूसरा विवाह कर लिया हो तो उसे अपने पति से तलाक का अधिकार है।

ईरान में न्यायालय की अनुमति के बिना दूसरा विवाह मान्य नहीं है। ट्यूनीशिया में एक से अधिक विवाह गैर-कानूनी है। ईरान, अल्जीरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों में शरीयत के अंतर्गत हुए विवाहों को भी सरकारी कार्यालयों में पंजीकृत कराना होता है। इसलिए कोई आधार नहीं बनता कि समान नागरिक संहिता का विरोध किया जाए।

‘समान नागरिक संहिता’ भारत के एक संविधानिक और पंथनिरपेक्ष स्वरुप को बनाये रखने के लिए अनिवार्य है, साथ ही यह सांप्रदायिक संघर्षों को भी नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। ‘समान नागरिक संहिता’ न तो समाज और संस्कृतियों की बहुलता में बाधक है और न ही इससे किसी मजहब विशेष की पहचान को खतरा है। यह समानता के सिद्धांत पर समाज और राष्ट्र को गढ़ने का प्रावधान मात्र है। मध्यकालीन सोचों और परंपराओं से निकल एक नए वैज्ञानिक समाज के निर्माण की दिशा में यह पहला कदम है।

संविधान के ‘नीति निर्देशक सिद्धांत’ में शामिल विषयों को अनिवार्य नहीं माना जाना एक बड़ी भूल मानी जानी चाहिए, क्योंकि ‘नीति निर्देशक सिद्धांत’ राज्य की मार्गदर्शिका है और जिसे अनिवार्य ही माना जाना चाहिए, न कि संविधान का कोई अवांछित विषय जिसे बस अलंकरण के लिए संविधान में रखा गया है, अंबेडकर ने इसे संविधान का ‘नॉवेल फीचर’ माना।

संविधान के ‘नीति निर्देशक सिद्धांत’ के अनुच्छेद 44 में इस बात की स्पष्ट रूप से चर्चा है कि एक ‘समान नागरिक संहिता’ राज्य का एक अहम् विषय है और जहाँ तक हो सके इसे व्यापक तौर पर लागू करने का प्रयास किया जाना चाहिए। जब संविधान में ऐसे प्रावधान पहले से ही हैं तो इसे अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वैसे भी ‘भारतीय दंड संहिता’ को मुस्लिम सहित अन्य अल्पसंख्यक समाज प्रारंभ से ही मानता आया है उसपर उन्हें कभी आपत्ति नहीं हुई है।

और इसलिए अनुच्छेद 44 को कभी अनुच्छेद 15 (धर्म, प्रजाति, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। ‘समान नागरिक संहिता’ मूलतः ‘पंथ’, ‘मजहब’ आदि के आधार पर होनेवाले भेदभावों के विरुद्ध एक प्रावधान है, न कि यह किसी भी प्रकार से ‘मजहब’ या ‘समुदाय’ विशेष के प्रति भेदभाव से युक्त कोई राजनीति। विभिन्न समुदायों के भीतर ऐसी अनेक कुरीतियाँ और मध्यकालीन परंपराएँ हैं जिससे उस समाज के लोगों, विशेषकर महिलाओं का भयंकर शोषण हो रहा है। ‘समान नागरिक संहिता’ से सभी समुदायों को उत्तराधिकार, विवाह, तलाक आदि में होनेवाले भयंकर भेदभावों से मुक्ति मिल सकती है।

केयूर पाठक राजस्थान स्थित रैफल्स यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। चितरंजन सुबुधि तमिलनाडु सेंट्रल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।