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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की 160वीं जयंती पर देखें भारतीय सिनेमा ने कैसे दी उन्हें श्रद्धांजलि

स्वतंत्रता सैनानियों की वीर गाथाएँ किसी-न-किसी माध्यम से अगली पीढ़ियों को बताई जाती रही हैं जिससे भारतवासी अपनी स्वतंत्रता के पीछे हुए बलिदानों को समझकर अपनी स्वतंत्रता का मूल्य जानें। इन माध्यमों में साहित्य, कथन-श्रवण अथवा फिल्म सम्मिलित हैं।

लेकिन सबसे प्रभावशाली माध्यम फिल्म को ही माना जाता है क्योंकि फिल्म आपके दृश्य और श्रव्य को पूर्णतः संयुक्त कर किसी भी कथा या घटना का संपूर्ण अनुभव देती है। साथ ही महान व्यक्तित्वों की पुण्य स्मृति के लिए व उन्हें प्रेरणा-स्रोत के रूप में प्रदर्शित करने के लिए फिल्म एक महत्त्वपूर्ण साधन बन चुका है।

1857 की क्रांति में अंग्रेज़ी शासन को अस्थिर करने वाले प्रबल सैनानियों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई सबसे प्रबल मानी जाती हैं जो अपने युद्ध कौशल और बुद्धिमता के कारण अंग्रेज़ों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरीं। उनके कृत्यों के स्मरण व उनके योगदानों को श्रद्धांजलि देने में भारतीय सिनेमा की भूमिका जानते हैं-

आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही 1953 में सोहराब मोदी द्वारा निर्मित रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित ‘झाँसी की रानी’ नामक एक फिल्म आई थी जिसमें मेहताब ने रानी की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म इतनी प्रभावशाली थी कि यह अग्रेज़ी में ‘द टाइगर एंड द फ्लेम’ से 1956 में रिलीज़ हुई।

इतने वर्षों बाद अब ज़ी स्टूडियो द्वारा निर्मित ‘मणिकर्णिका-द क्वीन ऑफ़ झाँसी’ नामक फिल्म 25 जनवरी 2019 को रिलीज़ होने वाली है। इसमें कंगना रानाउत रानी लक्ष्मीबाई की मुख्य भूमिका निभा रही हैं।

2009 से 2011 के बीच ज़ी टीवी पर “झाँसी की रानी” नामक एक धारावाहिक प्रसारित हुआ था जिसमें रानी के पूरे जीवन घटनाक्रम का विस्तार से नाटकीय वर्णन था।