रक्षा
पाकिस्तान और भारत के समीकरण काफी बदल गए हैं, पूरा कश्मीर लक्ष्य होना चाहिए

भारत और पाकिस्तान के बीच कलह चिरपरिचित है। इस व्यापक विषय के अनेकानेक आयामों में से सबसे महत्त्वपूर्ण कश्मीर मुद्दे पर हम विमर्श करेंगे। किन-किन मुद्दों ने दोनों देशों के दृष्टिकोण को बनाया? दोनों की वैचारिक बैठक क्या है? इन सभी प्रश्नों की चर्चा हम कश्मीर के विषय के सर्वेक्षण के माध्यम से करने का प्रयास करेंगे। ‘पृथ्वी के नंदनवन’ के अतीत, वर्तमान और भविष्य का दृष्टिक्षेप ही हमारी मीमांसा की बुनियाद बनेगा, जिससे हम इन दो राष्ट्रों की कथा का कुछ सारांश आत्मसात कर पाएँगे ।

अतीत : 1947-2014

1947 में अंग्रेज़ शासन की संध्या में मुस्लिम लीग द्वारा प्रणीत और जिन्ना द्वारा प्रायोजित “दो क़ौमी नज़रिया” की आड़ में देश के विभाजन को स्वीकृति मिली। चरमपंथी हिंसा में अखंडित भारत को क्षत-विक्षत किया गया, व लाखों की संख्या में लोगों ने अपनी जान गँवाई। उसके संदर्भ में हुए व्यापक नरसंहार ही प्रतिध्वनियाँ आज तक सुनाई देती हैं।

“हिंदू व मुसलमान प्रजा एकरूप नहीं, व भारतवर्ष के मुस्लिम-बहुल इलाके पाकिस्तान को दिए जाएँ” की माॅंग से पहली बार कबीलाई घुसपैठियों के द्वारा कश्मीर की मुस्लिम-बहुल रियासत पर धावा बोला गया। अपनी रियासत को बचाने के लिए कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत की सहायता माँगी व अपनी रियासत को भारत में विलीन कर दिया।

कश्मीर युद्ध में भारतीय सेना की शौर्यगाथा हमें चिरपरिचित है और रहेगी। परंतु युद्ध-स्थिति के कारण अस्थाई रूप से कश्मीर की परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए नवीन भारतीय राष्ट्र के संविधान में धारा 370 को बलात् लागू किया गया। चिरस्थाई रूप से भोले-भाले आशावादी प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की मंशा यह थी कि इस समस्या का जल्द ही समाधान हो जाएगा, अतः यह धारा “घिसते-घिसते घिस जाएगी”। कश्मीर का एक-तिहाई भाग पाकिस्तान के अनधिकृत नियंत्रण में ही रह गया।

इसके बाद 1965 में पाकिस्तान ने अपना दुस्साहस पुनः दोहराया। परंतु फिर एक बार युद्ध में पाकिस्तान कश्मीर पर अपना नियंत्रण जमाने में असफल रहा। इसमें प्रमुख वजह यह थी कि सामान्य कश्मीरी ने उनका साथ नहीं दिया– उलट, आक्रंता पाकिस्तानी सेनानियों की स्थिति की सटीक जानकारी भारतीय सेनाओं तक पहुॅंचाने का बहुमूल्य काम स्थानीय चरागाहों ने किया।

इस हार के बाद फ़ील्ड मार्शल अय्यूब खां ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के विरुद्ध “हज़ार वर्षीय युद्ध” की घोषणा कर डाली। भारत को तुरंत सचेत हो जाना चाहिए था कि एक नया तूफ़ान उसकी पश्चिमी सीमाओं पर जन्म ले रहा है। परंतु ऐसा हुआ नहीं। वहीं, पूर्वी पाकिस्तान में घटते हुए भयंकर नरसंहार से लाखों की तादाद में शरणार्थियों  को भारत की ओर रुख करने पर विवश किया।

इस त्रासदि के दबाव के चलते प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने युद्ध का निश्चय किया। अतः 1971 में पाकिस्तान का बड़ा हिस्सा, भारत की सहायता से टूटकर, एक नया राष्ट्र बना– बांग्लादेश। परंतु युद्ध में प्रचंड जीत को शिमला करार में हारकर भारत पुनः निद्रित हो गया। यह क्यों हुआ? पाकिस्तान भला टूटा ही क्यों? इस प्रश्न का उत्तर लेखक की दृष्टि में यह है कि दोनों राष्ट्र आत्मबोध में पूरी तरह से विफल नज़र आते हैं ।

भारत के बहुतांश राज्यकर्ताओं को अपने स्वयं के ही देश की जीवनशैली व उसकी गति पर संभ्रम रहा है। मूलरूप से भारत देश अंग्रेज़ शासन की थाती पर बसा है या वह उसके विशाल इतिहास व सांस्कृतिक धरोहरों का पुरोधा है, इसी पर प्रायः सभी सरकारें संभ्रमित ही रही हैं। इसके कारण, शांतिप्रियता या सैन्यबल को मज़बूत करना, साम्यवाद या पूँजीवाद, भारतीय परंपरा विरुद्ध पाश्चात्य जीवन, जैसे सभी मुद्दों पर स्वतंत्र भारत के राज्यकर्ताओं में संभ्रम व कलह ही बढ़ता गया।

वहीं, जनसामान्य का मत सदा ही स्पष्ट रहा है। जनमत में यह सभी धारणाएँ परस्पर-विरोधी नहीं, पूरक हैं। परंतु प्रशासन में इस कलहजन्य सुस्ती के परिणामस्वरूप, बाहरी षड्यंत्रों के बारे में सचेत रहने की क्षमता 1971 के युद्ध के बाद धीरे-धीरे क्षीण होती गई। अय्यूब खां की चेतावनी बधिर कानों पर पड़ी। 1971 के युद्ध के बाद इसी असमंजस ने शिमला करार को “बड़प्पन” के लालच में मान्य होने दिया गया।

इसके बिल्कुल विपरीत, पाकिस्तान का वरिष्ठ वर्ग अपने आप के बारे में संभ्रमित नहीं। प्रमुखतः सभी सेनाधिकारी व पंजाबी राजनेता “दो क़ौमी” नज़रिये के पुरज़ोर समर्थक हैं। उनका विचार उन्हें यह निष्कर्ष देता है कि प्रस्तुत धर्मविशेष के प्रति श्रद्धा ही एकता का मूल बन सकती है। इसके सामने प्रादेशिक या पंथोपपंथ के कलह अपने आप ही गौण हो जाएँगे। उलट, वहाॅं के प्रजाजन अपने बारे में संभ्रमित हैं। क्या वे पहले मुसलमान हैं, या पंजाबी-सिंधी-पश्तो-बलोच-बंगाली?

बंगाली मुसलमानों की राय में प्रादेशिक पहचान ही महत्त्वपूर्ण साबित हुई, और इतिहास गवाह है कि 1971 युद्ध के कारण पाकिस्तान को अपनी अर्धाधिक प्रजा से हाथ धोना पड़ा, व अपने पूर्वी विभाग का समूल नाश झेलना पड़ा। पाकिस्तान के सुस्पष्ट दृष्टिकोणी अधिकारियों ने यहाॅं करारी हार पाई, परिणामसवरूप उन्होंने “दो क़ौमी नज़रिया” को और आक्रामक बनाकर इस्लामिक कट्टरपंथ को ही राष्ट्रीय विचारधारा बना दिया, ताकि प्रादेशिकपन को शह मिल सके।

अपनी हार का बदले लेने की भावना से पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने उस घटना के पश्चात् “हज़ार वर्षीय युद्ध” की रणनीति को अधिक बल दिया। 1977 में पाकिस्तान में सैन्य तख़्तापलट के बाद जनरल ज़िया का राज शुरू हुआ। इसके उपरांत ज़िया के राज में इस दोहरी (कट्टरपंथ + भारत से बैर) विचारधारा को और तेज़ी मिली। इस दीर्घकालिक युद्ध का अंतिम लक्ष्य था भारत के कई हिस्से तोड़ना, व भारतीय राष्ट्र का संपूर्ण पतन।

इसी रणनीति के तहत भारत में तरह-तरह की अलगाववादी ताक़तों को मदद पहुॅंचाई जाने लगी। खालिस्तान इसमें उल्लेखनीय है। कश्मीर में कट्टरवाद के बीज बोए जाने लगे, ताकि जब गोलियाॅं चलें, तब 1965 के विपरीत वहाॅं की आम जनता कोई ऐतराज़ न जताए। 1971-72 के बाद लगभग 15 वर्षों तक इस विषवल्ली का बीजारोपण होता रहा। कई नईं मस्जिदों का निर्माण हुआ, जहाँ चरमपंथी प्रचार होने लगे।

कई राजनेताओं को भी इस जाल में बुना गया, जिनके माध्यम से पैसे का दुरुपयोग होता। भारत सोता रहा, क्योंकि इन्हें राजनीतिक चुनौती देना सरकारों की स्थिरता को संकट में डाल सकता था। गुप्तचर व सुरक्षा प्रणालियाँ असमंजस में थीं, कि इससे कैसे निपटा जाए। “अस्थाई” धारा 370 एक बड़ी वैधानिक बाधा बन चुकी थी, जिसे हटाए जाने पर केवल बहस ही होती रही।

1980 का दशक आते-आते तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियाँ भी पाकिस्तान के ध्येय को पोषक बन चुकी थीं, चूँकि भारत की अर्थव्यवस्था व मित्र देश सोवियत रूस दोनों ही लड़खड़ाने लगे थे। वहीं, पाकिस्तान के माध्यम से हज़ारों की संख्या में अमेरिकी सीआईए द्वारा प्रशिक्षित मुजाहिदीन लड़ाके रूसियों से लड़ने अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ जाने लगे थे, और रसद के रूप में सालाना अरबों डाॅलर की पाकिस्तान को सहायता की जा रही थी।

उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति रेगन ने तो मुजाहिदों की प्रशंसा में उन्हें व्हाईट हाऊस में बुलाकर “स्वतंत्रता सेनानी” तक घोषित कर डाला। ऐसी परिस्थितियों में इस विषैली फसल की उगाई का समय आ गया, और 1987 के विवादित राज्य चुनावों की आड़ में अफ़ग़ानिस्तान से लौट रहे हज़ारों मुजाहिदों को घाटी की तरफ़ मोड़ दिया गया। जनवरी 1990 से शुरू हुआ हिंसा का तांडव अगले 29 सालों तक चलता रहा।

40,000 लोगों के प्राण लेकर भी हिंसा का दानव लगातार नाचता रहा– इसे रोकने में पाकिस्तान की क्षमताओं से भी अधिक भारत की चिरपरिचित सरकारी संभ्रमावस्था ने ही अधिक बाधा डाली। उस समय पंडितों के पलायन के पापों का परिमार्जन आज भी शेष है। बीच में करगिल युद्ध, आगरा भेंट व 2008 में हुए जघन्य मुंबई के हमले भी इसी हज़ार वर्षीय युद्ध के पहलू हैं, जिसे भारत की तत्कालीन सरकारें पहचानने में असफल ही रहीं।

वर्तमान : 2014 से 15 अगस्त 2021

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद इस परिस्थिति में मूलभूत परिवर्तन आने लगा। पूर्ण बहुमत से किसी का प्रधानमंत्री चुना जाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, परंतु भारत की प्रमुख कांग्रेस-विरोधी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक पूर्व प्रचारक का ऐसे बहुमत से जीतना अपने आप में एक बड़ी बात थी। मोदी सरकार संभवतः प्रथम ही ऐसी सरकार है, जहाँ कम-से-कम राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में कोई मतभेद नहीं।

इसका प्रमाण मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होते समय दिए गए कई साक्षात्कार हैं, जहाँ वे इस विषय पर गोलमोल बातें बिल्कुल नहीं करते। उनके ही शब्दों में, “गोली-बमों की आवाज़ में बातें नहीं सुनाई देतीं”। ऐसे में इस “हज़ार वर्षीय युद्ध” का एक नया अध्याय शुरू हुआ । सर्वप्रथम पाकिस्तान में विद्यमान नागरिक सरकार के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को मनाने के प्रयास हुए, परंतु पर्दे के पीछे की ताक़तों ने अपने पैंतरे चलाए और नागरोटा-ऊड़ी के आतंकवादी हमले करवाए।

ऊड़ी हमले के बाद समीकरण बदलने लगे, जब भारत ने पहली ही बार प्रत्युत्तर देना प्रारंभ कर दिया। सर्जिकल स्ट्राईक ने पहली बार भारत के संकल्प का विश्व को परिचय करवाया। परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि यह युद्ध हज़ार वर्षीय है– सम्मुख शत्रु भी प्रबल है, व अनुभवी है। अतः सर्जिकल स्ट्राईक के बाद पाकिस्तान के दाॅंव-पेंच बदले व बुरहान वानी जैसे अंतर्गत तत्वों के द्वारा हिंसा फैलाने के प्रयास शुरू हुए।

वानी के खात्मे के बाद नित्य ही पत्थरबाज़ी के मामले होते रहे, और लोगों की जान खतरे में पड़ती ही रही। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-कश्मीर की सरकार गिरा दी व वहाँ धारा 370 के अनुरूप राज्यपाल शासन लागू हो गया। इन घटनाओं के समाधान पर भाजपा द्वारा चालित भारत सरकार में कोई संभ्रम नहीं था। 2017-19 के बीच “ऑपरेशन ऑल आऊट” के तहत सेना ने सैंकड़ो की संख्या में आतंकवादी मार गिराए।

परिणामस्वरूप पैंतरा पुनः बदला। पुलवामा में बड़ी वारदात को अंजाम दिया गया, जिसमें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 44 कर्मी मारे गए । परंतु इस आत्मघाती हमले के प्रत्युत्तर व बालाकोट एयरस्ट्राईक ने दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। मोदी के पुनः प्रधानमंत्री बनने के बाद एक ओर आतंकवादियों का सफाया करने के लिए सेना को खुली छूट दी गई, दूसरी ओर संसद को ही जम्मू-कश्मीर का शासनतंत्र चलाने का दायित्व सौंपने के राजनीतिक-वैधानिक दाॅंव-पेंच खेले गए।

1 मार्च 2019 को “जम्मू-कश्मीर आरक्षण (सं) अध्यादेश” नामक एक अध्यादेश लक्षणीय है। इसके द्वारा तत्कालीन राज्य में आरक्षण पद्धति में फेरबदल करने का मसौदा अध्यादेश रूप से पारित हुआ। इसी को जुलाई 2019 में संसदीय विधेयक का रूप मिल गया। परंतु इस सामान्य विधायी घटना में रोचक यह है कि “जम्मू-कश्मीर राज्यपाल की सम्मति ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा की सम्मति” इस सूत्र को न्यायिक मान्यता मिली।

इसी वैधानिक सूत्र का लाभ उठाकर 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति अनुदेश के तहत धारा 370 का निरसन हुआ। इस के बाद जम्मू एवं कश्मीर में दो वर्षों तक मोटे तौर पर शांति का वातावरण बना रहा। वहीं अन्य मोर्चों पर भी पहली बार भारत ने इस हज़ार वर्षीय युद्ध को सच्चे अर्थ में लड़ना प्रारंभ किया।

2018 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एफएटीएफ द्वारा “ग्रे सूची” में नामित किया जाना, 1 मई 2019 को मौलाना मसूद अज़हर का संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूची में चीन के विरोध के बावजूद संलग्न होना या पाकिस्तान के साथ बहुतांश व्यापार करने पर रोक लगाना इसके उदाहरण हैं। इसी संकल्प शक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है कि जब भारत एक राष्ट्र के रूप में सकारी स्तर पर कुछ ठान ले, तो क्या कुछ संभव है।

वहीं 1980 के दशक की अनुकूल परिस्थितियाॅं अब पाकिस्तान के लिए उलट चुकी हैं। इस घटनाक्रम में सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी है 2011 में अमरीकी विशेष सेनाओं द्वारा अबोटाबाद में ओसामा बिन लादेन को ढूंढकर मार गिराना। इस एक ही घटना ने उनकी साख को सदा के लिए क्षति पहुँचा दी। दिशाहीन अर्थव्यवस्था, व्यापक भ्रष्टाचार व अपने अंदर पनपने वाले इस्लामिक कट्टरपंथ के भस्मासुर ने अब स्वयं पाकिस्तान को ही जलाना शूरू कर दिया है।

वहीं भारत की अर्थव्यवस्था अब 1980 के दशक से कई गुना बढ़कर विश्व में सबसे गतिशील बन चुकी है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ही पाकिस्तान की समूची अर्थव्यवस्था से लगभग दोगुने आकार का बन चुका है, और सैनिक-सामरिक रूप से भारत की तुलना चीन से अधिक की जा रही है। अमेरिका ने भी 9/11 की वारदातों का दंश झेलकर मुजाहिदों का घोर विरोध आत्मसात किया है, जो भारत के लिए अत्यंत लाभकारी है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी भारत की ज़िद को मानते हुए 26/11 के एक बड़े सरगना को भारत को सौंपने की कार्रवाई शुरू की है। संकल्प की शक्ति का इससे स्पष्ट उदाहरण नहीं। परंतु, 2020-21 की कोरोना महामारी के बाद भारत के लिए एक विचित्र पेंच फँसा जा रहा था- अफ़ग़ानिस्तान। अब अफ़ग़ानिस्तान की भारत-पाकिस्तान संबंधों में निहित भूमिका का हम विश्लेषण करेंगे, ताकि हमें भविष्य की घटनाओं का कुछ संदर्भ प्राप्त हो।

भविष्य : 15 अगस्त 2021-?

अफ़ग़ानिस्तान का इतिहास बहुत लंबा है, व हमारी इस चर्चा से कुछ दूर का है। अतः महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर ही हम ध्यान केंद्रित करेंगे। 1947 से लेकर आज तक पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी संबंध कटु ही रहे हैं। इसका महत्त्वपूर्ण कारण है, कि उस भूभाग का पश्तो समाज दो हिस्सों में बँटा है– आधा सीमा के इस पार व आधा उस पार।

पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में प्रवेश देने का भी अफ़ग़ानिस्तान ने विरोध किया था, इस आधार पर कि डुरांड रेखा नामक उनकी सीमा न्यायसंगत नहीं और पाकिस्तान का खैबर प्रांत अफ़ग़ानिस्तान के हवाले किया जाए। अतः स्वाभाविक रूप से अफ़ग़ानिस्तान ने भारत के साथ मित्रतापूर्वक संबंध बनाना उचित माना। यह विषय पाकिस्तान को हमेशा से खटकता रहा है।

अतः जब अमेरिका और रूस के शीतयुद्ध के कारण रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर रूस ने 1979 में आक्रमण किया, तब पाकिस्तान ने ही मुजाहिदों को रूसियों से लड़वाने की पेशकश अमरीका से की थी। शीतयुद्ध की शत्रुताओं से मूढ़ अमेरिका ने इस चाल को अपना पूरा आशीर्वाद दिया। वहीं, इन मुजाहिदीन लड़ाकों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए आईएसआई ने तालिबान नामक संगठन का निर्माण किया, जिनके लगभग सभी लोगों ने पाकिस्तानी मदरसों से ही तालीम हासिल की है।

वहीं दूसरे विकल्प के रूप में “हक्कानी नेटवर्क” नामक अपराधी गुट का भी आईएसआई ही जनक है, जिन्होंने मुजाहिदों के लिए हथियार उपलब्ध करवाए। 1992-95 के कालखंड में इन्हीं दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान में खूनी गृहयुद्ध चलाया, जिसके बाद वहाॅं पहली बार 1996 में तालिबान का शासन आया।

इस शासन को तीन ही देश मानते थे- सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात और पाकिस्तान। 1998 में हुआ कंदाहर विमान अपहरण कांड तालिबान की ही सहायता से हुआ, और इसी घटना के चलते आज मसूद अज़हर पाकिस्तान में खुलेआम आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे सकता है। अतः भारत की तालिबान से पुरानी ही शत्रुता है।

2001 में 9/11 की वारदात के बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया, और तालिबान को अपने ठिकानों से खदेड़ भगाया। परंतु मूर्खतापूर्ण नियोजन के कारण पाकिस्तान की भूमिका को पूरी तरह भुला दिया गया, और तालिबान को पाकिस्तानी बीहड़ों में आईएसआई का आश्रय मिलता ही रहा। परिणाम यह हुआ, कि अमरीकी युद्ध-नीति को करारी हार मिली, और 15 अगस्त 2021 को अमरीका द्वारा बनाए गए राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ताजिकिस्तान भाग गए।

तालिबान की इस विजय के बाद पाकिस्तान द्वारा प्रेरित आतंकवाद के पुनः ज़ोर पकड़ने के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं। तालिबान-नियंत्रित अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवादियों को आश्रय आसानी से मिलने की संभावना है, जहाँ से वे कश्मीर घाटी में घुसकर पुनः आतंकवाद को बढ़ावा दे सकें। इसी उपलक्ष्य में हिंदू व सिखों की लक्षित हत्याओं के सत्र ने देश को व्यथित कर दिया है।

बिहार-उत्तरप्रदेश से आए कई कामगारों की निर्मम हत्याएँ भी इसी दुःखद घटनाक्रम का हिस्सा हैं। इस के मद्देनज़र गृह मंत्री अमित शाह की इस केंद्र-शासित प्रदेश की तीन-दिवसीय यात्रा के मायने बहुत हैं। विगत कुछ दिनों में चलाए जा रहे अभियानों में सुरक्षाबलों की हानि होते हुए भी कम-से-कम 15 आतंकियों को मार गिराया गया है।

लक्षण यही प्रतीत होते हैं कि भारतीय सेनाएँ पूरे दम से कश्मीर में व्याप्त आतंकवादियों और उनके सरपरस्तों पर कार्रवाई करेगी। परंतु यह नहीं भूलना चाहिए, कि यह युद्ध हज़ार वर्षीय है, सम्मुख शत्रु भी प्रबल है, व अनुभवी है। पुनः एक बार पैंतरे बदलकर पाकिस्तान ने अब “सम्मिश्र” (हाइब्रिड) आतंकियों को बढ़ावा देना शुरू किया है।

आगे चुनौतियाँ व अप्रिय घटनाएँ बढ़ने के ही आसार दिखाई पड़ रहे हैं।  इनसे निपटने के लिए भारतीय शासन-प्रणाली को अत्यंत स्पष्टता से नीतियाँ बनानी होंगीं– पुराने संभ्रम की अब कोई जगह नहीं है। मोदी सरकार ने अब तक जो दृढ़ निश्चय दिखाया है, उसे और भी मज़बूत बनाए रखना होगा। इस बार परिस्थितियाँ भारत के ही पक्ष में हैं, अतः भारत को इनका पूरा-पूरा लाभ उठाना आवश्यक है।

तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, बड़ी जनसंख्या व तक़नीकी कौशल का समागम भारत है। वहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नीचांक छूती दिख रही है, निरक्षर व निरंतर बढ़ती जनसंख्या का बोझ अब उसे सताने लगा है। सध्यस्थिति में उसकी नीतियों से अधोगति का मार्ग स्वयं ही दिखाई देता है। ऐसे में एफएटीएफ, यूएनएससी व अन्य सभी अंतर-राष्ट्रीय संस्थाओं पर भारत सरकार ने पूरा दबाव बनाने की आवश्यकता है।

नया भारत उदीयमान है, व अपनी क्षमताओं को जानता है– पुराने भारत की तरह वह किंकर्तव्यविमूढ़ या संभ्रमित नहीं है। सरकारी क्षेत्र को भी यही चाहिए कि जब तक आतंकवाद का प्रायोजन और पाक-व्याप्त कश्मीर पर कोई सकारात्मक प्रगति नहीं होती, तब तक दबाव बना रहना चाहिए।

पाकिस्तान को याद रहना चाहिए, कि उसकी सामान्य जनता का मानसिक असमंजस उसके लिए त्रासदी का मार्ग बन सकता है, और यह अंतरकलह आतंकवाद के प्रायोजन से अधिकाधिक बढ़ेगा। पाक-व्याप्त कश्मीर के बिना भारत अधूरा है, और उसके अंतिम निर्णय के बिना हमारी कहानी अधूरी ही रह जाएगी। भविष्य की दिशा सरकार के संकल्प की परीक्षा बनकर उबरेगी, यह निश्चित है। ऐसे में भारत के लिए भगवद्गीता का श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है–

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

निखिल नाईक विद्युत अभियांत्रिकी के शोध छात्र हैं। वे भू-राजनीति एवं भारत की प्रगति गाथा में रुचि रखते हैं।