विचार / शिक्षा-नौकरी
टीसीएस की ‘स्मार्ट हायरिंग’ का निजी महाविद्यालयों और नौकरियों पर क्या होगा प्रभाव

भारत की शीर्ष सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों में से एक टाटा कन्सल्टेन्सी सर्विसेज़ (टीसीएस), जो आईटी नौकरियों के लिए कॉलेज कैम्पस से स्नातक अभ्यर्थियों के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से भी एक है, ने निर्णय लिया है कि वह अपनी नियुक्ति पद्धति बदलेगी।

टीसीएस, इन्फोसिस, कॉग्निज़ेंट, एक्सेन्च्योर व अन्य आईटी कंपनियाँ प्रतिवर्ष दसों सहस्रों नए लोगों की भर्ती करती हैं और अभी तक वे इसके लिए चयनित महाविद्यालयों पर निर्भर रहती थीं। इन कंपनियों को उपहासपूर्वक ‘मास (सामूहिक) कंपनी’ कहा जाता है क्योंकि अपने वार्षिक कैम्पस नियुक्ति अभियान में ये भारी संख्या में लोगों को नियुक्त करती हैं।

विशेषकर शीर्ष निजी महंगे महाविद्यालय इन नियुक्तियों की संख्या दिखाकर अपना प्रचार करते हैं। हम प्रायः ऐसे समाचार पढ़ते हैं कि फलाना महाविद्यालय ने रिकॉर्ड प्लेसमेन्ट करके लिमका बुक में अपना स्थान बनाया, जैसा कि यहाँ देखें। हालाँकि, अब कैम्पस पर नियुक्ति की पद्धति संकट में है और कुछ वर्षों में यह विलुप्त हो सकती है।

यह काफी लंबे समय से होना था लेकिन इसे जल्दी कर देने का दोष हम कोविड-19 वैश्विक संकट को दे सकते हैं। टीसीएस ने अपनी ‘स्मार्ट हायरिंग’ योजना की घोषणा की है जहाँ 19 नवंबर को राष्ट्रीय स्तर पर हाल में स्नातक हुए अभ्यर्थियों का परीक्षण किया जाएगा और उसके बाद साक्षात्कार के दौर होंगे।

कंपनी में 5.28 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं और इस योजना के तहत 30,000 और लोगों को नियुक्त करना चाह रही है टीसीएस। वित्तीय वर्ष 2021-22 के पूर्वार्ध में अधिकांशतः कैम्पस नियुक्ति के माध्यम से लिये गए 40-45,000 अभ्यर्थियों के अतिरिक्त यह 30,000 नियुक्तियाँ होंगी।

यह तरीका अपनाने का एक कारण हो सकता है कि कोविड-19 के कारण आई मंदी के बाद आर्थिक गतिविधियों में उछाल से प्रतिभा की माँग बढ़ गई है। साथ ही कंपनियों को छोड़कर जाने वाले कर्मचारियों की समस्या बढ़ रही है और टीसीएस जैसी कंपनियों के लिए यह सामान्य है। वर्तमान दर 11.5 प्रतिशत है और यह बढ़ सकती है।

टीसीएस कार्यालय

टीसीएस के सीईओ राजेश गोपीनाथन कैम्पस से बाहर की नियुक्तियों का समर्थन करते हुए कहते हैं कि इससे अधिक कैम्पसों में जाने से बचा जा सकेगा, पहुँच बढ़ेगी और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि गुणवत्ता के स्तर के लिए संस्थान पैमाना नहीं होंगे।

“गुणवत्ता को जन्म देने के लिए अब हम संस्थानों पर निर्भर नहीं हैं। हम व्यक्तियों को देख सकते हैं।”, इकोनॉमिक टाइम्स से उन्होंने कहा था। वर्तमान में ‘स्मार्ट हायरिंग’ योजना सिर्फ बीसीए, बीएससी (गणित, सांख्यिकी, भौतिकी, रसायन-शास्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, जीव रसायन-शास्त्र, संगणक विज्ञान, आईटी) और सीएस/आईटी में बीवोक से 2020, 2021 और 2022 में स्नातक होने वालों के लिए है।

हालाँकि, सीईओ की बातों से लगता है कि इसकी काफी संभावना है कि कंपनी कैम्पस में जाकर नियुक्ति करने की पूरी प्रक्रिया को ही बंद कर दे। कम-से-कम यह तो होगा ही कि कैम्पस के बाहर से की गई नियुक्तियों से ही अधिकांश कर्मचारी आएँगे।

“पारंपरिक पद्धति में कई कैम्पसों में जाना पड़ता था। हमारी सूची में 700 संस्थान थे और भले ही हम सभी 700 पर दृष्टि रखते थे लेकिन प्रतिवर्ष हम लगभग 300-400 संस्थानों से ही नियुक्ति करते थे। कुछ वर्षों पहले हमने एनक्यूटी (नेशनल क्वालिफायर टेस्ट) नामक मंच-आधारित नियुक्ति के साथ प्रयोग किया।

इससे हम 2,000 से अधिक संस्थानों में पहुँच पा रहे हैं। अब हम वांछित गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए संस्थान पर निर्भर नहीं हैं। अब हम व्यक्तियों की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। यदि वे परीक्षा में सफल हो जाते हैं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कहाँ से आए हैं।”, टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक साक्षात्कार में गोपीनाथन ने कहा था।

“एनक्यूटी में वे किस स्तर पर सफल होते हैं, इसके आधार पर उनके साथ वालों से उनका भत्ता काफी अलग हो सकता है, 100 प्रतिशत अधिक तक। यदि कोई व्यक्ति निचले स्तर पर नियुक्त हुआ है, तो उसके पास भी कई अवसर हैं कि वह करियर के अगले पड़ाव पर पहुँचे।

20 वर्षों पहले अधिकांश स्नातक अभ्यर्थी चीज़ें तब सीखते थे, जब वे हमारे पास आते थे। आज, हमारे खुद के लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं, जब हम देखते हैं कि कैसी द्रुत गति से हैकाथन, आदि गतिविधियों में युवा प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं।”, उन्होंने आगे कहा।

टीसीएस के सीईओ राजेश गोपीनाथन

ये टिप्पणियाँ महत्त्वपूर्ण हैं और संकेत करती हैं कि उद्योग के नेता किस ओर जा रहे हैं और वे क्या सोच रहे हैं। नौकरियों के भविष्य पर इसका क्या प्रभाव होगा? पहला, दर्जनों महाविद्यालय जो भारी संख्या के कैम्पस प्लेसमेन्ट दिखाकर छात्रों को आकर्षित करते हैं, उनपर सबसे बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि वे अपना सबसे बड़ा आकर्षण खो देंगे।

पिछले डेढ़ दशकों में जो हमने देखा है कि छात्रों से अत्यधिक शुल्क वसूला जाता है, उसे नियंत्रित किया जा सकेगा। शिक्षा की गुणवत्ता में अधिक वृद्धि के बिना ही इन कैम्पसों में विद्यार्थियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। विश्वविद्यालयों, विशेषकर निजी, को आगे बढ़ने के लिए अपनी संचालन पद्धति पर पुनर्विचार करना होगा।

दूसरा, केवल शीर्ष महाविद्यालयों का ही नहीं, बल्कि संगणक विज्ञान जैसी आकर्षक शाखाओं का भी एकाधिकार समाप्त होगा। टीसीएस, इन्फोसिस, आदि आईटी कंपनियों के लिए विद्युत, इलेक्ट्रॉनिक्स, यहाँ तक कि जनपद और यांत्रिकी अभियांत्रिकी जैसे पाठ्यक्रमों से भी अभ्यर्थियों की नियुक्ति करना सामान्य बात है।

ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी प्रवेश परीक्षाओं में भाषाई, तार्किक एवं संख्यात्मक क्षमताओं को ही परखा जाता है। देश में कहीं से भी कोई भी इस परीक्षा में बैठ सकता है और आकर्षक न माने जाने वाले बीएससी, बीसीए, यहाँ तक कि बीवोक पाठ्यक्रमों के लिए भी खुला होने के कारण प्रवेश परीक्षा में प्रतिस्पर्धा और बढ़ जाती है।

पहुँच के लोकतांत्रीकरण का उन दसों सहस्रों छात्रों पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो अच्छे महाविद्यालयों में प्रवेश नहीं पा सके थे परंतु उन्होंने परिश्रम किया और नए कौशलों को सीखने की तत्परता दिखाई। तीसरा, हो सकता है कि नई नियुक्ति पद्धतियाँ 3-4 वर्षों के डिग्री पाठ्यक्रमों को भविष्य में अनावश्यक बना दें।

ऐसा इसलिए क्योंकि यदि कंपनियों को अभ्यर्थियों की केवल तार्किक और संख्यात्मक क्षमता का ही परीक्षण करना है और फिर उन्हें विशिष्ट कौशलों एवं परियोजनाओं के लिए स्वयं प्रशिक्षित करना है तो उनके लिए बेहतर यही होगा कि वे कम आयु में ही अभ्यर्थियों की भर्ती कर लें।

इसकी भी संभावना काफी अधिक है कि विद्यालय के बाद ही कुछ विशिष्ट कौशलों के आधार पर कंपनियाँ अभ्यर्थियों की भर्ती करने लगें और फिर कुछ माहों के पाठ्यक्रम (जो कि ऑनलाइन भी हो सकता है) से उन्हें प्रशिक्षित करके उन्हें योग्य बना दें।

इससे पूरे देश में उच्च शिक्षा का परिदृश्य ही बदल जाएगा। टीसीएस ने आरंभ कर दिया है और शीघ्र ही अन्य कंपनियों को भी ऐसा करना होगा क्योंकि, जैसा कि गोपीनाथन कहते हैं, कैम्पस से बाहर नियुक्ति में सैकड़ों महाविद्यालय जाने से बचा जा सकता है (जो अनावश्यक खर्चों की बचत करेगा) और उनकी पहुँच भी बढ़ेगी।

अब बिचौलियों, अर्थात् महाविद्यालयों पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं है, जब आप अपने संभावित नियोक्ताओं तक सीधी पहुँच बना सकते हैं।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।