इन्फ्रास्ट्रक्चर
टाटा टिगॉर ईवी कैसे बनेगा भारत में इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र का खेल परिवर्तक

भारत के वाहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक कार का खंड अनुभवहीनता से ग्रसित है। तथ्य है कि तुलनात्मक रूप से बाज़ार में मात्र एक सफल उत्पाद है- टाटा नेक्सॉन ईवी जो कि एक सघन एसयूवी है तथा उसका अंतर्दहन इंजन (आईसीई) संस्करण धीरे-धीरे मध्यम आकार की एसयूवी श्रेणी में सर्वाधिक बिकने वाली कारों में से एक बनता जा रहा है।

भारत में अब तक जहाँ हैचबैक का प्रचलन रहा है, वहाँ एक हैचबैक की बजाय एक सघन एसयूवी का देश में सर्वाधिक बिकने वाला ईवी बन जाना टाटा नेक्सॉन ईवी की विशेषताओं पर प्रकाश डालने के साथ यह भी दर्शाता है कि बाज़ार में अच्छे विकल्पों का कितना अभाव है।

इलेक्ट्रिक कारों के बाज़ार में इस ईवी की भागीदारी 70 प्रतिशत है। डिज़ाइन, पाँच-सितारा सुरक्षा रेटिंग, कम मूल्य (प्रतिस्पर्धियों की तुलना में) और लंबी दूरी तय करने की क्षमता (एक चार्च में 312 किलोमीटर (कागज़ों में) और वास्तविकता में 200-250 किलोमीटर जो कई कारकों से प्रभावित होता है)।

हालाँकि, यदि संख्या में देखें तो आँकड़े निराशाजनक हैं। जनवरी 2020 से 5,500 कारें बिकी हैं। भले ही नेक्सॉन सर्वश्रेष्ठ है लेकिन लोगों तक पहुँच बनाने में कुछ समस्याओं का सामना इलेक्ट्रिक कार क्षेत्र कर रहा है।

उदाहरण स्वरूप, दूरी क्षमता और मूल्य दोनों ही आईसीई कारों का विकल्प बनने से इलेक्ट्रिक कारों को रोक रहे हैं, विशेषकर जिस मूल्य पर खुदरा बिक्री हो रही है। यदि ईवी के लिए 13-16 लाख रुपये लगेंगे तो कम-से-कम लोग यह अपेक्षा तो करेंगे ही कि बिना चार्ज के लिए रुके वह और लंबी दूरी तय करे।

यदि कारों की दूरी क्षमता 200-250 किलोमीटर ही रहने वाली है तो मूल्य नेक्सॉन के आईसीई संस्करण के बराबर- 8 से 13 लाख रुपये होना चाहिए। यदि दोनों में से कोई विकल्प व्यवहार्य नहीं है तो मिश्रित श्रेणी आनी चाहिए जिसमें चार्ज खत्म होने के बाद पेट्रोल या डीज़ल पर कार को चलाया जा सके।

लगता है कि इन चुनौतियों को टाटा भी समझता है और टाटा ही एकमात्र कंपनी लग रही है जो अच्छी गुणवत्ता के साथ भारतीय ग्राहकों के लिए सस्ते ईवी लाने में इच्छुक है। पिछले सप्ताह ही नई टिगॉर ईवी का अनावरण किया गया जो अपने पिछले संस्करणों से काफी उन्नत है।

इसमें ज़िपट्रॉन तकनीक का उपयोग है जो अब तक सिर्फ नेक्सॉन ईवी के लिए उपलब्ध थी। “प्रदर्शन, तकनीक, विश्वसनीयता, चार्जिंग और आराम, इन पाँच मज़बूत स्तंभों पर बनी ज़िपट्रॉन तकनीक ने ईवी की क्षमता, उपयोग, विश्वसनीयता और लंबी दूरी को लेकर ईवी पर मिथकों को तोड़ने में टाटा मोटर्स की सहायता की है।”, आनंद कुलकर्णी ने कहा।

2019 में टाटा ने ज़िपट्रॉन का विमोचन किया था और दावा किया था कि अत्याधुनिक पावरट्रेन ईवी तकनीक से इसे घरेलू रूप से विकसित व निर्मित किया गया है। इसमें एक अत्यधिक कुशल स्थाई चुंबक एसी मोटर है जो आवश्यकता के अनुसार उच्च प्रदर्शन देता है।

साथ ही इसमें उद्योग की सर्वश्रेष्ठ धूल व पानी से बचाव की प्रणाली है जो आईपी67 मानकों पर खरा उतरती है। इसके अलावा, स्मार्ट रीजेनेरेटिव (पुनर्जीवित होने वाली) ब्रेकिंग का उपयोग करके ज़िपट्रॉन यात्रा के दौरान भी बैटरी को चार्ज करता है।

ज़िपट्रॉन तकनीक के कारण ही टाटा पहले (21.5 किलोवाट.आर जो इस वर्ष की शुरुआत में जारी किया गया था) से बड़े (26 किलोवाट.आर) बैटरी पैक को समा पाया जो पहले से अधिक दूरी तय करने की क्षमता भी देगा (पहले के 213 किलोमीटर की बजाय कागज़ पर अनुमानित 350 किलोमीटर)।

सिर्फ इतना ही नहीं, बैटरी शीघ्र चार्ज हो जाएगी और कार का मूल्य भी लगभग पिछले मूल्य जैसा ही रहेगा (लगभग 10 लाख रुपये, कम-से-कम आधारभूत संस्करण के लिए)। यदि मूल्य थोड़ा और अधिक भी होता है, तब भी उपलब्ध सब्सिडियों से यह भारत की सबसे सस्ती ईवी बन जाएगी।

केंद्र की फेम-2 सब्सिडी योजना के अनुसार, नेक्सॉन और टिगॉर, दोनों ही 1.5 लाख रुपये की सब्सिडी (15 किलोवाट.आर बैटरी क्षमता तक प्रति किलोवाट.आर पर 10,000 रुपये की सब्सिडी) के लिए पात्र हैं। दिल्ली जैसे राज्यों में केंद्र के अलावा 1.5 लाख रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी भी है।

इसके अलावा कई राज्यों में ईवी पर कोई सड़क कर या पंजीयन शुल्क नहीं लगेगा जो कुल मिलाकर 4.5 लाख रुपये तक की सब्सिडी पर पहुँच जाता है। तो यदि टाटा, टिगॉर ईवी के श्रेष्ठतम संस्करण का मूल्य 11-13 लाख रुपये भी रखती है तो भी दिल्ली जैसे राज्यों में यह सड़क पर 8-10 लाख रुपये की श्रेणी वाली कार हो जाएगी।

टिगॉर एक सिडान है और कुछ कारणों से इसका आईसीई संस्करण ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाया है। हो सकता है डिज़ाइन, आकार या मूल्य कारण रहे हों पर मुख्य बात यह है कि जो लोग प्रतिष्ठा के लिए कार खरीदते हैं, इसने उन ग्राहकों को नहीं लुभाया है।

हालाँकि, उपयोग की अर्थव्यवस्था पर विचार करने के बाद हो सकता है कुछ ग्राहक इसकी ओर आकर्षित होंगे। हालाँकि, इतनी उच्च सब्सिडी का बोझ सरकार पर ही आएगा जो प्रतिवर्ष लाखों करोड़ों रुपये सब्सिडी पर खर्च कर देगी, विशेषकर तब जब ईवी क्रांति गति पकड़ ले।

इस प्रकार सरकार को शीघ्र ही तय करना होगा कि सब्सिडी देने में इसे किसे प्राथमिकता देनी है। हल्के व्यवसायिक वाहनों को इसके लिए चुना जाना चाहिए, साथ ही यात्री वाहनों को भी जिनपर निजी स्वामित्व है लेकिन उनका प्रयोग टैक्सी सेवा के लिए होता है (पीले नंबर प्लेट वाली गाड़ियाँ)।

पाँच वर्ष पहले कुल कारों में से 9 प्रतिशत कारें टैक्सी सेवा में थीं लेकिन अपेक्षा है कि अब तक यह आँकड़ा 15-17 प्रतिशत पर पहुँच गया होगा। यदि सरकार पैसा वसूल के सिद्धांत पर चलना चाहती है तो उसे इसी श्रेणी की कारों को सब्सिडी से लक्ष्य करना चाहिए।

अब टिगॉर ईवी का (अनुमानित) अर्थशास्त्र समझते हैं- मान लें कि 3 लाख रुपये की सब्सिडी और सड़क कर से छूट मिले तो 8 लाख रुपये खर्चा करके आप यह कार खरीद सकते हैं। टाटा ने बैटरी पैक पर 1.6 लाख किलोमीटर की गारंटी दी है।

यदि टिगॉर ईवी कैब दो वर्षों के लिए प्रतिदिन 220 किलोमीटर चलती है तो (100 रुपये प्रति लीटर का पेट्रोल मूल्य और 20 किलोमीटर का माइलेज लेकर) ईंधन पर 8 लाख रुपये बचाए जा सकते हैं जो कि कार के मूल्य के बराबर है।

मान लें कि इस अवधि के बाद बैटरी पैक बदलवाना पड़े और अनुमान है कि 2023 तक प्रति किलोवाट.आर लागत 100 डॉलर हो जाएगी, तो नए बैटरी पैक को खरीदने में 2 लाख रुपये लगेंगे और तब भी 6 लाख रुपये की बचत होगी।

मध्यम या उच्च वर्ग के लिए यह एक बड़ी राशि नहीं होगी लेकिन व्यवसायिक उद्योग में खेल परिवर्तक सिद्ध होगी जहाँ चालक कार की लागत को पुनः प्राप्त कर सकेगा। जब ईंधन नहीं लगेगा तो ईएमआई पर लिया हुआ वाहन भी भारी नहीं पड़ेगा तथा चालकों की आय में वृद्धि होगी।

अवश्य ही सरकार उन्हें और राहत दे सकती है तथा ईवी टैक्सी चालकों के लिए ब्याज दर कम कर सकती है। 10 लाख रुपये की लागत में 500 किलोमीटर तक जाने वाला ईवी असली खेल परिवर्तक होगा। तब तक 250-300 किलोमीटर दूरी क्षमता का ईवी 10 लाख रुपये की लागत पर परिवर्तन शुरू करेगा, ऐसा ही है टिगॉर ईवी।