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तमिलनाडु में धर्मपुरम अधीनम के मुखिया को पालकी में ले जाने की प्रथा पर लगा प्रतिबंध

तमिलनाडु में एक जिला कलेक्टर ने ऐतिहासिक धर्मपुरम अधीनम के मुखिया को पालकी में ले जाने की प्रथा की अनुमति देने से मना कर दिया। यह राज्य के ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण शैव धार्मिक संस्थानों में से एक है।

16वीं शताब्दी में स्थापित यह संस्था शैववाद को बढ़ावा देने और मतांतरण करने वाली शक्तियों के विरुद्ध हिंदू धर्म की रक्षा करने में सबसे आगे रही है।

प्रतिबंधित किए जाने वाले अनुष्ठान को ‘पट्टिना प्रवेशम’ कहा जाता है, जिसमें संस्था के प्रमुख के शिष्य अपने गुरु को पालकी पर बिठाकर ले जाते हैं। यह वर्ष में एक बार होने वाला आयोजन है।

हालाँकि, इसको अनुमति ना दिए जाने का एक राजनीतिक संदर्भ भी है क्योंकि मठ ने हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल को कई कार्यक्रमों में आमंत्रित किया था। यह एक ऐसा तथ्य है, जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को अच्छा नहीं लगा होगा क्योंकि राज्यपाल व उनके बीच कई बार विवाद देखने को मिला है।

इसके अतिरिक्त, मठ हमेशा हिंदू प्रथाओं और परंपरा के पक्ष में खड़ा रहा है, जिसे सत्तारूढ़ द्रमुक ने कमजोर करने का प्रयास किया है।

मठ और उसके पुजारी नियमित रूप से भाषाई रूढ़िवाद के विरुद्ध खड़े होते रहते हैं। वे एक धार्मिक भाषा के रूप में संस्कृत के उपयोग का समर्थन करते हैं, जो द्रमुक को नहीं भाता है।

ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक संस्था मदुरै अधीनम के प्रमुख ने सरकार के प्रतिबंध की निंदा की है। उन्होंने कहा है कि अगर प्रतिबंध नहीं हटाया गया तो वह व्यक्तिगत रूप से धर्मपुरम अधीनम के पुजारी को अपने साथ रखेंगे।