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तालिबान 2.0- पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को यूएस क्यों अलग दृष्टि से देखता है

पर्दा उठ चुका है। वर्षों तक पाकिस्तान ने नाटक किया कि तालिबान स्वतंत्र है और 1994 में बने इस आवारा आतंकवादी संगठन पर इस्लामाबाद का सीमित नियंत्रण ही है परंतु वह कहानी अब समाप्त हो चुकी है।

संयुक्त राज्य (यूएस) और नाटो ने 2001 में जब तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से हटाया, तबसे पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेस इंटेलीजेंस (आईएसआई) ने पश्चिमी सैनिकों पर आतंकवादी हमले करने के लिए तालिबान के नेताओं को हथियार देना जारी रखा।

अपनी सुविधानुसार वॉशिंगटन ने 1947 में ही इस्लामाबाद के साथ भू-राजनीतिक मित्रता कर ली थी। यूएस व सोवियत संघ के मध्य शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अपने भविष्य की डोर अमेरिका से बांध ली थी। भारत ने गुटनिरपेक्ष रहना चुना परंतु सोवियत से निकटता रही।

1960 के दशक में पाकिस्तान जाने वाले भारतीय चकित रह जाते थे क्योंकि लाहौर और इस्लामाबाद में यूएस में बनी कारों में अमीर पाकिस्तानी घूमते दिखते थे। यूएस ने नव-निर्मित राष्ट्र पाकिस्तान को एक ग्राहक राज्य की तरह देखा।

यूएस ने इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में पाकिस्तान की सहायता की और एक बड़ा केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) अभियान चलाया ताकि पाकिस्तान के उत्तर में स्थित सोवियत संघ के बंदी उपग्रह राज्यों पर दृष्टि रख सके।

1960 के दशक में पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत से लगभग 40 प्रतिशत अधिक थी। अयूब खान और याह्या खान जैसे पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों से निपटना सीआईए और वॉशिंगटन के विदेश विभाग के लिए सुलभ था।

उन्हें सरलता से घूस दी जा सकती थी, नागरिकों के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं था और जाम पर उनसे बात बन जाती थी। सीआईए और आईएसआई के निकट संबंध, जो आज तक है, की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी।

सोवियत के प्रति भारत के झुकाव से वॉशिंगटन चिढ़ता था। 1950 और 1960 के दशक में अमेरिका साम्यवाद (कम्यूनिज़्म) के दूरगामी प्रभाव पर चिंतित था। इसने लैटिन अमेरिका में साम्यवादी शासनों और उत्तर वियतनाम के विरुद्ध महंगे युद्ध लड़े।

दक्षिण वियतनाम गए यूए राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन

साम्यवाद विरोधी भाव अमेरिका में काफी गहरा रहा। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त कराने के लिए प्रयासरत भारत को डराने के लिए बंगाल की खाड़ी में यूएस का सातवाँ बेड़ा भेजा था।

निक्सन की भारत-विरोधी मानसिक भावना निक्सन व उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) हेनरी किस्सिंगर की टेप की गई वार्ताओं के बाद में सार्वजनिक होने से उजागर हुई। 5 नवंबर 1971 को निक्सन व किस्सिंगर के एक संवाद का उद्धरण प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के प्राध्यापक गैरी जे बास देते हैं-

“भारतीय वैसे भी (दुर्वचन) हैं।”, किस्सिंगर ने आगे कहा, “वे वहाँ युद्ध शुरू कर रहे हैं लेकिन वे (इंदिरा गांधी) यह नहीं कह सकती हैं यूनाइटेड स्टेट्स ने उनका सत्कार नहीं किया इसलिए युद्ध छेड़ रही हैं।” किस्सिंगर से सहमत होते हुए निक्सन बोले, “हमने पुराना (दुर्वचन) नारा लगाया है।”

सीआईए-आईएसआई गठजोड़

1979 में जब 30,000 सैनिकों के साथ सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में बबरक करमल की साम्यवादी सरकार स्थापित करने के लिए हमला बोला था, तब सीआईए और आईएसआई ने सोवियत सैनिकों से लड़ने के लिए साथ मिलकर एक इस्लामी मुजाहिद्दीन बल को तैयार किया।

1989 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान से वापसी कर ली, तब पाकिस्तान ने बेरोजगार हो गए मुजाहिद्दिनों को जम्मू और कश्मीर में जिहाद करने के लिए तैनात कर दिया। यह कोई संयोग नहीं है कि घाटी में 1989 से आतंकवाद बढ़ने लगा।

लगभग 4 लाख कश्मीरी पंडितों को घाटी से बाहर खदेड़ा गया। इस्लामवादी आतंकवादियों ने पंडितों पर हमले किए, उनके घरों पर कब्ज़ा किया और जहाँ वे सदियों से रह रहे थे, उनकी पूर्वजों की भूमि से पंडितों को विवश होकर जाना पड़ा।

कश्मीरी पंडितों के कारण घाटी समावेशी व सहिष्णु बनी हुई, साथ ही पांडित्य और संस्कृति से भी सजी हुई थी। पंडितों के जाने के बाद घाटी सांप्रदायिक हिंसा के दलदल में धँसती चली गई। इन अशांत दशकों में सीआईए और आईएसआई साथ-साथ काम करते रहे, परंतु अविश्वास बढ़ रहा था।

9/11 के बाद वॉशिंगटन के लिए पाकिस्तान एक समस्या बन गया जिसका प्रबंधन करना था।  वहीं, दूसरी ओर तालिबान से लड़ने के लिए भूमि से घिरे अफगानिस्तान तक 1 लाख यूएस व नाटो सैनिकों के लिए पहुँच मार्गों पर रावलपिंडी का नियंत्रण था।

20 वर्षों बाद भी पाकिस्तान पर अपनी उलझन से यूएस उबर नहीं पाया है। वॉशिंगटन जानता है कि पाकिस्तान के सैन्य एवं रसद सहयोग के बिना तालिबान अस्तित्व में नहीं रह सकता है। फिर भी पाकिस्तान यूएस का गैर-नाटो सहयोगी है।

जान-बूझकर अपमान करने के उद्देश्य से जनवरी 2021 से राष्ट्रपति पद ग्रहण करने वाले कुंठित जो बाइडन ने अभी तक फोन उठाकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से वार्ता नहीं की है।

जनवरी 2020 में इमरान खान (बाएँ), डोनाल्ड ट्रंप (दाएँ)

रावलपिंडी का आदेश तालिबान पूरा करता है

नई तालिबान “सरकार” पाकिस्तानी सेना से आदेश लेती है, भले ही इसके मुजाहिद्दीन नेता कितना ही ज़ोर देकर इस बात को नकारते हों। ब्रिटिश और अमेरिकी मीडिया काफी लंबे समय से आतंकवाद के भारत को निर्यातक और तालिबान के प्रायोजक के रूप में पाकिस्तान की कलंकित भूमिका पर पर्दा डालते आ रहे हैं।

पिछले सप्ताह बीबीसी पर एक साक्षात्कार में एंकर फिलिपा थॉमस ने विद्वान सी क्रिस्टाइन फेयर की बात बीच में ही काट दी थी जब फेयर कहने लगे थे कि अफगानिस्तान समेत क्षेत्र में आतंकवाद का मूल पाकिस्तान ही है।

आतंकवाद का वैश्विक झरना- पाकिस्तान पश्चिम के भू-राजनीतिक हित में है, इसलिए ऐसा होता है। लेकिन अब जब यूएस और अन्य पश्चिमी शक्तियाँ अफगानिस्तान से चले गए हैं तो पाकिस्तान लंबे समय तक पर्दे में छुपकर नहीं रह सकता है।

यदि पाकिस्तान नहीं चाहता है कि तालिबानीकृत अफगानिस्तान विश्व में समाज-च्युत राज्य हो जाए तो तालिबान आतंकवाद को नियंत्रित करने का काम इसे करना होगा जिसे स्वयं इसने ही बनाया और दशकों तक सींचा है।

तालिबान के प्रतिनिधि पश्चिमी शक्तियों से कूटनीतिक संबंध रखने का निवेदन कर रहे हैं। लेकिन यहाँ तक कि चीन (यानी पाकिस्तान भी इसमें लिप्त है) ने भी आतंकवादी समूहों से संबंध तोड़ने की चेतावनी उसे दे दी है।

यह तो वही बात हो गई कि कोई पाकिस्तान और तालिबान से अपना डीएनए बदलने को बोल दे। बीजिंग जानता है कि अमेरिका के जाने से मध्य-पूर्व का हर आतंकवादी संगठन तालिबान शासित अफगानिस्तान को अपना आश्रय समझ रहा है।

अल-कायदा और आईएस-के सक्रिय हो चुके हैं। दुरंद रेखा के उस पार लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद रावलपिंडी से आदेशों की प्रतीक्षा में हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान को अलग करने वाली दुरंद रेखा को तालिबान मान्यता नहीं देता है।

पाकिस्तान ने सीमा पर तार लगाए हैं ताकि अफगान शरणार्थी उसके यहाँ न आएँ। कई वर्षों से लगभग 30 लाख अफगान, अधिकांश पशतून, पाकिस्तान में शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं। 10 लाख और शरणार्थी आ सकते हैं।

उसके बाद क्या? पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन शक्ति व क्षेत्र के लिए एक दूसरे से लड़ेंगे। दशकों तक पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को आतंकवाद का निर्यात किया है। अपेक्षा है कि तालिबान शासित अफगानिस्तान सूद समेत पाकिस्तान को वह वापस करेगा।

2016-18 में दक्षिण व दक्षिण-पश्चिमी एशिया के लिए सीआईए के आतंक-रोधी प्रमुख डगलस लंडन ने हाल में एक साक्षात्कार में कहा, “जिहादी समूह ने ऐसी ताकतों को खुला छोड़ दिया है जो अंततः उनके नियंत्रण से भी बाहर चली जाएँगी और रावलपिंडी के जनरलों को भी चुनौती देंगी।” पाकिस्तान को मिलने वाले सहस्र घावों में से यह पहला होगा।

मिन्हाज़ मर्चेंट लेखक एवं प्रकाशक हैं।