संस्कृति
ताटका वध- शांति की स्थापना के लिए श्रीराम के पास नहीं था कोई और विकल्प
मनु - 9th October 2021

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्षः शांतिः पृथ्वी शान्ति रापः शान्तिः रोषधयः शान्तिः। वनस्पतय शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिब्रह्मा शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्ति : सा मा शान्तिरेधि ||
।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ ।।

सृजन और विकास का मूल शांति में छिपा हुआ है और शांति का शौर्य में। जब परिस्थितियाँ शांत हों,अवरोध न हो और आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों, तभी सभ्यताएँ फलती और फूलती हैं। बसंत के आगमन पर ही नव किसलय फूटते हैं, ओलों की झड़ी के बीच नहीं।

किंतु कभी-कभी वातावरण में छाई घनी धुंध को हटाने के लिए आंधी के साथ तीव्र वर्षा का होना बहुत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आकाश को साफ करने का यही एकमात्र मार्ग है। आर्यावर्त के विस्तृत आकाश पर रक्ष संस्कृति की पैशाचिक नीतियों के बादल मंडरा रहे थे।

रक्षराज ने एक-एक कर देव, गंधर्व, किन्नर, यक्ष आदि सभी संस्कृतियों को अपने बल से पददलित कर दिया था और अब उसकी दृष्टि दैव संस्कृति के पोषक मनुष्यों पर आ टिकी थी जो अपनी समृद्धि और विकास के लिए देवताओं पर निर्भर थे एवं उनके पोषक के रूप में कार्य करते थे।

मनुष्यों की सबसे बड़ी ऊर्जा इनका संख्याबल और जिजीवषा थी। यूँ तो वे देवताओं जैसे दीर्घायु और तेजस्वी नहीं थे और न ही रक्षों की भाँति शक्तिशाली और स्वार्थी, किंतु फिर भी वे विलक्षण, विधाता के प्रिय एवं जीवटता से युक्त थे।

यही नहीं उनके राजाओं के पास समर्थ सेनाएँ और वैभवशाली नगर थे, तो उन्हें हराना इतना सरल न था। वह भी रक्ष मुख्यालय लंका से इतनी दूर, सुदूर उत्तर में। पहला लक्ष्य दक्षिण के वनों में रहने वाले वनवासी और मनीषी बने।

दुर्गम वन-प्रदेश, अगम्य नदियाँ, पठार, हिंस्र पशुओं से भरे उस प्रदेश में सेनाएँ नहीं प्रवेश कर पाती थीं और इस प्रकार नगरीय सभ्यता से दूर निरीह वनवासी और साधना में लीन ऋषि उनके सरल आखेट बने। जगह-जगह उनके स्कंधावार स्थापित हो गए।

अगर उनके संकट का सही-सही थोड़ा बहुत प्रतिरोध लंबे समय तक कोई स्थापित कर पाया था, तो वे थे महर्षि अगस्त्य जो अपनी धर्मपत्नी, लोपामुद्रा के साथ विंध्य पार करके आ बसे थे और अपने पराक्रम, मेधा से निरंतर रक्ष साम्राज्य के सम्मुख चुनौती बने हुए थे।

उनके द्वारा वनवासियों को सुसंस्कृत और प्रशिक्षित करने का क्रम अनवरत रूप से चल रहा था। फिर भी, अगस्त्य का कार्यक्षेत्र सीमित था, वे हर जगह नहीं पहुँच सकते थे और विश्वामित्र जैसे कुछ ही ऋषि ऐसे थे जो अपने सामर्थ्य के बल पर स्वयं और आश्रमवासियों की सुरक्षा करने में सक्षम हों।

इन ऋषियों की सीमाओं से अलग राक्षसों ने अनेक मज़बूत गढ़ बना लिये थे, जहाँ से लंका की सेनाएँ संचालित होती थीं। ऐसा ही एक गढ़ था ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के आश्रम के पास ताटका वन। गंगा और सरयू के संगम पर स्थित मलद और करुष जनपदों के मध्य स्थित डेढ़ योजन (छङ कोस) का ताटका वन।

ताटका वन की निर्द्वंद्व स्वामिनी थी एक राक्षसी। नहीं, जन्म से नहीं, किंतु दुर्गुण उसने सभी आत्मसात कर लिये थे इस संस्कृति के। वह गंधर्वराज सुकेतु की एकमात्र महाबलशालिनी और रूपवान पुत्री थी जिसका विवाह असुरराज सुंद के साथ हुआ था।

मारीच जैसा बलवान पुत्र और धन-शक्ति का अभिमान उसे मदांध करता गया। एक दिन इस परिवार की निरंकुशता का सामना तेजपुंज अगस्त्य से हुआ, जो जनजीवन के संरक्षण और विकास के लिए कृतसंकल्प थे। फलस्वरूप संघर्ष में सुंद का अंत हुआ और मारीच पराजित।

लुटे-पिटे अपमान में जलते हुए माँ-बेटे अपने बचे-खुचे अनुयायियों के साथ मलद-करुष जनपदों के मध्य स्थित वनों में आ छिपे। धीरे-धीरे शक्ति बढ़ी और वे निरंकुश होते चले गए। छह कोस का यह वन उस पैशाचिक यक्षिणी की मदांधता और क्रूरता का साक्षी बना और उसका नाम पड़ा, ताटका वन।

सदैव विपन्नता एवं अभाव विनाश और पथभ्रष्टता के कारक नहीं होते, विलास, अहंकार, दर्प एवं क्रूरता भी होते हैं। विश्वामित्र अयोध्या से राजकुमारद्वय को ले आए थे।

प्रजा की रक्षा राजा का दायित्व होता है, भले ही प्रजा सुदूर वनवासिनी क्यों न हो। अयोध्या के भावी सम्राट को राक्षस साम्राज्य के संकट के प्रति सचेत करना आवश्यक था एवं नवीन रणनीति के अनुरूप उनका प्रशिक्षण भी। कमर में तलवार, कंधे पर तूणीर, हाथों में गोहचर्म के दस्ताने पहने राजकुमार धनुष सम्हाले अयोध्या से बाहर बढ़ चले।

कुमारौ चारुवपुषौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ। अनुयातौ श्रिया दीप्तौशोभयेतामनिन्दितौ।।
स्थाणु देवमिवाचिन्त्यं कुमाराविव पावकौ।

(दोनों भाई राम और लक्ष्मण दिव्य शोभा फैलाते हुए कुशिकनंदन विश्वामित्र का अनुसरण करते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलने वाले दो स्कंदकुमार अग्नि और विशाख हों।)

वन की परिस्थितियाँ विषम और अप्रत्याशित होती हैं, नगरीय सभ्यता में पले-बढ़े राजकुमार उनका सामना नहीं कर सकते थे। उन्हें अपने शरीर और मन को अरण्य के अनुकूल बनाना ही होगा, जहाँ रक्ष संस्कृति ने अपने मजबूत स्कंधावार स्थापित कर लिये हैं। और इस प्रकार प्रशिक्षण आरंभ होता है बला-अतिबला विद्या के शिक्षण के साथ, जो उन्हें आरण्यक परिस्थितियों के अनुकूल बनाती है –

मन्त्रग्राम गृहाण त्वं बलामतिबला तथा। न श्रमो न ज्वरो वाते न रूपस्य विपर्यय ||१३||
(बला और अतिबला विद्या ने राजकुमारों को भूख-प्यास, श्रम, रूपविकृति आदि से रक्षित किया और उनके बुद्धिचातुर्य में वृद्धि कर उन्हें सुरक्षित बनाया।)

अगला चरण होता है स्थान की संपूर्ण जानकारी- इतिहास, भूगोल सहित, और युद्ध में प्रवेश से पूर्व सुरक्षित स्थान पर योजना बनाना। गंगा और सरयू के संगम पर स्थाणु भगवान् शिव द्वारा स्थापित आश्रम जो कि उनके अनेकानेक अनुयायियों द्वारा रक्षित है, वहाँ महर्षि समेत दोनों राजकुमारों ने विश्राम किया।

एक सजग योजनाकार अपने दल के योद्धाओं को रणभूमि और आस-पास का भूगोल बताने के साथ-साथ वहाँ का इतिहास और शत्रुओं का भी विस्तृत इतिहास बताता है, जिससे संपूर्ण कार्ययोजना पर समग्र रूप से विचार कर योजना बनाई जा सके।

इंद्र की ब्रह्महत्या धुलने में सहायक बने अरण्य और उसके आस-पास देवों द्वारा बसाए गए मलद और करुष नामक जनपदों के साथ-साथ दुर्गम ताटका वन से राजकुमारों का परिचय कराया और साथ ही सुनाया वर्णन सुंदपत्नी महाबलशाली यक्षिणी ताटका के क्रूर साम्राज्य और पतन का।

वनवासियों की पीड़ा सुनाकर और दिखाकर गाधितनय बोले- “परपीड़क, क्रूर, मदांध ताटका का वध कर क्षेत्र भयमुक्त करो।“ संस्कारों में पले-बढ़े राघव सकुचाए।

बाल, वृद्ध, स्त्री ये अहन्या हैं, क्योंकि ये सृजन और विकास के मूल आधार हैं, संस्कृतियों के पोषक हैं, सभ्यताओं के ध्वजवाहक हैं। ताटका क्रूर है, लेकिन है तो स्त्री, किसी का पत्नी, पुत्री और माँ भी। युद्ध में संशय घातक है, विश्वामित्र सही मार्ग दिखाते हुए कहते हैं,

नाहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम। चातुर्वर्ण्य हितार्थं हि कर्त्तव्यं राजसूनुना॥१७॥
(उस स्त्री का वध घृणा का कार्य नहीं है नरश्रेष्ठ! चारो वर्गों का हित करना ही राजपुरुषों का कर्तव्य है।)

वन में प्रवेश करने के पूर्व ही राघव की कीर्ति वन में परागगंध की भाँति वन में प्रवेश कर ताटका तक पहुँच चुकी थी। संकट का आभास पाते ही वह क्रोध और हिंसा से भर उठी। “इस तपस्वी का इतना दुस्साहस! मेरे विरुद्ध राजकुमारों को लेकर आया है। सब समाप्त होंगे!”

मानिनी ताटका बिना सेना के ही गर्जन करती हुई उन पर झपटी। आखेट की कल्पना से ही उसकी आँखें लाल हो आईं। किंतु ये सुकोमल राजकुमार क्या भयानक विनाश की इस आंधी को रोक पाने में सक्षम होंगे? युद्ध में प्रवेश के पूर्व यदि शत्रु में भय उत्पन्न हो जाए तो आधी विजय यूँ ही प्राप्त हो जाती है।

राघव से पहले राघव के धनुष की टंकार ताटका के कानों तक पहुँची। मस्तिष्क शून्य-सा हो गया और शरीर स्तंभित। हृदय में भय के बीज ने अंकुरण ले लिया और अगले ही पल वह विक्षिप्तों की भाँति उधर ही झपटी। माया के वेग से उन दोनों पर धूल, पाषाण, रक्त, मज्जा आदि की वर्षा प्रारंभ कर दी।

पहले तो राघवेंद्र ने अंग-भंग कर रोकने का प्रयत्न किया किंतु घायल हथिनी के समान उसका विध्वंसकार्य बढ़ता ही गया। अंत में सागर जैसा धैर्य भी समाप्त हुआ और शांति स्थापना के लिए ताटका का वध करना ही पड़ा।

साथ-साथ होते नहीं, शांति और संताप।
ताटका के संत्रास का करते रघुवर नाश।।
निर्भय हों वन और जन,सज्जन रहें सनाथ।
रक्षदुर्ग पर हो गया,पहला ये आघात।।

स्रोत- वाल्मीकि रामायण

मनु विज्ञान में परा-स्नातक हैं। वे भारतीय इतिहास और धर्म पर अध्ययन एवं लेखन करती हैं।