विचार
स्वभाषा को अमित शाह ने बताया लोकतंत्र के सफलता की कुंजी (लोकभोग्यता पर चिंतन)

घनघोर अज्ञानांधकार, तिस पर हद दर्जे के अहंकार (मूर्खता) से लबालब भरे स्वार्थांध हिंदी के प्रोफेसरों (आचार्य?) को शिव नगरी, सनातन धर्म नगरी, ज्ञान नगरी काशी में आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में शनिवार, 13 नवंबर 2021 को गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन’ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उद्घाटन उद्बोधन को बड़े ‘धैर्य’ एवं ‘ध्यान’ से सुनना चाहिए।

‘धैर्य’ इस कारण कि इधर हिंदी के प्रोफेसरों में अकर्मण्यता से उपजी अधीरता (संभ्रम एवं असहिष्णुता) अनायास ही देखने को मिलती है। भाषा की चिंता जहाँ भाषाविद् शिक्षकों (आचार्यों) एवं साहित्यकारों को करनी चाहिए, देश के केंद्रीय गृह मंत्री (सरकार) कर रहे हैं।

जबकि आचार्य रामविलास शर्मा ने भारत की भाषा-समस्या’ में “भाषा की समस्या मात्र प्रशासन-संबंधी समस्या नहीं है।” (पृ. 12) कहकर स्पष्ट कर दिया था कि शासन-प्रशासन के हस्तक्षेप से, जिसे अमित शाह ‘राज्याश्रय’ कह गए, भाषा की समस्या नहीं सुलझाई जा सकती।

‘जातीय जीवन पुनर्गठित’ (पृ. 8) कर, ‘जनमानस में स्वीकृति का वातावरण’ (अमित शाह) बनाकर, ‘टूटी-फूटी मिश्रित हिन्दी’ (पृ. 9) को ‘लचीला’ बनाकर ‘आत्मसम्मान के लिए’ उसे प्रमुखता से विकसित करने से ही समस्या का समाधान होगा। यह काम भाषाविद् आचार्य, साहित्यकार एवं शोधार्थियों से इतर भला कौन कर सकता है?

अमित शाह ने अपने उद्बोधन में अकारण ही “हिंदी के विद्वानों को गले नहीं उतरेगा” नहीं कहा है। वे सायास-अनायास हिंदी के विद्वानों की ‘जड़ मानसिकता’ की ओर संकेत कर रहे थे। और, ‘ध्यान’ से इस कारण सुनना चाहिए कि प्रोफेसरों का ध्यान भाषा से इतर मामलों में अधिक है।

भाषिक सुधार एवं उद्धार की दृष्टि से शिक्षा संस्थानों के हिंदी विभागों में निठल्लों की भरमार है। इनका शिक्षण एवं दर्शन ‘कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा’ लोकोक्ति को चरितार्थ करता हुआ दृष्टिगोचर होता है। अधिकांश प्रोफेसरों का ‘वाम’ के नाम से ही काम चल जाता है।

संक्षेप में, उन्हें वाम से ही काम है (नाभिनाल संबंध?)। अतः कक्ष-कक्षा से लेकर चर्चा-परिचर्चा में वही अथवा उसी का रागालाप दिखाई-सुनाई देता है। जबकि आम तौर पर वाम की निस्सारता पर पूरा विश्व सरेआम लिख-बोल चुका (रहा) है। अनुसंधान में वही आयातीत एवं थोपी हुई विचारधारा का ढर्रा चला आ रहा है।

उससे उपजी अथवा बनी-बनाई चौखटबद्ध बद्धमूल शब्दावली है- अभावग्रस्त, संत्रस्त, शोषण, शोषक, शोषित, शासित, उत्पीड़न, पुरुषवादी वर्चस्व, अभिजात्य वर्ग सत्ता, पितृसत्ता में स्त्री की दयनीय स्थिति, भारत ‘विविधतापूर्ण’ संस्कृति का देश, हाशिए का समाज, लोक का हाशियाकृत समाज से अंतर्संबंध, आदिवासी विस्थापन, ‘थैलीशाही’ (पूँजीवादी), धर्मनिरपेक्षता, फासीवादी ताक़तें इत्यादि।

अमित शाह ने ‘गले न उतरना’ मुहावरे का प्रयोग कर नई शब्दावली पर ज़ोर देना अकारण ही आवश्यक नहीं समझा। तथ्यतः उपरोक्त बद्धमूल शब्दावली अब जनसामान्य के गले नहीं उतर रही है। कहना न होगा कि अमित शाह ने आचार्यत्व से भरपूर व्याख्यान दिया है।

इस व्याख्यान में चिंता कम और चिंतन की गहनता अधिक व्यापक है। जबकि हमारे प्रोफेसरों का ‘आचार्य’ के रूप में कायापलट होना अभी शेष ही है। एक समय था, आचार्यत्व वार्ता और व्याख्यानों में प्रस्तुत विचार-चिंतन से उभर कर, निखर कर आता था। जानना-समझना होगा कि प्रोफेसर मात्र पदनाम रह गया है। जबकि ‘आचार्यत्व’ अर्जित ज्ञान का बोधक है।

हमारे शिक्षकों (प्रोफेसर) को भारत एवं भाषा की चिंता से अधिक शैक्षणिक प्रदर्शन सूचकांक (एपीआई) की बढ़ोतरी की चिंता सताती रहती है। भाषिक/ भाषाई शोध एवं पुनर्निर्माण की प्रक्रिया की दृष्टि से मामला और भी गुरु गंभीर है। यद्यपि कुछ प्रोफेसरों ने दो-तीन दर्जन, कुछेक ने अर्धशतक और कुछ दिग्गजों ने लगभग शतक शोध-उपाधियाँ पूर्ण कराई हैं।

तथापि अनुसंधान में तीसरे दर्जे (थर्ड क्लास) का विचार-चिंतन और लेखन में तीसरे दर्जे की शब्दावली का पिष्टपेषण ही दृष्टिगोचर होता है। इस दृष्टि से ‘मौलिकता’ ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ हो गया है। यह वर्तमान हिंदी विभागों की वास्तविक स्थिति (हालत-हालात) है।

केंद्रीय गृह मंत्री अकारण ही हिंदी के विद्वानों को नया सोच-विचारने की अपील नहीं कर रहे थे- “हिंदी के शब्दकोश को समृद्ध करने की ज़रूरत है। समय आ गया है कि इसे नए सिरे से लिखा जाए। हिंदी के शब्दकोश को मज़बूत करना चाहिए। विस्तृत करना चाहिए। इसकी सीमाओं को बढ़ा देना चाहिए। एक परिपूर्ण भाषा, एक संपूर्ण भाषा बनाने के लिए कुछ विद्वत जनों को काम करना पड़ेगा। हिंदी के शब्दकोश पर एक नज़र भी किसी को डाले हुए बहुत समय हो गया है। नया क्या ला सकते हैं, इस पर नहीं सोचेंगे तो काल अपना काम करता है।”

काल का काम हम भारतीय देख (भुगत?) ही रहे हैं। आज भी भारतीय ग्रामीणांचल के विद्यार्थियों के लिए अंग्रेज़ी हौआ से कम नहीं है। स्वभाषा से दूर होकर (रह कर) जो वैचारिक पंगुपन विकसित होता है, उसकी ओर संकेत करते हुए अमित शाह ने जिसे ‘लघुता ग्रंथि’ कहा, वह ब्रितानी साम्राज्य से उपज कर स्वतंत्र भारत में फली-फूली।

रघुवीर सहाय ने यों ही नहीं कहा है – “अंग्रेज़ों ने/ अंग्रेज़ी पढ़ाकर/ प्रजा बनाई/ अंग्रेज़ी पढ़ाकर/ अब हम/ प्रजा बना रहे हैं।” (कविता ‘अंग्रेज़ी’) सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज़ी भाषा ‘भारत की खोज करने वाले’ अभिजात नेताओं की भाषा बनी रही।

यह अकारण नहीं कि बीतते समय के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र में अंग्रेज़ी अभिजात परंपरा को दृढ़ से दृढ़तर करती गई और हिंदी को अपने ही नेताओं ने “कठिन, बनावटी और पुरानी शैली के संस्कृत शब्दों की भरमार” (मेरी कहानी, पृ. 627) से युक्त जाना-माना-समझा।

यद्यपि हम सभी भारतीय जवाहरलाल नेहरू की भाषिक रुचि एवं रुझान से परिचित हैं। उनकी सोच-समझ पर एक प्रसंग में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अकारण ही नहीं कहा था– “वह (नेहरू) अक्सर बच्चों जैसी अबोधता के साथ कार्य करते जाते हैं, जो हम लोगों को अप्रत्याशित रूप से बड़ी कठिनाई में डाल देता है।” (सरदार पटेल, सं. डॉ. प्रभा चोपड़ा, भारत विभाजन, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 162) भारत और भाषा के संबंध में उनकी दृष्टि को इस कथन के आलोक में भी समझा जा सकता है।

ऐसे नानाविध प्रसंग भी रहे हैं, जहाँ सरकार की ओर से हिंदी के भले और भविष्य की बात (चिंता) भी अंग्रेज़ी में होती रही। समय के बहाव में राजभाषा के नाम पर ‘हिंदी दिवस’ मना कर अपने दायित्वों की इतिश्री मानने वालों की तादाद हिंदी में ही बढ़ती गई।

हिंदी विभागों के तथाकथित स्वनामधन्य प्रोफेसर प्रयोजनमूलक हिंदी और अनुवाद के साथ-साथ राजभाषा और राजभाषाकर्मियों को दोयम दर्जे का मानते (रहे) हैं एवं हेयदृष्टि से देखते हैं। जबकि सत्य पक्ष यह है कि संस्थानों में अकारण अवहेलना झेलने और अनाधिकार की स्थिति के बावजूद प्रोफेसरों की तुलना में राजभाषाकर्मी अत्यधिक परिश्रम और हिंदी भाषा के उन्नयन हेतु समर्पित एवं सक्रियता के साथ कार्यरत रहते हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि राजभाषा एवं राजभाषाकर्मियों के प्रति सरकारों ने भी दोहरा मापदंड अपनाया है। उदाहरणार्थ, शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा शिक्षा संस्थानों (वित्तीय वर्ष 2010-11) में राजभाषा कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तीन पद यथा – हिंदी अधिकारी, हिंदी अनुवादक एवं हिंदी टंकक सृजित किये गये परंतु निदेशालय एवं मंत्रालयों में प्रचलित पदनाम यथा – निदेशक, संयुक्त निदेशक, उप निदेशक और सहायक निदेशक की एकरूपता अब तक नहीं दी गई है।

सरकार के दोहरे मापदंडों से राजभाषाकर्मियों में एक विचित्र प्रकार की कुंठा का भाव दृष्टिगोचर होता है। कुंठा का भाव कैसे/ क्योंकर उत्पन्न नहीं होगा? राजभाषाकर्मियों के साथ नियुक्त होने वाले सहायक कुलसचिव उप कुलसचिव और संयुक्त कुलसचिव के रूप में पदोन्नति पा जाते हैं और हिंदी अधिकारी, अनुवादक उन्हीं पदों पर पड़े रह जाते हैं।

अमित शाह के स्वभाषा हित की दृष्टि से प्रबोधनपरक संबोधन के पश्चात् प्रतीत होता है कि राजभाषाकर्मियों के दिन फिरने वाले हैं और उन्हें भी पदनामों में एकरूपता तथा वर्षों से लंबित पदोन्नति मिलने वाली है। वर्तमान सरकार की सर्वसमावेशी प्रगतिशील दृष्टि और दृढ़ इच्छाशक्ति को दृष्टिगत रखते हुए राजभाषा के पदनामों में एकरूपता और पदोन्नति के समान अवसरों की आशा एवं कामना की जा सकती है।

स्वभाषा की दृष्टि से भी वर्तमान सरकार की नीति और रणनीति स्पष्ट एवं दृढ़संकल्पित प्रतीत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अभिजात’ (अंग्रेज़ीदाँ) के उस गढ़ में सेंध तो लगाई ही, साथ ही साथ देश-विदेश में न केवल हिंदी अपितु यथाप्रसंग स्थानीय भाषाओं में संबोधन कर ‘भारतीय एकात्मता’ की भावना को सुदृढ़ करने का प्रयास सतत कर रहे हैं।

इसे सरकार का जन एवं भाषा सरोकार तथा लोक-प्रतिबद्धता मानना/ समझना चाहिए। अमित शाह ने उचित ही कहा है– “लोकतंत्र की सफलता स्वभाषा से ही है। 5-7 प्रतिशत जानने वालों की भाषा में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।” इसे अभिजात्य दृष्टि पर प्रहार के ही रूप में देखा जाना चाहिए।

जिस देश की सरकार अपनी भाषा, विरासत एवं संस्कृति को लेकर गंभीर हो जाए, उस देश के दिन फिरते देर नहीं लगती। हम सभी जानते हैं कि भारत और भाषा के प्रश्न को स्वहितकामी चंद बुद्धिवादी (अति) एवं नेताओं ने उलझा कर रखा है। अमित शाह ने संकेत करते हुए कहा, “स्थानीय भाषा बनाम हिंदी भाषा का राजनीतिक विवाद उत्पन्न करने का प्रयास चल रहा है।”

दो राय नहीं कि हिंदी को व्यापक लोकानुमति और स्वीकृति होते हुए भी उसका औपचारिक प्रयोग निषिद्ध ही समझा जाता रहा है। यह संतोष का विषय है कि सरकार के मंत्रालय अब ‘कामकाजी हिंदी’ में काम कर रहे हैं। भाषा का ‘जातीय जीवन’ और ‘जनमानस की स्वीकृति’ से संबंध होने के बावजूद स्वभाषा हित की दृष्टि से पहल करने में सरकार की अपनी महती भूमिका होती है।

भारत से एक वर्षोंपरांत स्वतंत्र होने वाले इज़राइल ने हिब्रू को स्वभाषा के रूप में चुना और उसे लागू भी किया। आज इज़राइल प्रौद्योगिकी एवं उद्यमशीलता की दृष्टि से वैश्विक महाशक्ति बन गया है। क्या इसमें स्वभाषा पर उसके रुख़ और रवैये को नज़रंदाज़ किया जा सकता है?

कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफ़ा कमाल पाशा द्वारा स्वभाषा हित में लिया गया निर्णय इस संदर्भ में अविस्मरणीय एवं प्रासंगिक है। अमित शाह ने ‘लोकभोग्य’ शब्द का प्रयोग संभवतः ऐसे ही विचारों से प्रेरित होकर किया है– “कोई भी सरकारी परिपत्र, अधिसूचनाएँ तब तक लोकभोग्य नहीं होती हैं, जब तक जन-आंदोलन में परिवर्तित नहीं होती।”

सर्वविदित है कि सरकारी परिपत्र, अधिसूचनाएँ इत्यादि अंग्रेज़ी में ही जारी होते रहे हैं और उनमें “हिंदी वर्शन फॉलोज़” की अंतिम पंक्ति से हिंदी कार्यान्वयन (क्रियाकर्म?) का पटाक्षेप होता रहा है। राजभाषा कार्यान्वयन हेतु प्रदत्त ‘सांख्यिकी आधारित’ पुरस्कारों के सत्य पक्ष से कौन परिचित नहीं है?

वैसे, वर्तमान समय-संदर्भ में यह संपूर्ण व्याख्यान महत्वपूर्ण है। परंतु, संकल्प की दृष्टि से निम्नांकित वक्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- “हम सब हिंदी प्रेमियों के लिए भी यह संकल्प का वर्ष होना चाहिए कि 100 साल जब आज़ादी के हो तब इस देश में राजभाषा और हमारी सभी स्थानीय भाषाओं का दबदबा इतना बुलंद हो कि किसी भी विदेशी भाषा का सहयोग लेने की ज़रूरत न पड़े।

यह काम आज़ादी के तुरंत बाद होना चाहिए था। आज़ादी का आंदोलन, जिसको गांधीजी ने लोक-आंदोलन में परिवर्तित किया, उसके तीन स्तंभ थे – स्वराज, स्वदेशी और स्वभाषा। स्वराज तो मिल गया। स्वदेशी भी पीछे छूट गया। स्वभाषा भी पीछे छूट गई।

मोदीजी ने पहली बार स्वदेशी (मेक इन इंडिया/ आत्मनिर्भर भारत) की बात करके स्वदेशी को फिर से हमारा लक्ष्य बनाने के लिए आगे बढ़ाया। आज़ादी के इस अमृत महोत्सव में देश के सभी लोगों का आह्वान करना चाहता हूँ कि हमारा एक और लक्ष्य छूट गया था- स्वभाषा का। उसको हम फिर से एक बार स्मरण करे और हमारे जीवन का हिस्सा बनाएँ।”

यह भी कि “प्रधानमंत्री जी ने अपनी कृति से गौरव के साथ अपनी भाषाओं को दुनिया भर में प्रस्थापित करने का प्रयास किया है। अपनी राजभाषा में बात रख कर हिंदी का गौरव बढ़ाया है। जो देश अपनी भाषा खो देता है, वह कालक्रम में अपनी सभ्यता को खो देता है। संस्कृति को खो देता है। अपने मौलिक चिंतन को खो देता है। जो देश मौलिक चिंतन को खो देता है, दुनिया को आगे बढ़ाने के लिए कंट्रिब्यूट नहीं कर सकता।” यह स्वभाषा प्रयोग एवं प्रचलन को बढ़ावा देने की दृष्टि से सूक्ति एवं सद्विचार है।

अपनी संपादित पुस्तक हिंदी : विविध आयाम’ के पूर्वोक्ति (आमुख) ‘बदलाहट की बयार और भाषायी अस्मिता’ में इस तथ्य को रेखांकित करते हुए लिखा है कि “उत्तर औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में ‘प्रयोग’ एवं ‘प्रचलन’ शब्द सर्वाधिक मायने रखते हैं। कोई भी वस्तु प्रयोग से शुरू होकर प्रचलन तक का सफर तय करती है। फिर भाषा हो या संस्कृति, परिधान हो या आहार इत्यादि सभी इसी सफर से होते हुए अपना मुक़ाम तय करते हैं।” (आनंद पाटील, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 14)

अतः हिंदी का बेझिझक प्रयोग आरंभ कर उसे अधिकाधिक प्रचलन में लाने की नितांत आवश्यकता है। अंग्रेज़ी भाषा की गुलामी से मुक्ति हेतु यही मार्ग श्रेयस्कर हो सकता है। कितनी ही प्रयुक्तियाँ बना लें, यदि वे प्रयोग से होकर प्रचलन में नहीं लाई जाएँगी तो नितांत कोशीय संपत्ति/ सामग्री बन कर रह जाएँगी।

हिंदी को न जटिल बनाना है, न कठिन बनाना है और न ही अनावश्यक रूप से उसे लचीला ही बनाना है कि वह रोमनीकरण की ओर बढ़ जाए। उसे नागरी स्वरूप में ही ‘लोकभोग्य’ बना कर प्रयोग एवं प्रचलन में लाने की आवश्यकता है। यही संकल्प हो सकता है। होना चाहिए।

संपूर्ण व्याख्यान में अमित शाह ने जिन बातों को रेखांकित किया, उन्हें निम्नानुसार देखा-समझा जा सकता है –

  • राजभाषा सम्मेलन पहली बार राजधानी दिल्ली से बाहर और विशेष रूप से भारतीय भाषा एवं ज्ञान के विकास में काशी के योगदान को दृष्टिगत रखते हुए काशी में आयोजित किया गया। काशी को छोड़कर भारत का इतिहास नहीं लिखा जा सकता।
  • भाषाओं के शुद्धिकरण में काशी का अपना विशिष्ट स्थान, प्रदाय एवं महत्वपूर्ण योगदान रहा है। काशी के भाषाविदों के साथ-साथ देवनागरी के विकास में ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ का योगदान महत्वपूर्ण है। खड़ीबोली के क्रमवार विकास में काशी को नहीं भुलाया जा सकता।
  • ‘स्थानीय भाषा बनाम हिंदी भाषा’ का राजनीतिक विवाद और संघर्ष उत्पन्न करने के प्रयास करने वालों को जन-आंदोलन से उत्तर देने की आवश्यकता है। हिंदी सभी स्थानीय बोली-भाषाओं की सखी-सहेली है। अतः स्थानीय भाषाओं के साथ भाषायी विवाद अथवा संघर्ष का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। स्थानीय भाषाओं का विकास राजभाषा के विकास पर निर्भर है। अतः राजभाषा को मज़बूत करना सबका लक्ष्य होना चाहिए।
  • हमारी भाषाएँ एक-दूसरे के साथ संबद्ध हैं। ‘लघुता-ग्रंथि’ (हीनता बोध) को बदलने की आवश्यकता है। घबराहट की जगह गौरवानुभूति की आवश्यकता है। एक ऐसा समय भी था, स्वभाषा बोलने में घबराहट होती थी। अब गौरवानुभूति होती है। स्वभाषा समृद्धि से संस्कृति-सभ्यता संपन्न एवं विस्तृत होती है।
  • हमें मातृभाषा से थोड़ा अधिक प्रेम हिंदी से करने की आवश्यकता है। हिंदीतर भाषी होकर हिंदी में बोलना गर्व और गौरव का अनुभव कराता है। आज़ादी के 100 वर्ष में स्वभाषा (मातृभाषा एवं राजभाषा) का लक्ष्य पूर्ण हो सकता है, बशर्ते इसे लोक-आंदोलन बनाना होगा।
  • स्वभाषा चिंतन को गति देती है। नए परिमानों को सोचने की दिशा देती है। देशोद्धार और आत्मसम्मान के लिए स्वभाषा और राजभाषा को प्रमुखता देना चाहिए।
  • विज्ञान-प्रौद्योगिकी की शिक्षा स्वभाषा और राजभाषा में आरंभ होने से भाषाओं की अस्मिता का संकट दूर होगा। स्वभाषा और राजभाषा के अंतर्संबंध को प्रगाढ़ करने से एकात्मता की भावना में वृद्धि होगी।
  • नई शिक्षा नीति- 2020 स्वभाषा और राजभाषा को बढ़ावा देती है। राष्ट्रीय एकात्मता के लिए राजभाषा की नितांत आवश्यकता है।
  • अपनी भाषा में ही सर्वोत्कृष्ट अनुसंधान संभव है। स्वभाषा की अवहेलना के कारण हमारा अनुसंधान प्रभावोत्पादक नहीं है।
  • लोकतंत्र स्वभाषा से ही सफल हो सकता है। 5-7 प्रतिशत लोगों की भाषा में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। शासन लोकभोग्य तब ही हो सकता है, जब स्वभाषा में शासन हो। गृह मंत्रालय पूर्णतः हिंदी में काम कर रहा है। अन्य मंत्रालय भी इस दिशा में कार्यरत हैं।
  • प्रशासन, न्याय व्यवस्था, शिक्षा, तकनीक, जनसंचार, मनोरंजन की भाषा स्थानीय भाषा और राजभाषा हो, यह संकल्प आवश्यक है।
  • यदि तुलसीदास अवधी में ‘रामचरितमानस’ की रचना न करते तो संभवतः ‘रामायण’ आज लुप्त हो गया होता। मानव जीवन को उन्नत बनाने की कथा (रामायण) को किसी भी प्रकार की नकारात्मक दृष्टि से देखना अनुचित है। इससे आदर्शों का बोध होता है- आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श भाई, आदर्श पत्नी, आदर्श शासन (कल्याणकारी रामराज्य), आदर्श शत्रु इत्यादि। यह लोकभाषा की महत्ता है।
  • सोच-विचार एवं आचरण-व्यवहार में स्वभाषा के प्रयोग की आवश्यकता है। ऐसा करने से विदेशी भाषा का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अभिभावकों को स्वभाषा में बात करना चाहिए। स्वभाषा में ही मौलिक चिंतन की अपार संभावनाएँ होती हैं।
  • भारतीय शिक्षा एवं ज्ञान-विज्ञान का मूल आधार श्रुति एवं स्मृति परंपरा है। यह स्वभाषा में ही संभव है।
  • क्षेत्रीय इतिहासों का राजभाषा में अनुवाद होना चाहिए। राजभाषा में क्षेत्रीय इतिहास की उपलब्धता से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में उसकी पठनीयता को बढ़ावा मिलेगा। यह भी एकात्मता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
  • वीर सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सभी जानते हैं। परंतु हिंदी भाषा के लिए उनकी चिंतनशीलता का एक उदाहरण यह भी है कि उनके स्वभाषा चिंतन के कारण हिंदी में ‘निर्देशक’ और ‘कला निर्देशन’ जैसे शब्द उपलब्ध हो पाए हैं।
  • हिंदी में राज्यभाषा और विदेशी भाषाओं के शब्दों का स्वागत करना चाहिए। हिंदी को येनकेनप्रकारेण माध्यम भाषा बनाने की आवश्यकता है। यदि यह हो जाता है तो हिंदी अपना रास्ता स्वयं बना लेगी। आगे बढ़ना हिंदी की नियति है। हमें उद्दीपक और वाहक का काम करना होगा।
  • अंग्रेज़ी विदेशी भाषा थी। अतः राज्याश्रय से थोपी गई थी। हिंदी को राज्याश्रय से थोपने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सभी भारतीय भाषाओं की सखी-सहेली है। भाषाहित में शासन अपना काम करेगा। परंतु जब तक जनमानस में ‘स्वीकृति का वातावरण’ निर्मित नहीं होगा, शासन का काम रंग नहीं ला सकेगा।
  • हिंदी कोश का अद्यतनीकरण करने की नितांत आवश्यकता है। उसे विस्तृत बनाने की दृष्टि से नए-सिरे से सोच-विचारने की आवश्यकता है।

वर्तमान सरकार स्वानुभूति को सर्वानुभूति में बदलने और सर्वानुभूति को स्वानुभूति रूप में ग्रहण करने हेतु सतत प्रयत्नशील है। अतः अमित शाह का यह व्याख्यान हिंदी ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारतीय भाषा-भाषियों को ध्यान और धैर्य से सुनना-समझना चाहिए। “बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ। जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥” कवि गिरिधर के इस आदर्श को स्मरण कर भारत और भाषा की समृद्धि हेतु सतत प्रयास करने की आवश्यकता है। स्वभाषा ही मुक्तिमार्ग का सेतु है।