संस्कृति
13 संख्या पर अंधविश्वास- जड़ें ईसाइयत में और नाश ‘दुर्गा सप्तशती’ में

समय के साथ कुछ न कुछ अंधविश्वास समाज में पनपते रहते हैं, और कई बार ऐसे अंधविश्वासों के पीछे मजहबी कारण भी होते हैं। पश्चिमी देशों का, और वहाँ से दूसरी कई जगहों पर फैला एक ऐसा ही अंधविश्वास 13 की संख्या से जुड़ा है।

13 की संख्या से जुड़ा यह अंधविश्वास ऐसा प्रचलित है कि इसके लिए एक नहीं बल्कि दो-दो फोबिया के नाम भी रखे गए हैं। इस अंधविश्वास की शुरुआत वैसे तो काफी पीछे तक जा सकती है लेकिन इसके प्रमुख कारणों में से एक बाइबल की कहानियाँ हैं।

मान्यताओं के अनुसार “द लास्ट सपर” में येशु के अलावा उनके 12 शिष्य उपस्थित थे। कुल 13 लोगों के एक साथ बैठकर खाने के अगले ही दिन, यानी “गुड फ्राइडे” के दिन, येशु को सूली पर चढ़ा दिया गया था। बाइबल की ही दूसरी कुछ कहानियाँ भी इसी अंधविश्वास को और पुष्ट कर देती हैं।

ऐसा माना जाता है कि आदम और हव्वा की कहानी में जिस सेब को खाने के कारण उन्हें स्वर्ग से निष्काषित किया गया था, वह सेब हव्वा ने शुक्रवार को ही आदम को दिया था। आगे जो प्रसिद्ध केन और एबल की कहानी है, जिसपर कई उपन्यास भी लिखे गए, उसमें केन ने अपने भाई एबल की हत्या शुक्रवार के ही दिन की थी।

इस अंधविश्वास में भय का कारण सिर्फ 13 तारीख हो तो “फ्रिग्गाट्रिस्काइडेकाफोबिया” होता है, लेकिन अगर 13 तारीख को कहीं शुक्रवार भी हो तो यह बढ़कर  “पैरास्काविडेकाट्रायोफोबिया” बन जाता है। हर वर्ष, किसी शुक्रवार को अगर 13 तारीख भी हो तो अमेरिकी शेयर बाज़ार सहित काफी जगहों पर व्यापार मंदा पड़ने से भारी नुकसान होता है।

इस अंधविश्वास की जड़ें जमने के पीछे और भी कारण रहे होंगे, ऐसा समझना मुश्किल नहीं है। बाद के कारणों में से एक था ईसाइयों के मजहबी योद्धा माने जाने वाले “नाइट टेम्पलर्स” का खात्मा। फ़्रांस के राजा फिलिप चतुर्थ ने जिस 13 अक्टूबर 1307 को नाइट टेम्पलर्स की गिरफ़्तारी करवाई, वह भी शुक्रवार था।

वैसे तो यह माना जाता है कि नाइट टेम्पलर्स को जिन काले जादू जैसे आरोपों में बंदी बनाया गया था, वे झूठे थे और असल में उनकी दौलत हड़पने के लिए ऐसा किया गया था, लेकिन इतिहास की दूसरी कई घटनाओं की तरह ही इस घटना की असली वजह भी विवादित है।

वर्षों तक अमानवीय यातनाएँ देने के बाद नाइट टेम्पलर्स में से कई को जीवित जला दिया गया था। यह गिरफ़्तारी और नाईट टेम्पलर्स के अंत की शुरुआत भी शुक्रवार, जो कि 13 तारीख थी, को हुई। इससे भी अंधविश्वास को बल मिला।

पहले के दौर में मुख्यधारा के साहित्य में लिखे गए को छोड़ भी दें तो हाल ही में डैन ब्राउन के विख्यात उपन्यास “द डा विन्ची कोड” में नाइट टेम्पलर्स से जुड़े मिथकों को काफी हवा दी गई है। अमेरिका में कई नामी-गिरामी हस्तियों ने इस अंधविश्वास के खात्मे का प्रयास भी किया है।

न्यू यॉर्क के कैप्टेन विलियम फाउलर ने 13 की संख्या और ऐसे दूसरे अंधविश्वासों को मिटाने के लिए एक गुप्त समिति भी बनाई थी। पहले तो उन्होंने इसका नाम ही “13 क्लब” रखा। ऊपर से वे महीने की 13वीं तारीख को अपनी बैठकें क्निक्करबोक्कर कॉटेज के 13 नंबर कमरे में करते थे।

13 की संख्या के डर के अलावा दूसरे अंधविश्वासों के निर्मूलन के लिए वे लोग कमरे में सीढ़ी के नीचे से गुज़रते हुए आते थे, जिसे अंधविश्वासों के कारण अपशकुन माना जाता है। जी हाँ, काली बिल्ली के रास्ता काटने, या फिर आईने के टूटने और टूटे दर्पण में चेहरा देखने जैसा ही दीवार से लगी सीढ़ी के नीचे से गुज़रना भी अपशकुन माना जाता है।

अमेरिका के कम से कम चार भूतपूर्व राष्ट्रपति (चेस्टर आर्थर, ग्रोवर क्लीवलैंड, बेंजामिन हैरिसन और थिओडोर रूज़वेल्ट) अपने-अपने समय में इस “13 क्लब” के सदस्य रह चुके हैं। ऐसे प्रयासों के बाद भी इस अंधविश्वास में कोई कमी आई हो, ऐसा लगता नहीं।

थॉमस लॉसन ने 1907 में इसी 13 तारीख और शुक्रवार का फायदा उठाने वाले पर फ्राइडे द थर्टीन्थ नाम का उपन्यास लिखा था। इस विषय पर आई फिल्मों की भी कोई कमी नहीं है। डरावनी फिल्मों में से जानी-मानी फिल्म फ्राइडे द थर्टीन्थ 1980 में आई थी जिसमें एक जेसन नाम के हत्यारे को दिखाया जाता है।

इसके बाद तो “हेलोवीन” के कपड़े-मास्क पहनने वाले अपराधियों वाली 13 तारिख और शुक्रवार के अंधविश्वासों पर आधारित कई फ़िल्में और वीडियो गेम, कॉमिक्स, काफी कुछ आया। अब तो “फ्राइडे द थर्टीन्थ” एक फ्रेंचाइज़ी है।

अंधविश्वास का प्रभाव कुछ ऐसा है कि कई लोग होटल में 13 नंबर कमरा नहीं लेते, हवाई जहाज या बसों में 13वीं कतार में नहीं बैठते, और बहुमंज़िला इमारतों में भी 13वीं मंज़िल पर जाने, वहाँ दफ्तर-घर लेने से बचते हैं।

उदारवाद और वैश्वीकरण के दौर में अमेरिकी सांस्कृतिक प्रभावों से भारत बचा रहता, ऐसा तो मुश्किल ही था। बाज़ारवाद के अलावा ये 13 को अशुभ मानने का अंधविश्वास, चूँकि लंबे समय तक गुलामी और इनक्वीज़िशन झेल चुका भारत ईसाई मत से प्रेरित है, भारत में भी दिख जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

काली बिल्ली के रास्ता काटने, सीढ़ियों के नीचे से गुज़रने और टूटे दर्पण में चेहरा देखने के साथ-साथ यहाँ पर भी होटलों में 13 नंबर का कमरा न होने जैसा अंधविश्वास पाला जाता दिख सकता है। सुमेरिया की सभ्यता में संख्याएँ ही 12 तक होती थीं।

गिनती का दर्जन भी 12 का होता है। दिन के घंटे या वर्ष के महीने और राशियाँ भी 12 होती हैं। इस वजह से भी कुछ सभ्यताओं में इस तरह के अंधविश्वासों का आना अनोखी बात नहीं। भारतीय लोगों के लिए संख्या बारह तक की ही होती हो, ऐसी कोई बात नहीं थी, इसलिए यहाँ ऐसा अंधविश्वास अधिकांश लोगों के लिए निर्मूल होता है।

दुर्गा पूजा का समय निकट आते ही इसे निर्मूल बताने का एक और कारण हो जाता है। हिंदुओं के लिए श्री दुर्गा सप्तशती एक प्रमुख ग्रंथ है और भारत हर गाँव-कस्बे में शारदीय नवरात्रों के समय इसका पाठ होता दिखाई-सुनाई देता है।

इस ग्रंथ के केवल पाठ को शुभ नहीं माना जाता है, इसका अध्ययन करने के लिए कहना, सुनने के लिए प्रेरित करना, या घरों-मुहल्लों में इसका पाठ सुनाई देना तो छोड़िए, इसके पाठ-श्रवन इत्यादि के लिए सोचना भी शुभ और पुण्य देने वाला माना जाता है।

इस दुर्गा सप्तशती में 13 ही अध्याय होते हैं। मार्कंडेय पुराण के 81वें से 93वें अध्याय में आने वाले भाग को दुर्गा सप्तशती कहा जाता है। इसके प्रथम चरित्र में एक अध्याय, मध्यम में दूसरे से चौथा यानी तीन अध्याय, और उत्तम चरित्र में पाँचवे से 13वाँ यानी नौ अध्याय आते हैं।

कुल 13 अध्यायों वाले ग्रंथ का जहाँ पाठ होता हो, उनके लिए 13 की संख्या से जुड़े किसी मनगढ़ंत अंधविश्वास को मानना क्यों आवश्यक होगा? वैज्ञानिक आधारों पर देखें तो भी समझदार लोग ऐसे अंधविश्वासों में यकीन नहीं रखते होंगे। बाकी श्री दुर्गा सप्तशती के 13 अध्याय तो उसका उल्टा सिद्ध करने के लिए हैं ही!