संस्कृति
श्रीराम ने रावण को घायल कर दिया तो उसने माता का आह्वान किया (अकाल बोधन- 6)

रावण की गदा के प्रहार को श्रीराम ने अर्धचंद्र बाण से शक्तिविहीन कर डाला। शिवमंत्र का उच्चारण करते हुए रावण ने शिवशूल का प्रक्षेपण किया जिसे श्रीराम ने शंकरबाण द्वारा निष्क्रिय कर डाला। सहस्र बाणों, शिलाओं, वृक्षों को भेदता हुआ, जब 50 योजन लंबा जाठा अस्त्र श्रीराम की ओर पुनः अग्रसर हुआ तब उन्होंने शेलपाट द्वारा उसे काट डाला। (पिछला भाग यहाँ पढ़ें)

विभीषण के सुझाने पर श्रीराम ने रावण पर धर्म-अस्त्र से प्रहार कर उसका स्वर्ण कवच नष्ट कर डाला। क्रोधित होकर रावण ने श्रीराम पर पार्वती के महाशूल का प्रक्षेपण किया जिससे रघुनाथ अचेत हो गए किंतु चैतन्य होकर उन्होंने बाणों की वर्षा आरंभ कर दी।

श्रीराम ने विष्णुमंत्र का जाप कर गदा का प्रहार किया तो दशानन ने कालचक्र से, तथा जब दशानन द्वारा पाशुपत-बाण से आक्रमण किया तो श्रीराम ने उसे विष्णुचक्र द्वारा विच्छेदित कर महाकाल बाण प्रक्षेपित किया। यह बाण रावण के वक्ष को चीरता हुआ पाताल-लोक में प्रवेश कर गया।

महाकाल बाण से आहत होते ही दशानन श्रीराम की स्तुति में लीन हो गया। वह श्रीराम के सम्मुख विराजकर बोला, “हे विश्वआराध्य, अगति के गति, संपूर्ण सृष्टि के रचनाकार, प्रजापति आप ही सृष्टि हो, रक्षक हो तथा आप ही प्रलयकर्ता हो। आप ही चंद्र, सूर्य, कुबेर, वरुण व यम हो।

हे देवों के देव, आप ही निराकार हो तथा साकार रूपधारी भी हो। आपकी महिमा की सीमा मैं अज्ञानी कैसे समझूँ। मैं राक्षस जाति का जन्मा, ना तो मुझ दोषी में भक्ति का सामर्थ्य है, ना ही मुझे स्तुति का ज्ञान। हे गदाधर, आपसे याचना करता हूँ कि अपने श्रीचरणों में मुझे स्थान दो।”

“हे कौशल्या नंदन, आप ही आदि हो तथा आप ही अनादि हो, आप ही असाध्य-साधक हो। मैं दुराचारी असंख्य पापों का जनक आपसे क्षमा प्रार्थना करता हूँ। हे दयामय, मेरा अपराध क्षमा करो।” श्रीराम के सम्मुख चरणवंदना कर उनकी क्षमा दृष्टि की आशा में रावण एकटक विराजे था। अश्रुधारा बहे जा रही थी।

अपने समक्ष महाज्ञानी लंकेश्वर रावण को इस स्थिति में देख श्रीराम से रहा ना गया और वे भी परम पंडित रावण को इस दशा में देख शोक में पड़ गए। राम विचारमग्न हो गए, “यह महाज्ञानी रावण तो परम-भक्त है। मैं इसका वध कैसे कर सकता हूँ? अगर मैं स्वयं अपने भक्तों का संहार करूँगा तो समस्त संसार में मनुष्यों का भक्ति से विश्वास खंडित हो जाएगा। मैं अपने भक्त पर क्यों बाण चलाऊँ।”

यही विचार करते हुए श्रीराम ने धनुष-बाण त्याग दिया। उनके चित में यही विचार बारंबार जन्म ले रहा था, “यदि मैं सीता का उद्धार न कर सका तो राजपाट की क्या आवश्यकता है? यही उचित होगा कि मैं वन की दिशा में प्रस्थान करूँ।” ऐसा विचारते हुए जैसे ही राम विमुख होकर रथ पर बैठे समस्त देवलोक में हाहाकार मच गया।

इंद्र आदि सभी देव चिंतित हो उठे कि यदि कमललोचन स्तुति से तुष्ट हो गए तो संपूर्ण सृष्टि का नाश हो जाएगा। श्रीराम के युद्ध से विमुख होने पर इंद्र आदि देवतागण देवी सरस्वती के सम्मुख याचना हेतु प्रकट हो प्रार्थना करते हैं, “हे माँ, विराट विपत्ति आन पड़ी है।

दुष्ट निशाचर रावण की स्तुति द्वारा तुष्ट हो श्रीराम ने युद्ध का विचार त्याग दिया है। वे अब युद्ध से विमुख हो वन की दिशा में प्रस्थान हेतु आतुर हैं। आपसे याचना है, हे माँ, आप दुराचारी रावण के कंठ पर विराज हो शत्रुभाव से श्रीराम को कटुवाक्यों से संबोधित करें।”

देवगणों को चिंतातुर देख वाग्देवी शीघ्र प्रस्थान कर रावण के कंठ पर विराजती हैं। वाग्देवी के प्रभाव से मोहित हो रावण श्रीराम को संबोधित करता है, “हे रघुपति, मेरी स्तुति सुन आप यह विचार न करें कि मैं महापराकर्मी, महाबलशाली, अपने प्राणों के भय से तुम्हारी स्तुति कर रहा हूँ। मैं तुमसे कदाचित भी भयभीत नहीं हूँ। तुम्हारे साथ युद्ध अवश्यंभावी है तथा मैं  शीघ्र ही तुम्हारा वध करूँगा।”

क्रोध कंपित हो श्रीराम अपना धनुष-बाण लिए युद्ध हेतु तत्पर हो गए। तदुपरांत श्रीराम-रावण में युद्ध प्रारंभ हो गया। श्रीराम ने घनुष की प्रत्यंचा से पंचबाण प्रहार किया जिसे रावण ने अग्निबाण से निश्चल कर दिया। यह देख श्रीराम द्वारा गंधर्वास्त्र आघात से दशानन बेसुध हो गया।

यह अनुकूल स्थिति देख मित्र विभीषण ने श्रीराम को ब्रह्मास्त्र के उपयोग का परामर्श दिया जिसके द्वारा ब्रह्म-मंत्र का पाठ करते हुए श्रीराम ने रावण का ब्रह्म कवच भेद डाला। तत्पश्चात् श्रीराम बाणों की वर्षा कर देते हैं किंतु रावण की मृत्यु नहीं होती। अंत में नारायण कालचक्र के प्रहार से उसका शीश विच्छेदन कर डालते हैं।

श्रीराम की सेना में प्रसन्नता छा जाती है किंतु क्षणमात्र में प्रसन्नता विस्मय में परिवर्तित हो जाती है। श्रीराम देखते हैं कि रावण का शीश पुनः अपने स्थान पर प्रकट हो अट्टहास कर रहा है। रघुनाथ अब अर्धचंद्र बाण फेंककर रावण के दो शीश विच्छेदित करते हैं किंतु पुनः वह अपने स्थान पर प्रकट हो जाते हैं।

इस प्रकार श्रीराम द्वारा प्रक्षेपित ब्रह्मजाल, ऐषिक-बाण, ब्रह्मास्त्र, यमदंड धर्म-चक्र, सप्तसार वाण, परम कोप से रावण के शीश विच्छेदित होते रहे और जुड़ते रहे किंतु रावण की मृत्यु ना हुई। श्रीराम अत्यंत चिंतित तो थे ही किंतु आश्चर्यचकित भी थे। वे अति दुविधा में थे कि किस प्रकार यह दुष्ट शीश विच्छेदन पश्चात् भी युद्ध में लीन है।

अंतिम उपाय जान उन्होंने रावण पर पुनः अर्धचंद्र बाण द्वारा आक्रमण किया। फलस्वरूप रावण का शरीर दो भागों में विभक्त हो धराशायी हो गया। उसका विभक्त शरीर अब पृथ्वी पर किसी धराशायी पर्वत की भांति धँसा हुआ था। अचानक श्रीराम ने देखा कि रावण के शरीर के विभाजित भाग भी पूर्ण शरीर का आकार लेने लगे हैं।

कुछ ही क्षण पश्चात् रावण अपना संपूर्ण शरीर लिये रणभूमि में अट्टहास कर रहा था। श्रीराम ने किंचित मात्र विचलित न होते हुए पुनः आक्रमण कर दिया। श्रीराम को युद्ध हेतु आतुर देख दशानन अतिकुपित हो उनकी सेना पर बाणों की वर्षा में जुट गया। सूर्य आवरण में चला गया, सघन धूल आकाश पर आच्छेदित हो गई। दृष्टि व्यर्थ होने लगी। बाणों से सभी वानरों के शरीर घायल हो गए।

यह देख हनुमान अत्यंत क्रोधित हुए तथा स्वयं रावण के समक्ष जाकर प्रस्तुत हुए। रावण जब तक यथा स्थिति से परिचित होता, हनुमान ने रावण के वक्ष स्थल पर वज्र जैसा मुष्टि प्रहार कर रावण को क्षण मात्र के लिए मूर्छित कर डाला। अनायास हुए प्रहार से रावण अब अवचेतन हो धराशायी था।

दशानन के चेतना में आने से पहले ही हनुमान वहाँ से विलुप्त हो चुके थे। किस भी प्रकार से युद्ध का अंत दृश्यमान नहीं था। अचानक श्रीराम के गदा प्रहार द्वारा रावण पुनः घायल हुआ तथा डगमगाते हुए घुटने के बल आ गया। उसके चक्षुओं से रक्त की अविरल धारा प्रवाहित हो रही थी। भुजाओं में कंपन था। श्वास पूर्ण करने में उसे परिश्रम करना पड़ रहा था।

रावण की ऐसे स्थिति देख, आकाश में विराजे सभी देवगणों को ऐसा बोध हुआ कि युद्ध का अंत अब समीप ही है। किंतु वह तो कुटिल रावण था, किंचित चैतन्य हुआ एवं उसने माँ अंबिका की स्तुति आरंभ कर डाली। पराजय तथा निराशा के इस क्षण में, रावण अपनी रक्षा हेतु दिव्य माता का आह्वान करता है।

आगे की कथा अगले भाग में।

मनीष श्रीवास्तव इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।