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ईरान परमाणु समझौता शीघ्र हो सकता है, जानें क्या हैं इसके निहितार्थ

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (यूएसए) के निकलने के बाद ईरान का परमाणु समझौता स्थगित हो गया था। अब ज्ञात हुआ है कि परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने के लिए ईरान वार्ता की मेज़ पर पुनः लौटना चाह रहा है।

पहले से ही ईरान की परमाणु गतिविधियों पर चिंताएँ व्यक्त की जाती रहीं हैं और अपेक्षा है कि अगले माह से वार्ताएँ शुरू हो जाएँगी। इस बात की घोषणा यूरोपीय संघ के एक वरिष्ठ राजनयिक एनरिक मोरा से मिलने के बाद ईरान के उप विदेश मंत्री अली बघेरी ने की।

बघेरी ने ट्वीट करके न सिर्फ वार्ताओं की बात की, बल्कि यह भी कहा कि आने वाले सप्ताह में तय तिथि बताई जाएगी। इन वार्ताओं का उद्देश्य होगा कि एक सहमति पर पहुँचा जाए जिससे यूएस इस समझौते से पुनः जुड़ जाए और ईरान पर लगे प्रतिबंध समाप्त हों।

इसी बीच, ईरान से अपेक्षा की जा रही होगी कि वह अपनी परमाणु गतिविधियों को कम करे और पीछे हटकर वह समझौते की उन शर्तों को पूरा कर ले जिनपर सहमति बनने वाली हो।

इन वार्ताओं ने तब व्यवधान का सामना किया था जब जून में इब्राहिम रईसी निर्वाचित हुए जो एक कट्टरपंथी इस्लामी गुरु माने जाते हैं। लगभग एक दशक तक कट्टरपंथी सत्ता से दूर रहे थे इसलिए रईसी के निर्वाचन के बाद उन्होंने इस समझौते के विरुद्धअपना एजेंडा चलाना चाहा।

रईसी ने भी परमाणु समझौते से अधिक प्राथमिकता घरेलू मुद्दों को दी जिससे सभी हितधारक और कुंठित हो गए। ईरान ने माँग की है कि समझौते पर वार्ता शुरू होने से पहले उसपर से सभी प्रतिबंध हटा दिए जाएँ।

इब्राहिम रईसी (बाएँ)

ईरान की यह भी माँग है कि यूएस उसे आश्वासन दे कि भविष्य में इस समझौते से बाहर निकलने का वह एकतरफा निर्णय नहीं लेगा। अंतर्राष्ट्रीय परमाण ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) अन्य पश्चिमी देशों को चेतावनी देती आ रही है।

उसका कहना है कि यह इस्लामी गणराज्य सिर्फ कुछ माह दूर है और फिर उसके पास एक परमाणु हथियार के लिए पर्याप्त सामग्री होगी। यह भी चिंता व्यक्त की जा रही है कि यूएस के निकलने के बाद इस राज्य ने जो शोध एवं विकास कार्य किया है, उसे पलटा नहीं जा सकता, भले ही यह समझौता हो जाए, तब भी।

यूएस और ईरान के बीच तनाव के कारण समझौते को पुनर्जीवित करने के प्रयास और बिगड़ गए हैं। जुलाई 2019 में ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ ने कहा था कि देश के पास 300 किलोग्राम (किग्रा) से अधिक यूरेनियम हेक्सफ्लोराइड है।

इतनी मात्रा 202.8 किग्रा कम समृद्ध यूरेनियम के बराबर है जो कि संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपोआ) यानी ईरान परमाणु समझौते के तहत तय सीमा है। आईएईए ने उल्लंघन की पुष्टि की है।

हालाँकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि समझौते के जो उल्लंघन हुए हैं, उन्हें लौटाया किया जा सकता है। ईरान के साथ यूएस, यूनाइटेड किंगडम, चीन, फ्रांस, जर्मनी और रूस ने जेसीपोआ पर जुलाई 2015 में हस्ताक्षर किए थे।

159 पन्नों का यह समझौता काफी तकनीकी बारीकियों को लिये हुए है परंतु पाँच मोर्चों पर विशेष ध्यान देता है- भंडारण, समृद्धि, अपकेंद्रित, निरीक्षण और प्रतिबंध। इस समझौते के तहत ईरान को अपने 97 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम का त्याग करना था।

जुलाई 2015

इससे उसका भंडारण 10,000 किग्रा से कम होकर मात्र 300 किग्रा रह जाता। यूरेनियम समृद्धि (यानी कितना प्रतिशत भाग यूरेनियम-235 आईसोटोप का बना हुआ है) की अधिकतम सीमा 3.67 प्रतिशत रखी गई थी।

चीज़ों को परिदृश्य में समझने के लिए देखें कि चिकित्सा शोध में जिस यूरेनियम का उपयोग होता है, वह 20 प्रतिशत समृद्ध होता है, वहीं हथियारों में 90 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम का उपयोग होता है।

इस प्रकार समझौते की ये दो शर्तें सुनिश्चित करती थीं कि ईरान की कोई उभरती हुई परमाणु हथियार विकास योजना न रह जाए। इसके साथ ही, ईरान को अपने तीन-चौथाई अपकेंद्रितों को भी त्यागना था जिनके माध्यम से यूरेनियम को समृद्ध बनाया जाता है।

इससे उसकी परमाणु योजना और कमज़ोर हो गई। निरीक्षण और निगरानी पर भी सहमति व्यक्त की गई। इसके बदले में ईरान की अर्थव्यवस्था को प्रतिबंध हटाकर जीवन दान दिया गया और उसकी 8 करोड़ जनसंख्या की सामाजिक आर्थिक संभावनाओं को बल मिला।

यूरेनियम भंडारण सीमा के उल्लंघन पर परमाणु विशेषज्ञों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दी हैं। एक अपरिष्कृत परमाणु हथियार के लिए 20 प्रतिशत यू-235 से समृद्ध 400 किग्रा यूरेनियम की आवश्यकता होती है।

हो सकता है कि ईरान उपलब्ध यूरेनियम को हथियार का रूप दे पाए लेकिन इसे तैनात करने की क्षमता के अभाव में वह कुछ नहीं कर पाएगा। ईरान के लिए एक पुनर्जीवित समझौता उसकी अर्थव्यवस्था में जान फूँकेगा जो कि प्रतिबंधों एवं कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण काफी बुरी अवस्था में पहुँच गई है।