विचार
सामाजिक सचेतन अध्ययन में भारत की खराब वरीयता के दूरगामी अर्थ न निकालें

सामाजिक सचेतन (सोमि)- यानी दूसरों का ध्यान रखकर किए गए छोटे-छोटे कृत्य जिनमें हमारा कुछ नहीं जाता- पर किए गए वैश्विक अध्ययन में 30 से अधिक देशों की सूची में भारत निचले स्थान पर है। यहाँ तक कि यूएस भी नीचे से नौवें नंबर पर है।

सामाजिक सचेतन के लिए शीर्ष देशों में जापान, ऑस्ट्रिया, मेक्सिको, इज़रायल और चेक है। वहीं मध्यम स्तर पर यूनाइटेड किंगडम, अधिकांश यूरोपीय देश और चीन है। हालाँकि, चीन का हॉन्गकॉन्ग मुख्यभाग चीन से पीछे है।

इससे भारतीयों को लेकर हमारी सामान्य अपेक्षाओं की पुष्टि हो सकती है क्योंकि हम मानते हैं कि सड़क पर कचरा फेंकने या ट्रैफिक जाम से जल्दी निकलने के चक्कर में जाम को और जटिल कर देने में भारतीय अधिक नहीं सोचते हैं।

लेकिन इससे पहले कि हम सोचने लगें कि हम कितने बुरे हैं, हमें पुनर्विचार करना चाहिए- अध्ययन के वास्तुशिल्प में चेतावनी दी गई है कि इससे मूल्यों को न आँका जाए और न ही वरीयता दर्शाती है कि सामाजिक सचेतन के मामले में कोई संस्कृति किसी दूसरे से बेहतर है।

34 देशों के 8,354 लोगों पर किए गए इस क्रोस-कल्चरल शोध को आप यहाँ पढ़ सकते हैं जिसमें कई सावधानियों की आवश्यकता है। पहला, यह अध्ययन लोगों के साथ प्रयोगशाला में किया गया है। अध्ययन इसपर आधारित नहीं है कि वास्तविक जीवन में लोग कैसा व्यवहार करते हैं।

अध्ययन कैसे किया गया, इसपर एक रिपोर्ट कहती है, “लोगों के सामाजिक सचेतन का परीक्षण करने के लिए शोधकर्ताओं ने लोगों से एक स्क्रीन पर दिखाई गई कुछ तुच्छ वस्तुओं में से चुनने को कहा गया, और उनके बाद दूसरा व्यक्ति इन्हीं शेष वस्तुओं में से कुछ चुनेगा।”

इसमें ट्रिक यह है कि आप जो चुनेंगे, उसपर निर्भर करेगा कि आपके बाद आने वाले व्यक्ति के लिए क्या वस्तुएँ बचेंगी। “और उन्हें ध्यान में रखकर वस्तु को चुनना, सामाजिक सचेतन है”, रिपोर्ट में कहा गया।

अवश्य ही इस अध्ययन से कुछ पता चलता है लेकिन कंप्यूटर पर वस्तुओं का चुनाव करने से ही उनका सड़क पर व्यवहार मेल खाएगा, यह जानने के लिए कुछ और भी अध्ययन करना होगा। सोमि को आय स्तर, असमानता, कानून और पर्यावरण सचेतन से भी जोड़कर देखा गया और पाया गया कि अंतिम बात से उसका संबंध है।

रिपोर्ट कहती है, “आर्थिक संपन्नता जो जीडीपी व सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) में दिखती है, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और कानून से सोमि का सकारात्मक संबंध है लेकिन सर्वाधिक संबंध पर्यावरण संरक्षण सूचकांक से है। वहीं, आर्थिक असमानता का सोमि पर बुरा प्रभाव पड़ता है।।”

इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है क्योंकि हम पर्यावरण की तब अधिक चिंता करते हैं जब हमारे पास पैसे होते हैं। निर्धन देशों में लोग इसकी अधिक चिंता करते हैं कि उन्हें अपना पेट कैसे भरना है। लेकिन एक बात जिसपर शोधकर्ताओं ने अध्ययन नहीं किया, वह है सामाजिक विविधता का सामाजिक सचेतन पर प्रभाव।

जापान शीर्ष पर है, इस तथ्य से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एकरूपी समाजों में विविध समाजों की तुलना में अधिक सामाजिक सचेतन होता है क्योंकि लोग “अपने” जैसे लोगों की अधिक चिंता करते हैं “दूसरों” की नहीं।

यह हमारी बस एक धारणा है लेकिन क्यों कुछ संस्कृतियों में सोमि अधिक है और कुछ में कम, यह समझने में यह कारक हमारी सहायता कर सकता है। किसी कारणवश अध्ययन में इस्लामी देशों पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है और जिन दो देशों को देखा गया- तुर्की और इंडोनेशिया, वे सूची में भारत से भी नीचे हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।