भारती / विचार
कोविड-19 “नियंत्रण” की इन छह नीतियों का पुरजोर विरोध होना चाहिए

कोविड-19 वैश्विक महामारी के आरंभ से संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए कई प्रकार की नीतियाँ व्यवहार में लाई गई हैं। उनमें से कई ऐसी हैं जिनका आज अधिक तुक नहीं रह गया है क्योंकि अब तक हम कोरोनावायरस संक्रमण के विषय में बहुत कुछ जान चुके हैं।

लेकिन इसके बावजूद अलग-अलग मात्रा में कई राज्य सरकारें उन नीतियों का उपयोग जारी रखे हुए हैं। इस लेख में हम कुछ ऐसी नीतियों पर बात करेंगे जिनपर व्यक्तिगत रूप से हर कोई हँसता है परंतु सार्वजनिक रूप से कोई उनका विरोध नहीं करता है।

इस विषय में लिखना आवश्यक है क्योंकि महामारी नियंत्रण के नाम पर लाखों लोगों की जीविका के साथ खिलवाड़ हो रहा है। और वह भी तब जब रत्ती भर का भी साक्ष्य नहीं है कि इन नीतियों से संक्रमण नियंत्रित हो सकता है। निम्न छह नीतियों को देखिए जिनकी आवश्यकता नहीं है-

1. होटल व भोजनालयों की अधिकतम क्षमता को 50 प्रतिशत तक सीमित करना

एक आवासीय भवन में क्षमता के 100 प्रतिशत लोग रह सकते हैं लेकिन महाराष्ट्र के होटलों में क्षमता के मात्र 50 प्रतिशत। मुंबई की एक घनी आबादी वाली झुग्गी-बस्ती में 100 वर्ग फीट के क्षेत्रफल में 100 लोग रह सकते हैं और 100 कमरों वाले होटल में भी 100 लोग ही रह सकते हैं।

सड़क किनारे खड़े खाने के ठेले पर बिना मास्क के लोगों की भीड़ जुट सकती है परंतु कई बेहतर सुविधाओं वाले बैठकर खाने वाले भोजनालय में 50 प्रतिशत सीटों पर ही लोग बैठ सकते हैं, अन्यथा एक बार के उल्लंघन पर 25,000 रुपये या उससे अधिक का जुर्माना लग सकता है।

एक समय तो ऐसा आ गया था जब राज्य सरकार ने भोजनालयों से होम डिलिवरी या स्वयं भोजन ले जाने (टेक-अवे) की सुविधा को भी प्रतिबंधित कर दिया था। इन त्रुटिपूर्ण नीतियों की एकमात्र उपलब्धि है कि इन्होंने महाराष्ट्र के 40 प्रतिशत होटल एवं भोजनालय उद्योग को नष्ट कर दिया।

कोविड के दौरान डिलिवरी

2. व्यापार के लिए सीमित समय

यदि प्रतिदिन कुछ तय लोग कुछ तय दुकानों पर जाते हैं तो दुकानों के लिए समय सीमित करने से भीड़ बढ़ेगी और कोविड संक्रमण से निपटने में इससे कोई सहायता नहीं होगी। लेकिन महाराष्ट्र में न सिर्फ समय को सीमित किया गया था, बल्कि आधी दुकानों को खुलने की भी अनुमति नहीं थी।

इसमें “ज़रूरी” और “गैर-ज़रूरी” के रूप में दुकानों के किए गए वर्गीकरण को भी जोड़ लें। यह तो वैसा हुआ जैसे सरकार कुछ व्यापारों से कह रही हो कि आपका अस्तित्व महत्त्वपूर्ण नहीं है। परंतु व्यापारियों, उनके परिवारों, उनके कर्मचारियों और उनके ग्राहकों के लिए वह व्यापार महत्त्वपूर्ण है।

3. मॉल बंद रखना

मार्च 2021 में मॉल स्वामियों ने महाराष्ट्र सरकार को एक ज्ञापन सौंपा था कि वे कोविड-19 को नियंत्रित रखने के लिए सभी आवश्यक प्रयास करेंगे यदि उन्हें खोलने की अनुमति मिलती है तो। उनके सुझावों को आस्वीकार किया गया।

अंततः मॉल खोलने की अनुमति मिली लेकिन एक शर्त थी कि उनके सभी कर्मचारी पूर्ण रूप से टीकाकृत होने चाहिए जिसने उनके द्वारों पर फिर से ताले लगा दिए। वहीं, रेहड़ी-पटरीवालों को, अकेली दुकानों और सरकारी कार्यालयों को बिना किसी शर्त के खुलने की अनुमति मिली।

तो फिर क्यों केवल मॉल कर्मचारियों के लिए ऐसी शर्त रखी गई। साथ ही, मॉल में जो खरीददार जाएँगे, उनके लिए तो ऐसी कोई शर्त नहीं थी। यह एक और उदाहरण था कि कैसे अलग-अलग लोगों और व्यापारों पर अलग-अलग नियम लगाए जाते हैं।

कोविड के दौरान मॉल

4. रात्रि कर्फ्यू

इस नीति में निहित धारणा है कि कोरोनावायरस एक खून चूसने वाला वैम्पायर है जिसमें रात्रि काल में विशेष शक्तियाँ आ जाती हैं। वास्तविकता में ऐसा है नहीं। लोगों को सड़कों पर आने से ऐसे समय पर मना करना जब उनमें से अधिकांश घरों पर ही होते हैं, यह मात्र राज्य सरकारों का तरीका है यहा दिखाने का कि “हम भी कुछ कर रहे हैं” जबकि वास्तविकता में वे कुछ कर नहीं रहे होते हैं।

5. सप्ताहांत लॉकडाउन

इस नीति में निहित धारणा है कि सप्ताह के कार्य दिनों में वायरस का व्यवहार अलग होता है और सप्ताहांतों पर वायरस अलग व्यवहार करने लगता है। वास्तविकता में ऐसा नहीं है। वैसे भी अधिकांश स्थानों पर बंद द्वारों के पीछे भी दुकानदार सप्ताहांत पर भी काम कर ही लेते हैं।

बस इसके लिए उन्हें पुलिस वालों को “प्रसन्न” रखना होता है। सप्ताहांत लॉकडाउन के पीछे विचार है कि लोगों को “अनावश्यक” या “गैर-ज़रूरी” खरीददारी करने के प्रति असहज किया जाए। और हो भी क्यों न, आखिर यह सरकार का ही तो दायित्व है कि वह तय करे कि कौन-सा व्यापार आवश्यक है और कौन-सा अनावश्यक।

6. ब्लैंकेट लॉकडाउन

जब भारत पहली लहर की चपेट में नहीं गया था, उससे पहले मैं स्वयं लॉकडाउन नीति में विश्वास रखने वाला व्यक्ति था। लेकिन अब तक, पर्याप्त से अधिक कारण हमारे पास हैं ह समझने के लिए कि ब्लैंकेट लॉकडाउन अकुशल होते हैं।

यहाँ तक कि वर्तमान स्थिति में तो ब्लैंकेट लॉकडाउन उल्टा फल देने वाले होते हैं और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि वे व्यापारों एवं जीविकाओं के लिए घातक होते हैं। इस बारे में मैं पहले भी बात कर चुका हूँ कि दूसरी लहर के दौरान मुंबई में पूर्ण लॉकडाउन तब लगाया गया था जब सप्ताह भर से दैनिक मामले कमतर आने लगे थे।

लॉकडाउन के दौरान मुंबई

जिन शहरों ने पूर्ण लॉकडाउन नहीं लगाया था, ऐसा नहीं था कि वहाँ पर स्थिति लॉकडाउन वाले शहरों से कुछ ज़्यादा खराब थी। यहाँ तक कि भारत के प्रधानमंत्री ने भी आह्वान किया था कि पूर्ण लॉकडाउन न लगाया जाए।

उनका कहना था कि छोटे-छोट कन्टेन्मेंट ज़ोन (संक्रमण नियंत्रित करने वाले क्षेत्रों) पर ध्यान दिया जाए। लेकिन महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों ने आगे बढ़कर पूर्ण लॉकडाउन ही लगाया। इसके कारण हुए आर्थिक नुकसान को पूरे प्रदेश को झेलना होगा और इसके असहाय नागरिक काफी पिछड़ गए हैं। कई व्यापार फिर कभी खुल नहीं सकेंगे।

अंतिम बात

लॉकडाउन जैसे संक्रमण नियंत्रित करने के प्रयास तब कारगर सिद्ध होते हैं जब वायरस पूरे समुदाय में फैला न हो। यह नीतियाँ तब काम नहीं कर सकती हैं जब देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक भी वायरस ने अपनी पहुँच बना ली हो।

अब राज्य सरकारों की बस यह भूमिका रह गई है कि वे सुनिश्चित करें कि अस्पतालों में आवश्यक सुविधाएँ तैयार रहें, हालाँकि इसकी संभावना बहुत कम है कि एक बड़ी तीसरी लहर आएगी परंतु फिर भी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्टर को दुरुस्त करने में कोई हानि नहीं है।

साथ ही, बड़े स्तर पर टीका अभियान चलने चाहिए जो अपने आप में ही अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों की संख्या को भारी मात्रा से कम कर देंगे। मेरी कामना है कि राज्य सरकारें अपनी विचारहीन और त्रुटिपूर्ण नीतियों से आम लोगों के जीवन से खेलना बंद कर दें।

अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें दो बातें सुनिश्चित करें- पहली तो यह कि अपने अस्तित्व के लिए भीख माँगने या घूस देने की बजाय लोगों को उनकी जीविक कमाने दिया जाए जिसका अधिकार भारत का संविधान उन्हें देता है। दूसरा, सामूहिक टीकाकरण व स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से खतरे को कम करे।