विचार
सनातन परंपरा की धारा सिख धर्म अब्राह्मिक मानसिकता न अपनाए
मनु - 23rd December 2021

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥२।५॥ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसःपरस्तात्।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेतिनान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥३।८॥

(हे अमृत के पुत्रों! सुनो! हे दिव्यधामवासी देवगण! तुम भी सुनो! मैंने उस अनादि, पुरातन पुरुष को प्राप्त कर लिया है, तो समस्त अज्ञान-अंधकार और माया से परे है। केवल उस पुरुष को जानकर ही तुम मृत्यु के चक्र से छूट सकते हो। दूसरा कोई पथ नहीं।– श्वेताश्वतरोपनिषद्॥ २।५, ३।८॥)

पूर्व और पश्चिम दो दिशाएँ हैं, आकाश के दो छोर हैं। एक हमें प्रकाश से परिचित कराता है, दूसरा अंधकार से। पूर्व के वासियों की प्रवृत्ति अनादिकाल से प्रश्नों के उत्तर खोजने की रही है।

‘यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे’ का मूलमंत्र लेकर वे वाह्य के साथ-साथ आत्मिक विकास में तत्पर रहे। इस अनंत यात्रा में उन्हें जो ज्ञानबिंदु मिले, उन्होंने उसे संकलित किया, शिरोधार्य किया, प्रसार किया।

साथ ही साथ इस मुक्ताहार में सदैव कुछ नए मोती जोड़ते रहे। कदाचित समय को भी याद नहीं कि बोध, चिंतन, मनन की मानव की यह यात्रा कब प्रारंभ हुई और कहाँ समाप्त होगी, इसलिए इनका नाम पड़ा ‘सनातन’ और इस ध्वजा को थामकर चलने वाले सनातनी कहलाए।

समय बदला, भिन्न-भिन्न कारणों से इनका स्थान सिमटने लगा, विभिन्न शाखाओं का एक-दूसरे से संपर्क समाप्त हो गया और धीरे-धीरे एकत्व का इतिहास तक विस्मृत हो गया। सिंधु घाटी से उद्धृत सभ्यता को नाम मिला ‘हिंदू’।

हिंदू अपने आप में अनेक जलधाराओं को समेटे महासागर जैसे थे। बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव पंथमात्र ही माने जाते थे, स्वयं से भिन्नता का भाव न था। सतत् परिशोधन की क्रिया में उत्पन्न हर पंथ का आदर था, सम्मान भी।

पश्चिम में दो नवीन पंथों का उदय हुआ, जो कबीलाई मानसिकता से ग्रस्त और सत्ता संघर्ष को लालायित थे। पैतृक शाखा के साथ ये ‘अब्राह्मिक मत’ कहलाए। ये एक किताब, एक ईश्वर, कठोर निर्देश और अन्य के प्रति असहिष्णुता से भरे हुए थे।

सत्ता संघर्ष में इन्होंने भयंकर नरसंहार और अत्याचार किए। संसार में पूर्वस्थापित धर्मों और संस्कृतियों को लगभग मिटा दिया। इन्होंने ब्लासफेमी या ईशनिंदा नामक शब्द से विश्व का पहली बार परिचय कराया, जिसमें अपने मत से भिन्न व्यक्ति को प्राणदंड या यातना मिलती थी।

पूर्व की ओर बढ़ता इनका विजयरथ सनातन के कारण ठिठका। कम्युनिज़्म, धर्मांतरण, सदियों-सदियों के आक्रमण, आंशिक विजयों के बाद भी सनातन के अंतिम गढ़ भारत पर पूर्ण विजय न मिल सकी, तो पंथों में फूट पैदा की गई संप्रदायों का नाम देकर।

जो सबसे पुरानी धारा थी, उसे हिंदू पहचान दी गई, अन्य को बौद्ध, जैन, सिख आदि अलग-अलग धर्मों का नाम देकर बाँट दिया गया। विद्वेष बढ़ा, किंतु फिर भी एक सूत्र में ही बंधे रहे। तोड़ने के प्रयास बार-बार भारतीयों ने विफल किए।

किंतु जिन लोगों की आस्था जन्मभूमि से अधिक बाहरी लोगों को भाई मानने में थी, उन्होंने विभाजन करा ही लिया। दूसरा देश बनाने के बाद उन्होंने वही किया जो पूरे विश्व में करते आए थे, अन्य सभी मतावलंबियों का नाश।

सिख शौर्य, साहस और अपने देश के प्रति वफादारी के प्रतीक थे और भारत की पश्चिमी सीमा के रक्षकों में से भी एक। षड्यंत्र के तहत खालिस्तान के नाम पर उन्हें भड़काया गया, जिसकी कीमत सहस्रों सिखों, हिंदुओं के नरसंहार और देश की प्रधानमंत्री के प्राणों से चुकानी पड़ी।

वर्षों में यह आग लगभग बुझ चुकी थी कि षड्यंत्रकारियों को कोरोना महामारी के रूप में पुनः अवसर मिल गया। एक तरफ भारत घुटने टेकने के बजाय वैक्सीन निर्यातक के रूप में विश्वरक्षक बन उभर रहा था, वहीं दूसरी ओर बाहरी शक्तियाँ अंदरूनी भेदियों से मिल विप्लव के बीज बोने में लगीं थीं।

शाहीन बाग, बंगाल, केरल हिंसा से बढ़ता हुआ यह सिलसिला किसान आंदोलन तक पहुँचा। कृषि सुधारों के विरोध में खड़े किए गए इस आंदोलन में किसानों के मुद्दे किनारे लग गए और खालिस्तानियों का दखल बढ़ता गया।

सिखों की छवि इस पूरे घटनाक्रम में बुरी तरह धूमिल हुई। हत्या, बलात्कार, लाल किले से तिरंगा नोचकर निशान साहिब लगाना, निहंगों द्वारा पुलिस और एक व्यक्ति का हाथ काटने के बाद हत्या जैसी घटनाएँ काले धब्बों की तरह उनके दामन से चिपक चुकी हैं।

इसी बीच कट्टरपंथियों ने अब्राह्मिक संप्रदायों का एक और गुण अपना लिया, बेअदबी या ईशनिंदा के नाम पर लिंचिंग और हत्या। बांग्लादेश में क़ुरान के नाम पर नरसंहार, बलात्कार और हत्याएँ हुईं, पाकिस्तान में पोस्टर फाड़ने पर एक श्रीलंकाई नागरिक को जीवित जला दिया गया।

उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलते हुए भारत में सिखों के पवित्रतम स्थान के प्रतीक हरमंदिर साहिब में एक नवयुवक को ग्रंथ साहिब की बेअदबी का आरोप लगाते हुए पीट-पीटकर मार डाला गया और लाश दरवाज़े पर डाल दी गई। उसी दिन कपूरथला में भी गुरुद्वारे में गए एक व्यक्ति को ऐसे ही आरोपों पर पीटकर मार दिया गया।

अपराध घृणित होता है, किंतु उससे भी घृणित होता है उसका बचाव और उसे सही ठहराने का प्रयास। पंजाब फिर से भिंडरावाला युग की ओर लौटता दिख रहा है। भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों गतिविधियों का केंद्र बना दिया था, जिसे समाप्त करने के लिए सैन्य कार्यवाही करनी पड़ी।

अपने पवित्र स्थल को अपवित्र करने के आरोप में एक सिख अंगरक्षक द्वारा ही इंदिरा गांधी की हत्या हुई जिसकी कीमत सिखों ने 1984 के नरसंहार के रूप में चुकाई। उसके जख्म अभी तक भर नहीं पाए हैं, और इतिहास दोहराने के कगार पर आ खड़ा हुआ है।

जो इतिहास से सीख लेकर सुधार नहीं करते वे नष्ट जाते हैं। उस समय सिखों ने इस पागलपन का प्रतिरोध कर स्वयं को बचाया था, उन्हें फिर से खुद ही खुद को बचाना होगा। वे लोग कौन हैं जिन्होंने लिचिंग जैसा जघन्य पाप कर हरमंदिर साहब की फर्श खून से लाल कर दी?

समाज को स्वयं उन्हें पहचानकर हाशिए पर डालना होगा, न्यायिक व्यवस्था से दंड दिलवाना होगा। मनुष्य सामाजिक पशु कहलाता है, किंतु पशु यदि हिंस्र होकर आदमखोर हो जाए तो मारना पड़ता है। सिख सनातन परंपरा के पुत्र हैं। उनकी गुरबानी में,

सतिनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि

(ओंकार एक है, सत्य उसका नाम है। वह सृष्टि का रचयिता पुरुष है। वह भयसे रहित है, उसे किसी से वैर नहीं है, वह कालातीत है, इसलिए नित्य है। वह अयोनि है अर्थात जन्म मरण के चक्र से परे है, वह स्वयंभू है, उसकी लब्धि मात्र सतिगुर की कृपा से ही है।)

आदि सचु, जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु॥१॥

(वह प्रभु ही एकमात्र सत्य है। जब कुछ भी नहीं था,तब भी उसकी सत्ता थी,चारों युगों से पूर्व वह सत्य स्वरूप परमात्मा विद्यमान था,आज भी वही है और भविष्य में भी उसी की सत्ता स्थिर रहेगी।)

जपुजी साहिब का चिंतन और मनन होता है, न कि किसी कबीलाई तालिबानी विचारधारा का। अभी भी समय है, अपने वास्तविक शत्रुओं और मित्रों को पहचानें और गलत के विरुद्ध खुलकर आवाज़ उठाएंँ, विरोध करें, रोकें। अन्यथा,

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
समय लिखेगा जो तटस्थ हैं, उनका भी अपराध।।

मनु विज्ञान में परा-स्नातक हैं। वे भारतीय इतिहास और धर्म पर अध्ययन एवं लेखन करती हैं।