संस्कृति
रामकथा के शूर्पणखा प्रसंग और दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय की आज प्रांसगिकता

कथाएँ आधी-अधूरी पता हों, तो अक्सर अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बना रहता है। अधूरा ज्ञान खतरनाक सिद्ध होने संबंधी कहावतें भी होती हैं। जैसे उर्दू के “नीम” का मतलब कम, थोड़ा, या आधा जैसा होता है। इस जानकारी के साथ अगर “नीम हक़ीम ख़तरे जान” को पढ़ा जाए तो उसका अर्थ होगा कम जानने वाला हक़ीम जान का खतरा पैदा कर सकता है। अगर “नीम” का उर्दू वाला “आधा” अर्थ न लगाकर कोई इसे पेड़ मान ले, तो इसी का ये मतलब भी निकाला जा सकता है कि “जान ख़तरे में हो तो नीम ही आपका वैद्य है”।

भारत में रामकथा के अत्यंत प्रचलित होने के कारण कभी-कभी श्रीराम की कथाओं में भी ऐसा किया जाना दिखता है। जैसे एक उदाहरण तो शूर्पणखा की कहानी ही है। असली कथा के अनुसार जब रावण ने शूर्पणखा के पति को मार दिया था तो वह रावण से नाराज़ अपने दूसरे भाइयों खर-दूषण के पास रहने लगी थी। यहाँ जब उसने श्रीराम को देखा तो उसकी दोबारा विवाह करने की इच्छा हुई।

इसी इरादे से वह उस कुटी पर जा पहुँची जहाँ सीता-राम और लक्ष्मण रहते थे। जब श्रीराम कुटी से थोड़ा अलग, लक्ष्मण और सीता से थोड़ी दूरी पर बैठे थे तो वह उनके पास अकेले में बात करने जा पहुँची। श्रीराम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखने पर उन्होंने साफ कह दिया, “मैं तो एक ही पत्नी वाला हूँ, हाँ, तुम चाहो तो लक्ष्मण से पूछ लो।” शूर्पणखा ने देखा और सोचा लक्ष्मण भी उतना बुरा नहीं, युद्ध में कुशल है, कुछ ही वर्षों के लिए निर्वासित है मगर राजकुमार है, दिखने में भी अच्छा है। तो वह लक्ष्मण के पास जा पहुँची।

लक्ष्मण ने कहा कि वे तो श्रीराम के दास हैं, उससे विवाह करने पर तो शूर्पणखा को भी सीता-राम की दासी ही होना पड़ेगा! यह विचार करने पर शूर्पणखा फिर श्रीराम के पास गई और उन्होंने फिर लौटा दिया। इस तरह जब कुछेक बार हो चुका तो शूर्पणखा का अहंकार जागा और उसे लगा कि दोनों भाइयों ने मिलकर उसका बड़ा अपमान किया है। वह गुस्से में बोली, “जब तक सीता है तभी तक तो एक पत्नी व्रत? मैं इसे ही मार दूँ तो फिर तो तुम्हें मुझसे विवाह करने में दिक्कत नहीं होगी?”

अपने असली रूप में शूर्पणखा अब सीता को खा जाने झपटी और सीता के पास ही खड़े लक्ष्मण ने उसे रोककर उसकी नाक ही काट ली। अब अकारण ही हत्या करने का प्रयास करने के लिए अंग-भंग का दंड ज्यादा नहीं लगता। कोई आपकी भाभी को खा जाने लपके और आप उसकी सिर्फ नाक काटें, तो यह तो मामूली दंड होगा। हाल ही में कुछ तथाकथित किसान नेताओं ने तो “मॉब-लिंचिंग” (भीड़ हिंसा) को क्रिया की प्रतिक्रिया बताया है।

हाँ, लेकिन जिन्हें शूर्पणखा के बारे में पता ना हो, वे अवश्य अपने ही बहनोई की हत्या कर देने वाले रावण जैसा भाई माँग सकती हैं। अपने ही ग्रंथों की कथाएँ इसलिए भी पता होनी चाहिए, ताकि कोई आसानी से उनके नाम पर बरगला न सके। दुर्गा सप्तशती में मिलने वाली कथाओं को देखेंगे तो भी ऐसे ही दिखेगा कि उन्हें दकियानूसी बताकर आपको पढ़ने सिर्फ इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि किसी को जानकारी छुपानी थी।

प्रथम चरित्र में एक ही अध्याय आता है। इसमें 14 उवाच, 24 अर्धश्लोक और 66 श्लोक, यानी कुल 104 मंत्र हैं। मोटे तौर पर इसकी कहानी सुरथ नाम के एक अच्छे से राजा पर शुरू होती है। वे प्रजा का ध्यान रखने वाले शासक थे लेकिन इनपर एक बार कोला नाम के आक्रमणकारी हमला कर देते हैं। कोला गिनती में कम थे लेकिन राजा सुरथ उनसे जीत नहीं पाए और हार के शोक में अकेले ही जंगल में चले गए।

वहाँ उनकी भेंट समाधि नाम के एक व्यापारी से हुई जो उनसे मिलती-जुलती स्थिति में था। दोनों इस सोच में पड़े थे कि जो धन-संपदा, पुत्र-पत्नी जैसी चीज़ें अब उनकी नहीं रहीं, उसी के मोह में उनका मन क्यों फँसा हुआ है? इसी चर्चा के दौरान उनकी दृष्टि मेधा ऋषि के आश्रम पर पड़ती है और वे ऋषि के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहुँच जाते हैं। ऋषि उन्हें महामाया की शरण में जाने का परामर्श देते हुए, महामाया के प्रकट होने की कहानी सुनाते हैं।

ऋषि की कथा के अनुसार एक बार जब भगवान् विष्णु सो रहे थे, तो उनके कान के मैल से मधु-कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस उत्पन्न हुए। वे ब्रह्मा को ही मार डालने को उद्दत हुए तो ब्रह्मा ने विष्णु को जगाने के लिए महामाया की उपासना की। महामाया के विष्णु के शरीर से बाहर आते ही भगवान् जाग गए और उनका मधु-कैटभ से वर्षों तक युद्ध हुआ। लंबे समय तक लड़ने के बाद महामाया के ही प्रभाव से मधु-कैटभ प्रसन्न हो गए और विष्णु के बल की प्रशंसा करते हुए उनसे ही वर मांगने को कहा!

विष्णु ने माँगा, “तुम दोनों की मृत्यु मेरे हाथों हो।” उत्तर में राक्षसों ने कहा, “ठीक है, लेकिन हम ऐसी जगह मरेंगे जहाँ भीगा न हो।” क्षीरसागर में सूखा कहाँ होता? भगवान् विष्णु ने अपनी जाँघ पर रखकर, दोनों का सर चक्र से काट लिया। पहले अध्याय के संक्षेप में बस इतनी ही कहानी आती है। हो सकता है कि “हारे को हरिनाम” जैसा इस कहानी में सब कुछ छूटने पर भी आशा और पुनः प्रयास करना न छोड़ने जैसा कोई प्रेरक प्रसंग आपको आसानी से न दिखे।

आप इस कहानी को एक नशे के आदि किसी “ड्रग एडिक्ट” की दृष्टि से भी देख सकते हैं। नशा भी माया का ही एक रूप है। उसके प्रभाव में व्यक्ति तो चेष्टा छोड़ देता है लेकिन उसकी इस आदत से फिर सिर्फ उसे नहीं बल्कि उसके पास के लोगों को भी समस्या होती रहती है। यह वैसा ही है जैसा भगवान् विष्णु का स्वयं नींद में होना और उनसे उत्पन्न राक्षसों का उनके आसपास स्थित, उनकी नाभि कमल में स्थित ब्रह्मा को खाने के लिए तैयार होना।

किसी बुरी आदत को पकड़ना आसान होता है लेकिन छूट जाना उतना सरल नहीं होता। लगभग वैसे ही जैसे मधु-कैटभ उत्पन्न तो अपने आप, आसानी से हो जाते हैं, लेकिन उनसे लड़ना सहस्रों वर्ष तक पड़ता है। अंततः अगर आपके लगातार के प्रयास इतने हों कि विरोधी ही स्वेच्छा से हार मानने को तैयार हो जाएँ तब आप खुद, अपने-आप ही ऐसी किसी बुरी आदत से मुक्ति पाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे किसी भी दुर्गुण से ऐसे ही जीता जाता है। ये कहानी मनुष्य के आतंरिक विजय और मोक्ष की ओर बढ़ने की भी है।

नशे जैसे दुर्गुणों के बदले अगर इसे सोशल मीडिया पर आसानी से देखना हो तो आपको कई बार ऐसे लोग मिलेंगे जो अकारण ही स्वयं को सही, और दूसरे सभी को गलत बताने पर तुले होंगे। इनकी समस्या भी बाहर के किसी व्यक्ति से नहीं आ रही। यह जो क्रोध, द्वेष और किन्हीं विचारों को सही मानने वालों के प्रति घृणा का भाव है, वह भी कहीं बाहर से नहीं आ गया। मधु-कैटभ की ही तरह ये भी अपने ही कान के मल से उत्पन्न है।

जैसे आप जो खाते-पीते हैं उसके पोषण का प्रभाव शरीर पर पड़ता है, वैसे ही जो आपने सुना-देखा या पढ़ा उसका असर आपकी सोच पर होगा। जिसे “फ़ास्ट फ़ूड” कहते हैं, उसे खाकर पहलवान बनने की अपेक्षा नहीं कर सकते। कोई “केसरी” खाकर सचमुच “जबां केसरी” हो जाने की अपेक्षा करे तो यह मूर्खता है। इनसे स्वयं तो बोलने में, नशे की आदत के कारण, दिक्कत होती ही है, साथ ही यत्र-तत्र थूकते रहने के कारण आपके आसपास के लोगों को ज्यादा दिक्कत होगी।

अधिकांश मामलों में ऐसा पाया जाता है कि अपने किसी तनाव, या मानसिक समस्या का सामना करने के बदले उसे भूल जाने के लिए ऐसे नशे का प्रयोग आरंभ होता है। ‘सभी करते हैं इसलिए आपको भी करना चाहिए’, जैसे किसी “पियर-प्रेशर” में आने की बजाय आपको स्वयं से सही निर्णय लेने का आत्मविश्वास रखना चाहिए। या जिसके बर्ताव से आपको समस्या हो रही है, उस संबंधी-रिश्तेदार (अक्सर माता-पिता या पत्नी जैसे निकट संबंधी) को बताना चाहिए कि वह अपना व्यवहार सुधारे।

जागृत रहते तो मधु-कैटभ उत्पन्न ही नहीं होते। आपका ध्यान कहीं और था, या आपने भविष्य में होने वाली कठिनाइयों का सोचा नहीं। अब जब यह समस्या सामने है तो हो सकता है लंबा युद्ध लड़ना पड़े। मधु-कैटभ का सामना करने के बदले भगवान् विष्णु उन्हें मनमानी तो नहीं करने देते न? सीधा सामना करने का परिणाम यह होता है कि मधु-कैटभ स्वयं ही अपने नाश की विधि बता देते हैं। नशे में भी उससे जूझ रहे व्यक्ति को “ट्रिगर” का पता चलने लगता है, जिससे वह नशे की ओर बढ़ता है।

फिर ऐसे “ट्रिगर” से संबंध तोड़ लेना आसान है। जैसे मधु-कैटभ को जल युक्त स्थान से अलग करके मारा जा सकता है, “ट्रिगर” हटते ही ऐसे दुर्गुणों पर भी विजय पाई जा सकती है। वापस राम-कथा का संबंध याद करें, तो ऐसे दुर्गुणों से न जीतने पर कई बार शूर्पणखा जैसा ही नाक कटने की संभावनाएँ भी बन जाती हैं। बाकी कोविड-काल में मास्क लगाए जाते हैं, कई बार कटी नाक भी ढकी रहे, दिखे न, यह प्रबंध भी किया जा सकता है।

सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्।।
सर्वाबाधा विर्निर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।