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केंद्र सरकार के प्रोत्साहन के पश्चात ईवी कैब्स ने बढ़ती ईंधन लागत के कारण गति पकड़ी

केंद्र सरकार के हाल ही के दिनों में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को व्यापक रूप से अपनाने की दिशा में बल देने के कारण इलेक्ट्रिक कैब की अवधारणा ने गति पकड़ी है।

ईंधन की उच्च लागत का कैब व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। फिर भी उच्च ईंधन लागत इलेक्ट्रिक कैब संचालकों के लिए एक वरदान साबित हुई।

सरकार द्वारा तेज़ी से ईवी प्रोत्साहन और हाइब्रिड व इलेक्ट्रिक वाहन (फेम-2) योजना के निर्माण, जिसने इनकी लागत में भारी कटौती की है, ने इलेक्ट्रिक कैब अनुभाग में लगी कंपनियों को अपने बेड़े में अधिक वाहन जोड़कर अपने संचालन को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया है।

उदाहरण के लिए भारत की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कैब चलाने वाली कंपनी ब्लूस्मार्ट वर्तमान में दिल्ली-एनसीआर में 680 से अधिक ऐसे वाहनों का संचालन करती है।

जिस समय उन्होंने 2019 में कारोबार शुरू किया था, उस समय वे 70 कारों के बेड़े से लगभग दस गुना बढ़ गए हैं। इसके अतिरिक्त, कंपनी ने टाटा मोटर्स के साथ अन्य 3,500 टिगोर ईवी के लिए भी ऑर्डर दिया और उनका 2025 तक लगभग 100,000 वाहनों का एक बेड़ा बनाने का लक्ष्य है।

इसी प्रकार रेडियो टैक्सी सेवा ईज़ीकैब्स संचालक कारज़ोनरेंट आने वाले 12 से 15 महीनों में अपने 2,000 कारों के पूरे कारोबार को इलेक्ट्रिक में बदलने की योजना बना रही है। वे अगले 5 वर्षों में अपने बेड़े को 19,000 कारों तक बढ़ाएँगे।

इकोनॉमिक टाइम्स को ब्लूस्मार्ट के संस्थापक-सह-सीईओ अनमोल जग्गी ने बताया, “यदि अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें तो एक इलेक्ट्रिक कार का मूल्य अब भी डीज़ल कार की तुलना में लगभग 2 लाख रुपये अधिक है, जो ईएमआई पर 5,000 रुपये का बोझ डालता है लेकिन बचत के रूप में डीज़ल 15,000 रुपये और सीएनजी 10,000 रुपये प्रतिमाह बचाता है। इस वजह से ईवी का पक्ष भारी है।”