राजनीति
आत्मघाती हमलावर भारतीय राजनीति में भी हैं

आत्मघाती हमलावरों का सबसे बड़ा और पहला सुनियोजित प्रयोग जापानी सेना ने किया था, द्वितीय विश्व युद्ध में। अमेरिकी सेनाएँ कई दिनों तक सदमे में रहीं। सभी विरोधी सेनाओं को इस युद्ध नीति के सदमे से उबरने में समय लगा और इससे पहले की वे संभल पाते, अनेक आत्मघाती हमले हो चुके थे।

बाद में तो ये जिहादियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन गए और आज तक इनका प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। लेकिन राजनीतिक आत्मघात का अनूठा प्रयोग जो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने देखा, वह भी अत्यंत आश्चर्यजनक और विस्मयकारी है।

सबसे पहले दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों का ध्यान से अध्ययन कीजिए। इसे आत्मघाती राजनीति की शुरुआत मानिए। सन् 2013 तक कांग्रेस शीला दीक्षित के नेतृत्व में 43 सीटों के साथ सरकार में रही। तब भाजपा के पास 23 सीटें थीं।

2013 दिसंबर में आम आदमी पार्टी ने पहली बार में ही 28 सीटें जीतने के साथ धमाकेदार एंट्री की। तब भाजपा को 32 सीटें मिली थीं और कांग्रेस 43 से सीधे ही 8 पर आ गई थी। याद कीजिए, तब तक नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में घोषित कर दिया था, गोवा अधिवेशन में।

अभी सिर्फ घोषणा हुई थी और यह काल के गर्भ में था कि इस नाम पर 2014 में देश की प्रतिक्रिया क्या होगी। तब दिल्ली में त्रिशंकु विधानसभा बनी। कांग्रेस के 15.5 प्रतिशत वोट छीज गए और वह 24.6 प्रतिशत पर आ गई। केजरीवाल को 29.5 प्रतिशत वोट मिले और भाजपा को 33 प्रतिशत यानी सर्वाधिक वोट मिले।

हम यह मानकर चलते रहे कि एक नई सोच, लोकलुभावन वादों और “पब्लिक अगेंस्ट करप्शन” आंदोलन के साथ राजनीति में आने के कारण केजरीवाल को यह भारी समर्थन मिला। यह बात बहुत हद तक सही भी थी। अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद भारत की राजनीति में नए युग की शुरुआत हुई।

भाजपा ने एक के बाद एक सभी विपक्षी किलों को जीतने का अभियान प्रारंभ किया। दिल्ली विधानसभा त्रिशंकु थी। कांग्रेस के समर्थन पर सरकार बनी थी। कांग्रेस ने 2014 में सरकार गिरा दी और दिल्ली में मध्यावधि चुनाव हुए 2015 में। अब रोचक कहानी शुरू होती है यहाँ से।

अबतक मोदी-शाह की अजेय छवि बन चुकी थी और समस्त विपक्ष सदमे में चला गया था। इतने विषम दौर में दिल्ली की सरकार को गिराना और चुनाव में जाना जहां सभी के लिए जोखिम भरा था, वहीं पर कांग्रेस के लिए तो यह निर्णय निश्चित रूप से बचकाना बताया गया।

सभी राजनीतिक पंडितों की यही मान्यता थी कि कांग्रेस दिल्ली की सत्ता सीधे ही भाजपा को सौंपना चाहती है। अब 2015 के चुनाव परिणाम देखिए। 70 में से 67 सीटें जीती आम आदमी पार्टी ने। भाजपा-कांग्रेस के घोषित मुख्यमंत्री उम्मीदवार हार गए।

अजय माकन की जमानत जब्त हो गई। भाजपा की तीन सीटें आई और कांग्रेस की शून्य। कांग्रेस के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। कांग्रेस 9.8 प्रतिशत और केजरीवाल 54.5 प्रतिशत पर आ गए। भाजपा को पिछले चुनाव में मिले 33 प्रतिशत के मुकाबले इस बार भी 32.2 प्रतिशत वोट मिले।

ये कैसे हुआ? दो साल पहले तक 43 सीटों पर काबिज पार्टी शून्य पर आ गई? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि लगभग सभी की जमानत जब्त कैसे हो गई? यहाँ से होती है भारत में आत्मघाती राजनीति की शुरुआत।

“बड़े दुश्मन को परास्त करने के लिए खुद का भी बलिदान मंजूर।” तब किसी को भी यह विश्वास नहीं हुआ कि कांग्रेस ने जान-बूझकर ऐसा किया होगा। राजनीति के विशेषज्ञ पूछते हैं, इससे कांग्रेस को क्या लाभ हुआ?
कांग्रेस सीधे ही समर्थन दे देती!
कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन भी तो कर सकती थी!

पहली बात तो यह है कि कांग्रेस भली-भाँति जानती है कि यह स्थानीय दल राष्ट्रव्यापी नहीं हैं और केंद्रीय विकल्प सिर्फ कांग्रेस ही है। इसलिए भाजपा को राज्यसभा में रोकने के लिए राज्यों में भी भाजपा की जीत को रोकना, हर कीमत पर आवश्यक है।

दूसरा कारण यह है कि यदि कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन कर लेती है या समर्थन की घोषणा कर देती है तो उसके पारंपरिक हिंदुओं के वोट का पहले ही भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाएगा। उन्हें आखिरी क्षण तक भ्रम में रखना बहुत आवश्यक है।

जहाँ तक मुस्लिम वोटों की बात है, तो यहाँ तक आते-आते कांग्रेस को यह समझ आ गया था कि मुस्लिम मतदाता किसी भी राजनीतिक दल से, कभी भी मोह-माया नहीं पालते हैं। वे सिर्फ उसके पक्ष में वोट करते हैं जो उनके एकमात्र मंसूबे की राह में सबसे बड़ी अड़चन को हरा सकता है, यानी भाजपा।

उनका एकमात्र राजनीतिक विमर्श तो आप जानते ही हैं- वफ़ा ए रसूल, निज़ाम ए मुस्तफा! तीसरा कारण यह है कि कांग्रेस इन चुनावों में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए मजबूर भी है। अन्यथा उसका कार्यकर्ताओं का आधार भी नष्ट हो जाएगा और मतदाता चुनाव निशान भी भूल जाएंगे।

कांग्रेस ने दिल्ली का 2020 का चुनाव पुनः बिना जीतने का प्रयास किए ही लड़ा। फिर से शून्य सीटें मिली। भाजपा तीन से आठ तक पहुँच गई और कांग्रेस 4.5 प्रतिशत वोट लेकर भी ज़श्न मनाते हुए देखी गई जबकि 66 में से 63 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। आप समझ सकते हैं क्यों।

इधर पश्चिम बंगाल के अप्रैल 2021 के चुनावों में कांग्रेस ने लेफ्ट से सतही गठबंधन तो किया लेकिन वे सब मिलकर 4.5 प्रतिशत वोट ही ले सके। आश्चर्य नहीं होता है? भाजपा 10 से 38 प्रतिशत पर आ गई और 3 से 77 सीटों पर पहुँची लेकिन लेफ्ट-कांग्रेस ने अचानक कुर्बानी देकर ममता को 15 प्रतिशत वोटों की क्षतिपूर्ति कर दी।

ममता 45 से 48 प्रतिशत पर पहुँच गई और 215 सीटें लेकर इकतरफा जीत गई। मुस्लिम मतदाताओं ने अपना एक भी वोट व्यर्थ नहीं किया और अपने ओवैसी को भी बैरंग ही हैदराबाद लौटा दिया, बिना चुनाव लड़े ही।

परिणाम वही हुआ। लेफ्ट और कांग्रेस ने हिंदुओं के वोटों के ध्रुवीकरण को रोके रखा और अंतिम समय पर अपने वोट ममता की तरफ मोड़ दिए। खुलेआम आत्महत्या करके जश्न में शामिल हो गए। स्मरण कीजिए, ओवैसी ने बिहार में सिर्फ 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और अकेले किशनगंज से 5 सीटों पर काबिज हो गए।

वहां मुस्लिम उम्मीदवारों की निश्चित जीत का गणित था जो हर हाल में राजद के समर्थन में ही जाने वाले थे। लेकिन वहाँ भाजपा बाल-बाल बची क्योंकि कांग्रेस तेजस्वी के साथ गठबंधन में लड़ रही थी। अब यही अकेले लड़ने का प्रयोग उत्तर प्रदेश में किया जा रहा है।

कुछ लोग यह मानते हैं कि अकेले लड़ने से तो पहले से भी कम सीटें मिलेंगी। बात तो सही भी है। लेकिन यहाँ सीटों की किसको पड़ी है। कांग्रेस को मालूम है कितनी मिलेगी। गठबंधन करके लड़ा था पिछला चुनाव। 403 में से 7 सीटें मिली थीं।

ध्रुवीकरण हो गया था भाजपा की तरफ। लेकिन अकेले लड़ने का प्रयोग दिल्ली और पश्चिम बंगाल में सफल रहा है। अचरज इस बात पर होता है कि यह योजना कौन बना रहा है? कौनसी ऐसी बड़ी ताक़तें हैं जो व्यापक स्तर पर देश के समस्त विपक्ष को अपने इशारों पर खिला रहीं हैं?

इतनी दूरगामी योजनाएँ भला कैसे क्रियान्वित हो रही हैं और भाजपा की इतनी गहरी घेराबंदी किन ताकतों के इशारे पर हो रही हैं? जो ओवैसी गाहे-बगाहे हर जगह चुनाव लड़ने पहुँच जाते हैं, वे भला पश्चिम बंगाल से किसके दबाव में अच्छे बच्चे की तरह बिना चुनाव लड़े ही लौट आए?

कहीं ऐसा तो नहीं कि ये ताकतें हमारे अंदेशे से भी बहुत बड़ी हैं और देश की सीमाओं के बाहर से यह सब खेल खेल रहीं हैं? अब भाजपा ने यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे अथवा उत्तर प्रदेश की दुर्भिसंधियों के गणित को समझने में ज़रा भी चूक की तो यह उसपर बहुत भारी पड़ने वाली है।

सुभद्र पापडीवाल एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार हैं। करुणा संस्था एनजीओ के अध्यक्ष हैं। वे ऑपइंडिया, द ऑर्गनाइज़र, स्वराज्य व ऋतम में अपने आलेख लिखते रहे हैं।