श्रद्धांजलि
सावरकर इसलिए प्रिय हैं मुझे

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर आधुनिक भारत के ऐसे विचारक हैं जिनके विचारों ने देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। स्वातंत्र्य के प्रचेता, राष्ट्रवाद के प्रणेता, हिंदुत्व के ध्वजवाहक, भारतीय संस्कृति के प्रचारक और उद्भट प्रस्तोता, इतिहास के व्याख्याता स्वातंत्र्य वीर सावरकर का प्रादुर्भाव एक युगांतकारी घटना है।

षड्यंत्रपूर्वक इतिहास के पन्नों से विस्मित वह माँ भारती के ऐसे सपूत हैं जो ब्रिटिश हुकूमत के आगे झुके नहीं, जो कालापानी के क्रूर दंड से डरे नहीं। जेल में अंग्रेज़ों की लाख यातनाओं को झेलते हुए भी इस पवित्र पावन भारतभूमि के प्रति निष्ठा और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में लेशमात्र भी कमी नहीं आई, वरन् प्रत्येक पल उनकी भक्ति दृढ़ होती रही।

सावरकर ने हमेशा वह लिखा जिसे उन्होंने सत्य माना, भले उनके विरुद्ध गांधी और उनके करोड़ों समर्थक थे। सावरकर की इस सत्यप्रियता से बहुत प्रभावित होता हूँ। वे निडर थे। सावरकर ने कभी झुंड से डरकर वह लिखा या कहा या माना नहीं जो उनके निकट असत्य या अहितकारी था।

बोअर युद्ध, ज़ुलू विद्रोह के समय जब गांधी दूसरे अफ़्रीकी देशों में उभरे स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने में ब्रितानी शासन का साथ दे रहे थे तब के सावरकर के लेख पढ़ने चाहिए। वे केवल तार्किक लेखन का ही नहीं बल्कि अच्छे लेखन का भी मानदंड हैं।

सावरकर के प्रति मेरे मन में इसलिए अधिक सम्मान है कि उन्होंने अपनी उन परिकल्पना-संकल्पना को साकार करने के लिए विविध आयामों/संस्थाओं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में स्थापना की, जो उन्होंने अपने सर्जन में उभारी थीं। फिर जीवनभर, उस संस्थान को अपनी प्रज्ञा-प्रभा और श्रम से पोषित भी किया। आने वाली पीढ़ियों ने उसे और आगे बढ़ाया।

देश के स्वघोषित नीति निर्माता और बुद्धिजीवी तो अपने सपनों का बोझ अगली पीढ़ी पर डालकर सोचते हैं कि उन्होंने बड़ा काम किया है। फिर, नई पीढ़ी गोष्ठी करती है कि फलां के सपनों का भारत कैसे बनाएँ? मुझे सावरकर इसीलिए प्रिय हैं कि वह सपने अगली पीढ़ी के माथे छोड़कर नहीं गए थे। उपदेशों की पोटली मात्र देकर नहीं गए। उन्होंने जो बदलाव अपेक्षित समझे, उसके लिए मिशन की स्थापना की। आज वह आगे बढ़ रहा है।

सावरकर यथार्थवादी थे। वे हमेशा व्यवहारिकता की विचार भूमि पर विचरण व करते थे। न कि आदर्शवादिता की कपोल कल्पित आकाश में। वह निरुद्देश्य खून बहाने के पक्ष में न थे। उनका मानना था कि देहोत्सर्ग दाधीच की तरह किया जाता है, जब बोध हो कि यह व्यर्थ न जाएगा। मर जाना ही शौर्य होता तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती। कौशल तो स्वयं को बचाते हुए लड़ना है।

1955 में मेरठ से सत्याग्रहियों का एक जत्था गोवा जाते समय मार्ग में बंबई/ककर वीर सावरकर से आशीर्वाद लेने पहुँचा, तो उन्होंने जत्थे के उपनेता और दैनिक प्रभात (मेरठ) के संपादक वि. सं. विनोद से कहा था-

आप क्रांति भूमि मेरठ से इतनी दूर गोवा को मुक्त कराने की अभिलाषा से गोलियां खाने, बलिदान देने आए हो, यह आप लोगों की देशभक्ति का परिचायक है। किंतु सशस्त्र पुर्तगाली दानवों के सम्मुख आप नि:शस्त्र, खाली हाथ मरने जाओ, यह नीति न मैंने कभी ठीक समझी, न अब समझता हूँ।

आप लोगों के अंदर बलिदान देने की भावना है, तो आप लोग हाथों में राइफल लेकर क्यों नहीं जाते? वह समझते थे कि हमारे सारे संकल्प, सारे संघर्ष, सारी आशाएँ और आकांक्षाएँ देह से जुड़ी हैं। इसे अकारण गँवा देना अपराध है।

1983 में विनायक सावरकर की जन्मशती के अवसर पर पुरुषोत्तम देशपांडे ने कहा था, “आप सबने मेरा आजीवन कारावास नामक उनकी पुस्तक में अंडमान में उनके द्वारा झेले गए कष्टों के बारे में पढ़ा होगा। हालाँकि मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक में उनके द्वारा झेले गए कष्टों का 10 प्रतिशत वर्णन भी नहीं किया है, क्योंकि वह हमसे प्रतिक्रिया स्वरूप ये सुनना नहीं चाहते थे कि ‘हे भगवान, सावरकर ने कितने कष्ट झेले हैं।’ बल्कि वे युवाओं से प्रतिक्रिया स्वरूप ये सुनना चाहते थे, वक्त आने पर देश के लिए मैं भी सावरकर जैसे कष्ट झेलने के लिए तैयार हूँ।”

उन्होंने कभी स्वयं के लिए सहानुभूति नहीं, बल्कि देश के लिए समर्पण माँगा। उन्होंने न सिद्धियों का संग्रह किया, न संकल्पों का। प्रवाह का जल प्रवाह को लौटते रहे। जब वे सावरकर का विरोध करते हैं तो समूची भारतीयता के विरोधी होते हैं। उन क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों का विरोध करते हैं जिन्होंने सशस्त्र क्राँति के मार्ग में स्वयं को अर्पित कर दिया।

सुखद है कि वीर सावरकर को लेकर फैलाए भ्रमों की धुंध अब साफ होने लगी है और उनके योगदानों और संघर्षों का उचित मूल्यांकन होने लगा है। आज भी हम यदि कहीं किन्हीं समस्याओं से ग्रस्त हैं, तो उनमें नेतृत्व की किंकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था ही अधिक जिम्मेदार है। नेतृत्व के मानस का अंतर्द्वंद्व यदि सावरकर की तरह स्पष्टवादी हो जाये तो सारी व्यवस्था में ही आमूलचूल परिवर्तन आ सकता है।