व्यंग्य
ट्वीटर सी ई ओ विवाद- जैक और जातिवाद का बिजूका

जीवन में मर्यादा का अपना स्थान है। मर्यादा पुरूषोत्तम होना तो कठिन है किंतु जीवन का उद्देश्य हमारे लिए वास्तविकता और आदर्शवाद के मध्य वह भूमि ढूँढना है, जो संभव भी हो और मर्यादित भी। सत्य अक्सर दो चरम विचारों के मध्य स्थित होता है। उदाहरण के लिए अतिथि सत्कार के संबंध में भारतीय संस्कारों के विषय में ग्रंथ एवं काव्य लिखे गए हैं। भारतीय पर्यटन का सत्य, विदेश मंत्री द्वारा चहुँ ओर लगाए गए ‘अतिथि देवोभवः’ के नारों और दिल्ली की सड़कों पर ऑटो-चालकों द्वारा लगाए गए निरर्थक चक्करों के बीच है।

भले ही हम भोलेपन से पहली बार पधारे दंपत्ति से उनकी परिवार वृद्धि परियोजना का पर्ट-चार्ट बनवा लें, हमारा स्नेह आगंतुकों के लिए मुग़लों से होकर अँग्रेज़ों से लेकर आज तक क़ायम है। अतिथि अगर अंग्रेज़ी भाषी हो तो हमारी अतिथि सत्कार की भावना ऐसे हिलोरें मारती है कि हृदय के सागर में सुनामी-सा आभास होता है। अंग्रेज़ी तो यूँ भी रौब की भाषा है, और अंग्रेज़ी भाषी अतिथि श्वेतवर्णी हो तो फिर बात ही क्या, भोला-भाला भारतीय स्वागत में “लिखूँ तेरे स्वागत-पत्र” की मुद्रा में आ जाता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अतिथि इस सहज भारतीय सौजन्यता से भाव-विभोर होकर अपनी अतिथियोचित मर्यादा से भटक जाता है। पूर्व में पधारे पंजाब के ज़िला कनेड्डा के प्रमुख एवं हाल में पधारे ट्विटर अध्यक्ष यह मान लेते हैं कि उन्हें अपने सीमित कार्यक्रम में राष्ट्रभंजक अलगाववादियों से भी मिलना है, और राम मोहन राय जी की पगड़ी पहनकर राष्ट्र का उद्धार भी करना है। यह इन महानुभावों की महानता है कि इस प्रक्रिया में यह अपने सीमित ज्ञान का विज्ञापन करने से भी संकोच नहीं करते। पश्चिम का भारत के प्रति ज्ञान इतना ही है कि भारत की जनता को कुछ स्पष्ट समूहों में बाँटा जा सकता है। पश्चिमी विद्वानों के अनुसार भारत प्रधानतया सपेरों और सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का पथभ्रमित राष्ट्र है, जहाँ के अंग्रेज़ीदा रौबदार लोग बाकी लोगों का उद्धार करने में व्यस्त हैं।

मानव इतिहास में उपनिवेशवाद एक बार में नहीं आया, वरन अलग-अलग समय में इसकी भिन्न-भिन्न धाराएँ चली हैं। पहली धारा क्रूसेड और जिहाद के धार्मिक-सैनिक साम्राज्यवाद की रही, दूसरी एडम स्मिथ की वाणिज्यिक उपनिवेशवाद की रही। हमने पहली लहर को ‘कोउ नृप होई, हमें का हानि’ के निर्विकार भाव से स्वीकार किया, दूसरी धारा को भी हमने लगभग तीन शताब्दी यह कहकर स्वीकार किया कि किराना वाला बदलने से भला राष्ट्रीय विचार और पहचान को क्या कष्ट। कुछ नहीं माने, संघर्षरत रहे, भारत स्वाधीन हुआ। किंतु इसी बीच तीसरी धारा आकार ले चुकी थी- वैचारिक उपनिवेशवाद की।

श्वेत-वर्णीय त्वचा के प्राकृतिक दायित्त्व के बोझ से स्वयं को मुक्त करने में जुटे विशिष्ट विदेशी इसी वैचारिक उपनिवेशवाद की धारा में ऐसे बह निकलते हैं और भूल जाते हैं कि वे लॉर्ड कॉर्नवालिस या मैकॉले नहीं हैं जो सांस्कृतिक प्रभुता के सेनानी हों। वे भूल जाते हैं कि उनका अतिथि धर्म सिर पर पगड़ी बाँधकर और ताज महल के शिखर पर हाथ रख कर फ़ोटो खिंचवाने, नमस्ते इंडिया के ट्वीट करने और आई लव बॉलिवुड के संदेश भेजने की परंपरा तक सीमित है।

ऐसे भटके हुए सिपाही व्यापार-वाणिज्य भूलकर आंग्ल भाषी विद्यासागर भारतीय संस्कृति के सुधारक बन जाते हैं। जैसे भूमिहीन किसान होते हैं, भारतीय समाज में वैसे ही समर्थक विहीन नेता होते हैं जो ऐसे मूढ़मना विशिष्ट विदेशी आगंतुकों की तलाश में रहते हैं जो हमारी आंतरिक समस्याओं को परिवर्धित करके अंतर्राष्ट्रीय आयाम दे। इससे उन्हें रूप या के अलावा डॉलर में चंदा जमा करने की सुविधा प्राप्त हो जाती है। ट्विटर नरेश जैक डॉर्सी विगत यात्रा इसी श्रृंखला की एक कड़ी है जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष से मिल कर बनाई गई मस्त-मज़ाकिया बिरयानी में ब्राह्मण विरोध का कंकर भरने का अवसर उन व्यक्तियों को दे दिया जिन्हें हम आम तौर पर पत्रकार के नाम से जानते हैं। समाज सेवा के संदर्भ में इनका वास्तविक दखल उतना ही है जितना मेरा फैशन के क्षेत्र में किंतु भोले-भाले जैक को क्या पता। सदियों से निवर्तमान सुश्री जिल्ल अपने समकालीन जैकों को पहाड़ पर पानी भरने के नाम पर ले जाकर उन्हें लुढ़काती रही है और इनके सर-फ़ुटौव्वल का साधन बनती रही है।

जैक साहब उस राष्ट्र से आते हैं जिसे आम तौर पर सिख और शेख़ में भेद नहीं समझ आता किंतु ये अपने मैकॉले चाचा की प्रेरणा प्राप्त करके ज्ञान बाँटने से स्वयं को रोक नहीं पाते। वर्ण और जातिभेद को यह उस समय से एक समझते आए हैं जब श्री मैकॉले 12 अक्टूबर 1936 को अपने पिता को लिखते हैं कि यदि अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति लागू रही और सब योजना के अनुसार रहा तो बंगाल में तीस वर्षों में एक भी मूर्ति-पूजक नहीं बचेगा और हम ये सब बिना धर्मान्तरण का काम सार्वजनिक रूप से किए, कर पाएँगे। भले ही लॉर्ड मैकॉले अपने तीस वर्ष के उद्देश्य में सफल नहीं हो पाए, यह मैकॉले की प्रच्छन्न धार्मिक उन्मादपूर्ण योजना का ही प्रभाव है कि जैक तो छोड़िए, उसके साथ खड़े होकर “पितृ-सत्तात्मक ब्राह्मणवाद के विनाश” का जाति विरोधी प्लेकार्ड लेकर खड़े अधिकांशतः तथाकथित अगड़े समुदाय के लोग आज भी हिंदुत्व को एक प्रतिगामी धर्म मानकर लज्जित होते रहते हैं।

जैक भूलते हैं कि वर्ण-व्यवस्था अपने मूल रूप में एक नव-स्थापित सभ्यता को संरचना एवं आकार दे रहे थी और जिस देश, अमेरिका, के मूल निवासियों को श्री जैक के पूर्वजों ने हाशिये पर धकेल दिया, वह देश तब अस्तित्व में भी नहीं था। वर्ण-व्यवस्था मात्र समाज को कार्य, व्यवसाय एवं योग्यता के अनुसार बाँटती थी। यह वर्ण-व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर प्रतिभा एवं कौशल पर आधारित थी। पश्चिमी समाज जो शारीरिक अंगों में भी भेद करता है, वे वर्ण के सिद्धांत की तरलता कहाँ समझ पाते। उन्होंने अपनी सोच के अनुसार भारतीय दर्शन को परिभाषित किया और अपनी राजनैतिक आवश्यकता के अनुसार उसे समझा। चर्च द्वारा प्रेरित अंग्रेज़ शासकों के लिए उस जनक को जानना असंभव था जो शासन भी करता था, हल भी चलाता था और ऋषि भी था, या वो मनु जो स्वयं शासक होकर भी बुद्धिजीवि ब्राह्मण को सम्मान का पात्र मानता था। मैकॉले शिक्षित जो भारतीय आज इस पर लड़ लेते हैं कि राम प्रसाद बिस्मिल ब्राह्मण थे या क्षत्रिय, जैक कहाँ समझ सकते हैं कि ब्राह्मण का अर्थ क्या है। विडम्बना यह है कि वंशवाद के समर्थक आज जातिवाद के विरोध की आड़ में हिंदू धर्म पर निशाना लगाते हैं, जबकि तथ्य यह है कि वर्ण को व्यापक स्टार पर वंशवाद में परिवर्तित करना ही जातिवाद है। जब एक वर्ण में स्थापित पिता तय करता है कि वह और उसके वंशज ही उस वंश का व्यवसाय कर सकेंगे, तो ही जातीय क्लेश उत्पन्न होते हैं, और धर्म का विघटन होता है। वर्ण में प्रवेश स्वगुण पर आधारित था, न कि जन्म पर। श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण (जन्मतः यादव, कर्म से क्षत्रिय, विचार से ब्राह्मण) गीता के माध्यम से राजपुत्र अर्जुन को ब्राह्मणत्व की ओर बढ़ने को कहते हैं और बोलते हैं-

ब्राह्मण क्षत्रिय विशां शूद्राणांच परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।

अध्याय 18 श्लोक 41, श्रीमद्भगवत गीता

(हेपरंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों तथा शूद्रों के कर्म स्वाभाव से उत्पन्न गुणों के आधार पर निर्धारित किए गए हैं।)

पश्चिमी प्रचारकों ने इसे तो खुलकर प्रचारित किया कि शूद्रों को शास्त्रों में ब्रह्मा के चरणों से उत्पन्न बताया गया किंतु इसे छिपा गए कि हिंदू दर्शन में चरणों को निकृष्ट न मानकर देव चरणों को चरण कमल कहा गया है, और उन पर शीश झुकाया गया है। चारों वर्णों को ईश्वर का ही अंश कहा गया। पश्चिमी प्रचारकों का विशेष स्नेह ब्राह्मण वर्ग पर रहा क्योंकि वंशवादियों ने वैमनस्य के बीज बोए और पश्चिमी प्रचारकों के लिए हिंदू बुद्धिजीवि समाज जिसे वेदों में ब्राह्मण कहा गया। गीता में श्रीकृष्ण ब्राह्मण उसे कहते हैं जो सत्यनिष्ठ, जितेन्द्रिय, स्थिर प्रज्ञ एवं घृणा-विहीन हो। आवश्यक नहीं कि वह एक जनेऊधारी हो। जनेऊ भी राजनैतिक शस्त्र-शिक्षा का प्रतीक था एवं व्यक्ति के शिक्षित ब्राह्मण होने का परिचायक। उपनिषदों में ब्राह्मण ज्ञान का अंतिम लक्ष्य। उस ज्ञान, उस ब्राह्मण के विनाश की कामना, भारतीय सनातन संस्कृति पर प्रहार का प्रयास है, जिसकी जितनी भर्त्सना हो काम है। जैसे ब्राह्मण-वर्ण क्षत्रिय अर्जुन के लिए प्राप्य था, समस्त भारतीयों के लिए आदर्श एवं अभिप्राय बने। जो जैक भारत आकर चर्च के बिशप द्वारा नन के बलात्कार पर शांत रह जाते हैं और उस देश से पूंजी प्राप्त करते हैं जो हिज़ाब हटाने की सज़ा महिलाओं को कोड़ों से देता है, इस मूर्खतापूर्ण जातिवादी घटना को लिंग समानता के उन्नत उद्देश्य से न जोड़ें और मित्र राष्ट्र की अवमानना पर आत्मचिंतन करें, यही उचित होगा। अन्यथा उन्हें ता महल के शिखर पर हथेली टिकाकर तस्वीर खिंचाकर लौट जाना चाहिए था। ब्राह्मण की उत्पत्ति बृह-से है, जिसका अर्थ है बढ़ता हुआ, विस्तार लेता हुआ, उपनिषद के अनुसार ब्राह्मण अनंत की ओर अग्रसर आत्मा का प्रतिरूप है (छन्दोग्योपनिषद 14 खण्डश्लोक 4)। क्या जैक उस जागृत, विवेकशील आत्मा के विनाश की कामना करते हैं जो मनुष्य जीवन का आध्यात्मिक उद्देश्य है और जो समस्त मानव समाज को एक मानकर स्वयं में समेटता है?

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। साकेत सूर्येश जी @saket71  द्वारा ट्वीट करते हैं।