व्यंग्य
शिक्षकों की स्थिति पति, राष्ट्रपति समान— अधिकार-विहीन भौकाल! सिरफिरों का सप्ताहांत

कल शिक्षक दिवस था। शिक्षक दिवस कल ही के दिन अर्थात् 5 सितंबर को ही होता है। एक दिन से अधिक शिक्षकों के प्रति सम्मान करने का राष्ट्र का साहस नहीं है। जैसे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस एक ही दिन मनाया जाता है, भारत में शिक्षक दिवस भी एक ही दिन मनाया जाता है।

शिक्षक दिवस का स्थान भारतीय व्यवस्था में नीचे आता है क्योंकि इस दिन बूंदी भी नहीं बँटती है। इसका कारण यह हो सकता है कि यह दिवस भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। डॉ राधाकृष्णन ने अपना स्नातकोत्तर शोध ‘वेदांत एवं उसके आध्यात्मिक निष्कर्ष’ पर लिखा था। डॉ राधाकृष्णन ने यह दुस्साहस स्वामी विवेकानंद के प्रभाव में 19वीं सदी के प्रारंभ में किया। इसी कारण उनका शोध स्वीकार भी हुआ और चहुँओर उनका सम्मान भी हुआ।

आधुनिक युग में, वर्तमान धर्मनिरपेक्ष वातावरण के प्रादुर्भाव के पश्चात वेदांत पर शोध करने वाले डॉ राधाकृष्णन पैदा हुए होते तो उन्हें शिक्षक की नौकरी भी न मिलती। स्वतंत्रता के पश्चात उन्हें भारत का द्वितीय राष्ट्रपति बना दिया गया। समाज में शिक्षक, राजनीति में राष्ट्रपति एवं भारतीय पति – एक-सा ही स्थान रखते हैं। इनके चारों ओर इनकी महिमा का भ्रम और भौकाल होता है, परंतु वस्तुतः नियत विषय एवं अधिकार क्षेत्र से इतर कुछ भी कहने की इन्हें अनुमति नहीं होती है।

अपनी तय सीमाओं के भीतर बंधे अपने निरीह राजनीतिक अस्तित्व से बंधे जैसे डॉ राजेंद्र प्रसाद से ज्ञानी जैल सिंह तक भिन्न-भिन्न प्रकार के राष्ट्रपति होते हैं, भिन्न–भिन्न प्रकार के पति होते हैं, शिक्षक भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। प्राचीन काल में शिक्षकों की दबंगई हुआ करती थी परंतु कालांतर में वे पतिवत होते चले गए।एक समय छात्र संघों का ज़ोर चला तो शिक्षक विद्यार्थियों से आतंकित होने लगे, बाद में जब पुत्र पिताओं को ‘हे ब्रो’ जैसी संज्ञाओं से संबोधित करने लगे, शिक्षक अभिभावकों से आतंकित होने लगे।

उपभोक्तावाद में शिक्षक, गुरु अर्थात् महती होने से मात्र एक सेवा प्रदाता होकर रह गया। छात्र भी शिक्षक को उसी भाव से देखने लगे जैसे एक भोजन प्रेमी अपने सामने बैठे हलवाई को देखता है, जिसके सामने की कड़ाही में उसके भविष्य की जलेबी तली जा रही हो। शिक्षक उन छात्रों को शिक्षित करते हैं जो डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं।

यह संभवतः 1990 के बाद का परिवर्तन रहा कि शिक्षण व्यवसाय की अभिलाषा से बाहर हो गया। जो रोजगार प्राप्त कर लेते थे, डॉक्टर और इंजीनियर बन जाते थे और जो नहीं बन पाते थे, शिक्षक बन जाते थे। परीक्षा में उत्तीर्ण होने की आवश्यकता हटाकर शिक्षक के हाथ से बचा खुचा शस्त्र भी ले लिया गया। आज्ञापालन एवं अनुशासन के लिए वह पूर्णतः छात्रों की भलमनसाहत पर निर्भर होता है।

वर्तमान में शिक्षक एक उत्तम राष्ट्रपति एवं एक उत्कृष्ट पति की भाँति सिर्फ होता है, सुनाई नहीं देता है। यही कारण है कि बहुधा शासन उन्हें वेतन आदि देने के संदर्भ में भी अधिक चिंतित नहीं होता। सरकारी शिक्षक तो आधे साल स्वयं हड़ताल पर होते हैं, आधे वर्ष विद्यार्थी धरना प्रदर्शन पर निकल लेते हैं।

ऐसा नहीं है कि सभी शिक्षक सामान रूप से निरीह होते हैं। कुछ शिक्षक न केवल बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं, कुछ तो बहुआयामी व्यक्तित्व भी रखते है। हाल में ही उत्तर प्रदेश में एक शिक्षक बरेली और मुज़फ्फरनगर में एक ही समय, एक साथ पढ़ाते पाए गए। एक शिक्षिका तो साक्षात् अवतार रूप में 25 विद्यालयों में एक साथ शिक्षा प्रदान करती हुई पाई गईं थी। शिक्षक दिवस पर ऐसे महान् शिक्षकों के विषय में सोचकर मन भावुक ही हो आता है।

वहीं बड़े-बड़े राष्ट्रीय महाविद्यालयों के शिक्षक अपनी मनमर्ज़ी का पाठ्यक्रम बनाते हैं, और छात्रों के गिरोह के सरगना बनकर चहुँओर सम्मान प्राप्त करते हैं। ऐसे शिक्षकों को प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल ने अपनी अमर कृति ‘राग दरबारी’ में खन्ना मास्टर का नाम दिया था और लिखा था कि पढ़ाते तो वे इतिहास थे परंतु पता उन्हें अपने बाप का भी नहीं था।

ऐसे शिक्षक आम तौर पर बड़ी राजधानियों में मिलते हैं जहाँ शिक्षण के साथ उनका कार्य पसंद के राजनीतिक दलों के लिया ‘जुवा कार्जकर्ता’ जुटाना होता है। सरकार को चाहिए कि ऐसे विश्वविद्यालयों का राष्ट्रव्यापी विस्तार किया जाए ताकि गाँव-कस्बों के लोग ऐसे बुद्धिजीवी शिक्षकों के मार्गदर्शन में ढपली संगीत का आनंद ले सकें।

ग्राम्य क्षेत्रों में ‘खूनी दंगल’ एवं ‘सर्वाधिक स्वस्थ कद्दू’ जैसी ग्रामीण स्पर्धाओं में कमी आने के कारण ग्रामीण युवा निराशा के वातावरण में जीवनयापन कर रहा है। प्रतिभावान शिक्षक उन्हें पोस्टर इत्यादि थाम कर जुझारू नेता बना के अपना, ग्रामवासियों का एवं उत्साही छात्रों का मनोरंजन कर सकते हैं।

भारत को ऐसे शिक्षकों की बड़ी आवश्यकता है जो सरकारी वेतन पर सरकारी आवास में रहे और सरकार के विरुद्ध षड्यंत्रों का आह्वान करके राष्ट्रीय वातावरण को रोमांचक बनाए रखें। इस शिक्षक दिवस पर शौर्य एवं वीरता से विद्यार्थियों को ओत-प्रोत करने वाले राष्ट्र-निर्माताओं एवं उनके विभिन्न यूनियनों एवं परिसंघों को मैं हृदय से नमन करता हूँ और आशा करता हूँ कि शीघ्रातिशीघ्र ऐसे विश्वविद्यालय-मय-प्राध्यापक प्रत्येक गाँव, गली-कूचे तक पहुँचे।

एक-एक शिक्षक दर्जनों विद्यालयों में फ़र्ज़ी पद एवं पारिश्रमिक प्राप्त करे। विद्यार्थी के तीनों वर्ग उनके हितकारी हों। विद्या के अर्थी ज्ञान प्राप्त करें, विद्या को अर्थ के माध्यम से प्राप्त करने में विश्वास रखने वाले भरपूर ट्यूशन पढ़ें एवं पेपर लीक कराने का अधिक से अधिक ‘मूल्य देवें’ तथा विद्या की अर्थी उठाने वाले समय समय पर दंगे धरना इत्यादि करके उन्हें घाघ नेताओं के समकक्ष प्रभुत्व, दबदबा एवं सम्मान दिलाएँ।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।