व्यंग्य
व्यंग्य: दिग्विजय-महायज्ञ में आचार्य सीताराम

प्राचीन काल में एक राजा ने दिग्विजय-महायज्ञ कराया। सिद्धि में शंका थी अत: परामर्श के लिए दूर-दूर से बड़े पुरोहित और आचार्यों को बुलाया गया। साम्यवादी-संप्रदाय के प्रधान सीताराम आचार्य भी आए। सिकुड़-सिमटकर शून्य होते साम्यवादी-संप्रदाय का विश्वास ईश्वर पर नहीं था। उनके डूबते स्वर राष्ट्र से परे हुआ करते थे। संप्रदाय के मठ कुछ राज्यों में प्रभावी रहे तो कार्य चलता रहा। अब वे डूबक्षेत्र में थे किंतु राजा को इनकी प्रतिभा, झाड़फूंक, टोना-टोटका पर पूरा विश्वास था। इसीलिए उस युग के प्रकांड विद्वान सीताराम आचार्य आज राजधानी में थे।

चिंतामग्न राजा बोले-आचार्य, यदि यह यज्ञ सफल हो जाए तो एक और नदी परिक्रमा करूँ… राजनीतिक राजपाट… यह शुभ कार्य भी पूर्ण हो जाए… किंतु अज्ञात कारणों से यज्ञ की सफलता के प्रति मन में किंचित भय क्यों है? हमें कुछ नया करना चाहिए आचार्य…

अपने सफेद केशों पर हाथ फेरते हुए साम्यवाद के शिखर पुरुष सीताराम आचार्य ने कहा-हे राजन्, नया क्यों…हम अपने पथ से विचलित क्यों हों… हम तो अब भी बताएँगे कि हमारे तथाकथित महान् शास्त्रों में क्या लिखा है… मैं तो कहूँगा राजन् कि हमें अपने आतंक-पुराण की रचना जारी रखनी चाहिए… अब पीछे पलटने का कोई उपाय नहीं है…

राजा प्रसन्नचित्त हुए। संध्याकाल की सभा में हजारों श्रद्धालु आए। आचार्य ने अग्नि के उत्तापतुल्य अपने युग का ऐतिहासिक उपदेश दिया-कौन कहता है कि हम हिंसा नहीं करते। रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ तो हिंसा के मूल हैं। उनमें क्या है? धनुष, भाले, तलवार, गदाएँ। ये क्या हैं? ये हथियार हैं, जिनका अनेक अवसरों पर उपयोग करके निर्दोष लोगों का रक्त बहाया गया। हंस नामक आश्रम के महामहोपाध्याय राजेंद्र यादव ने एक बार कहा था कि हनुमान संसार के पहले आतंकी हैं, जिन्होंने श्रीलंका की शांतिप्रिय जनता के बीच विध्वंस फैलाया… हमारे ये हिंसक आदर्श अनादिकाल से हैं। हिंसा बहुसंख्यक समाज के मस्तिष्क में इन ग्रंथों ने ही भरी है… महाभारत के महायुद्ध का प्रमुख आरोपी तो हमारे साम्यवादी-संप्रदाय के अनुसार मथुरा का मूल निवासी केशव यादव पिता वासुदेव यादव है… इतना ही नहीं बंधुओ… रामायण काल में श्रीलंका पर हुआ भीषण आक्रमण क्या था? हमारे संज्ञान में आया है कि इस विकट आक्रमण के पूर्व अयोध्या निवासी राम पिता दशरथ रघुवंशी और उनके साथियों ने किष्किंधा में प्रशिक्षण शिविर लगाए थे… तात्पर्य यह है कि हम अनादिकाल से हिंसक रहे हैं… आतंक का संबंध हमारे इन्हीं ग्रंथों के कारण है… यह सत्य हमें स्वीकार करना चाहिए और हमारे राजा को इस महायज्ञ में आशीर्वाद देना चाहिए।

सभा में हिंसा के ज्ञान का यह अध्याय जोड़कर आचार्य राजधानी से विदा होने के पूर्व राजा से मिले। राजा ने कहा-आचार्य द्वापरयुग में जिस गाेवर्धन पर्वत को कन्हैया ने अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था… मुझे तीन बार पर्वत परिक्रमा का सौभाग्य मिला… अब महायज्ञ की पूर्णाहुति के पूर्व बेगूसराय नामक राज्य से उसी लोकप्रिय कन्हैया की रथयात्रा राजधानी में चाहता हूँ… वातावरण कुछ आध्यात्मिक हो जाएगा…।

राजा की बात सुनकर सीताराम आचार्य परम प्रसन्न हुए। बोले-हे राजन्, कन्हैया के स्मरण का यह उत्तम समय है…मुझे तो शांति-संप्रदाय के महान संतश्री जाकिर नाइकानंद का स्मरण हो आया है… इस पवित्र अवसर पर एक उपदेश उनका हो जाता तो आपका महायज्ञ अंतिम आहुति के पहले ही सिद्धि प्रदान करने वाला होता… देवलोक देवता ही उतर आते… किंतु वे तो मलेशिया नामक द्वीप पर साधनारत् हैं… अब देख्निए क्या समय आ गया है… जाकिर नाइकानंद को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है राजन्।

राजधानी के राजपथ पर भव्य रथ पर सवार साम्यवादी-संप्रदाय के प्रधान पुरोहित सीताराम आचार्य प्रस्थान कर रहे थे। उन्हें विदाकर तत्काल राजा दुर्ग में सौ साल से प्रज्वलित अखंड ज्योति के दर्शन करने गए। जाते-जाते आचार्य ने नाइकानंद जैसे महापुरुष का स्मरण करा दिया था। राजा के नेत्र भर आए। उन्हें संतश्री जाकिर नाइकानंद की दुबली-पतली देह का स्मरण हो आया। एक बार एक सभा में राजा ने उन्हें शांति का दूत कहा था।

पवित्र अखंड ज्योति के दर्शन के बाद राजा महायज्ञ शाला में आ गए, जहां कन्हैया के आगमन की सूचना आमंत्रित अतिथियों की सूची में सबसे ऊपर सुशोभित थी। कन्हैया स्वयं बेगूसराय नामक राज्य में एक महायज्ञ में विराजमान थे। राजा को राजधानी में उनकी प्रतीक्षा थी। सीताराम आचार्य के उपदेश ने राजा को उत्साहित कर दिया था…

(प्राचीन काल की इस कथा आज के चुनाव या चुनाव प्रचार और किसी चुनाव क्षेत्र विशेष से कोई संबंध नहीं है। नाम की समानता संयोग भर है।)