व्यंग्य
लज्जित करने के ब्रह्मास्त्र तक क्यों पहुँचा बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं छद्म इतिहासकार गिरोह

प्रसंग- सिरफिरों के सप्ताहांत के 10वें अंक में पढ़ें लज्जित होने और किए जाने की प्रथा।

लाज कमज़ोर चरित्र का लक्षण है। कोईकोई तो बाप का परिचय देने में भी लजाते हैं।“, गुरुदेव टैगोर अपनी अमरकथा गोरा में लिखते हैं।

बहरहाल, उस कथा में गोरा का चरित्र तार्किक दृष्टि से समर्थ एवं बौद्धिक रूप से उत्कृष्ट है। परंतु लज्जा की भूमिका वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बढ़ गई है। जब शौर्य एवं सत्य से काम न चले तो लज्जा का लाभ लेने की भारतीय परंपरा रही है।

भारतीय समाज प्राचीन काल से लज्जित रहा है। पहले आर्य अतिक्रमण की मिथ्या कथा का प्रचार करके उसे लज्जित रखा गया। भारतीय अभिभावक इस भेद को भली-भाँति समझते हैं और आजीवन इसी भय के माध्यम से बच्चों का अनुशासन साधते रहे हैं। ‘देखो, शर्मा जी का पुत्र पहली बार में इंजीनियरिंग निकाल गया’ से लेकर ‘आज मिसेज़ शर्मा मिली थीं, पूछ रहीं थीं पोते की खबर कब देंगी’ तक लज्जा के भाव को उन्नति देकर कार्य सिद्धि की परंपरा भारत में प्राचीन काल से रही है।

मुझे तो कई बार भान होता है कि मीर क़ासिम ने जब सिंध पर या बाबर ने जब पानीपत का युद्ध किया था, उसे यह रहस्य ज्ञात होता तो युद्ध करने के स्थान पर उन्हें लज्जित करके ही भारत पर विजय प्राप्त कर ली होती- जानते हो हम कितनी दूर से आ रहे हैं, समरकंद से कूट के भगाए गए हैं, तुम्हें लज्जा आनी चाहिए जो तुम हमारा विरोध कर रहे हो।

उस युग में चंदरबरदाई जैसे कवि इस रहस्य को जानते तो पृथ्वीराज को लज्जित करके मुहम्मद गौरी को विजयी बनाते और ठाठ से उस काल का मैग्सेसे या पुलित्ज़र प्राप्त कर के किसी ट्रस्ट की पत्रिका के संपादक बनकर जनता की वर्तनी सुधार रहे होते।

जयशंकर प्रसाद लिख गए हैं कि लज्जा नारी का आभूषण है। यह सत्य नहीं है। लज्जा मध्यम-वर्गीय भारतीय का आभूषण है। मध्यम-वर्गीय भारतीय सरलता से लज्जित हो जाता है। सशक्त अभिजात्य वर्ग के पुरुष या नारी लज्जित नहीं होते।

मनुष्यों में लज्जा के संदर्भ में यह भेद देखा गया है। मध्यम-वर्गीय व्यक्ति अपशब्द कहते हुए यदि धरा जाता है तो लज्जित हो जाता है, अभिजात्य कुल का व्यक्ति अपशब्द कहने पर मुखर एवं निर्भीक माना जाता है। मूर्धन्य पत्रकार को गाली देने वाला व्यक्ति तमाम विश्व के द्वारा लज्जित किया जाता है, परंतु साधारण व्यक्ति को गाली देने वाला पत्रकार पौरुष का प्रतीक बन जाता है। इसके पीछे संभवतः रहस्य यह भी है कि लज्जित उसे ही किया जा सकता है जिसे लज्जा के भाव का बोध हो। 

लज्जा मध्यम-वर्गीय भारतीय का आभूषण है और यह लिंग के भेद से परे है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर लज्जा की भावना नैसर्गिक रूप से होती है। यह भावना किसी मनुष्य में कम एवं किसी में अधिक होती है। संभवतः यही एक भाव है जो मनुष्य को पशुओं से एवं नेताओं से भिन्न करता है।

नेता अपने शासन वाले राज्य में 100 लोगों की मृत्यु पर चुप्पी ले लेता है, परंतु जिस राज्य में विपक्षी शासन होता है वहाँ की एक कॉकरोच की मृत्यु पर भी उस समस्त राज्य को लज्जित करने का प्रयास करता है।

ऐसा नहीं है कि वह यह रहस्य नहीं जानता कि विरोधी दल में भी राजनेता ही हैं जो लज्जा भाव से उतने ही प्रतिरक्षित हैं जितने स्वयं वे हैं। उसके आभासी लक्ष्य पर विपक्षी सरकार होती है, परंतु उसका वास्तविक लक्ष्य मतदाता होते हैं जिसने उस सरकार को चुना। वे जनता को अपने वर्तमान चुनाव के लिए लज्जित कर के स्वयं सत्ता में आना चाहते हैं।

नेता भली-भाँति जानते हैं कि जनता में लज्जित होने का सामर्थ्य है, उसे लज्जित किया जा सकता है। इस लिए राजनेता बहुधा एक-दूसरे को लज्जित करने का प्रयास नहीं करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह कार्य असंभव की सीमा तक कठिन है।        

प्रसाद जी की कामायनी में लज्जा का विवरण कुछ इस प्रकार है- मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ- अब जो नेता आज खिजाब लगाए झूठे यौवन के साथ राम जन्भूमि मंदिर के भूमि पूजन में दलितों को न बुलाए जाने के झूठे आरोप लगा रहे हैं उनके समक्ष प्रसाद जी के शृंगार रस की विफलता को पाठक स्वयं ही समझ सकते हैं।

आम मनुष्यों के समान नेता विभिन्न भावों का अभिनय कर सकते हैं, और इसमें लज्जा भी एक भाव है। परंतु हमें उससे विचलित नहीं होना चाहिए। नेता जो कार्य सहगल-सम लहरिया केश-विन्यास बांधकर, अपनी अभिजात्य त्वचा को आम दिखाने के लिए ताम्रीकरण करके एक बुद्धिजीवी बनकर नहीं कर सकते, वह जनता को लज्जित कर सकते हैं।

परंतु नेता के मूल में लज्जा का भाव नहीं है। नेता के मूल में एक ही भाव होता है, वह है बाज़ार भाव जो पार्टी कूदने पर विपक्षी पार्टी के द्वारा लगाया जाता है। अभी कुछ दिन पहले एक राज्य के मुख्यमंत्री इसपर दुखी हो रहे थे कि राजस्थान में सहसा थोक में सत्य के परेशान (पराजित नहीं) हो जाने के कारण भाव बहुत ऊँचे चले गए हैं और उन्होंने लगभग स्पष्ट शब्दों में विधायक मूल्य नियंत्रण नियामक की स्थापना की माँग कर दी। 

मूल भाव यह है कि नेता लज्जा के भाव से निरपेक्ष है और गंभीर से गंभीर दुर्घटनाओं पर लज्जित होने के स्थान पर वक्तव्य देता है, उस वक्तव्य को समाचार-पत्रों में छपवाने का प्रबंध करता है एवं उस समाचार-पत्र की कतरन की तस्वीर लेकर चमचों के हाथों में जान वितरण के लिए सौंपता है। वह गरीबी से दुखी साइकल से मीलों चलने वाली बच्ची को साइकिल देकर और सरकारी उपेक्षा से दुखी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उत्कृष्ट जापानी गुणवत्ता की नायलोन की रस्सी देते हुए फोटो खिंचाता है। 

हमें यह मान लेना चाहिए लज्जा वह शस्त्र है जिसका उपयोग उस समाज को चुप कराने के लिए एवं पालतू बनाने के लिए किया जाता है, जो किसी अन्य विधि से नियंत्रण में नहीं आ रहा हो। अयोध्या में राम मंदिर का शिला पूजन होने के बाद से ही आम समाज को लज्जित करने का प्रयास मुखर हो आया है।

एक लज्जा तो हमारे ऊपर तब से ही है जब शताब्दियों पूर्व हमने जनता के एक महती भाग को ‘कोई नृप होइ हमें का हानि’ का भाव देकर राष्ट्रीय विषय से पृथक कर दिया और जिसका परिणाम हमने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मस्थान को खोकर पाया। अब राम जन्मभूमि का शिलान्यास होने के बाद से ही लंपटों का लज्जा गिरोह हमें लज्जित करने में जुट गया है। 

बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं छद्म इतिहासकार गिरोह तथ्य, न्याय, राजनीति आदि के तमाम साधनों की विफलता के पश्चात उसी ब्रह्मास्त्र पर पहुँच गया है जिससे रूढ़िवादी महिलाओं पर, सत्ताधारी जनता पर एवं बुद्धिजीवी श्रमजीवियों की भावनाओं पर सदियों से विजय प्राप्त करते रहे हैं। 

नए-नए ऐतिहासिक सिद्धांत काढ़े जाएँगे, गांधी होते तो क्या कहते का चरखा चलाया जाएगा। जो गांधी राष्ट्र के एक रक्तरंजित विभाजन पर नहीं बोल सके, उनके पीछे से लज्जा का अस्त्र चलाया जाएगा। राग दरबारी के छंगामल कॉलेज के जो खन्ना मास्टर इतिहास पढ़ाते हैं, परंतु श्रीलाल शुक्ल जी की माने तो जिन्हें अपने बाप का भी पता नहीं, ऐतिहासिक लज्जा के तर्क प्रस्तुत करेंगे।

‘लोग क्या कहेंगे’ ही उनका अंतिम तर्क होगा जब तक हम हारकर यह न कह दें कि हम लज्जित हैं। उनका बस चले तो यदि आपकी जेब कट जाए तो भी वे आपको लज्जित करके इस हद तक विवश कर देंगे कि आप जेबकतरे के स्थान पर स्वयं को लॉकअप में बंद करवा दें।

हमारे बड़े नेताओं ने अपनी राजनीति जनता के तत्परता से लज्जित रहने की भावना पर ही चमकाई है। वे हमें लज्जित करते रहे हैं और हम लज्जित होते रहे हैं। मुसलमानों को वे मुकदमा हारने के लिए और हिंदुओं को मुकदमा जीतने के लिए लज्जित करके अपनी राजनीति चलाते रहे हैं। जब तक उनके भीतर लज्जा की वह सुंदरी श्वास न लेने लगे, नेताओं के नैतिक होने की संभावना कठिन है। तब तक हम इस निर्लज्ज राजनीति को लेकर लज्जित ही हो सकते हैं।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।