व्यंग्य
रुप्पन बाबू को ‘सिरफिरों’-सी चुनौती देकर सत्य के परेशान-पराजित होने में फँसे नए रुप्पन

श्रीलाल शुक्ल के कालजयी उपन्यासराग दरबारीके केंद्रीय चरित्र हैं वैद्य जी, शिवपालगंज के खाँटी खिलाड़ी एवं पुराने नेता। उनके पुत्र हैं रुप्पन बाबू जो कि छात्र नेता हैं। उनका परिचय लेखक पाठकों से इस वाक्य के साथ कराते हैं- वैसे देखने में उनकी शक्ल मरियल बछड़े की सी थी, पर उनका रोब पिछले पैरों पर खड़े हिनहिनाते घोड़े का सा जान पड़ता था। वे पैदायशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे।‘ 

भारतीय राजनीति भी शिवपालगंज की राजनीति का राष्ट्रीय विस्तार ही है। भारत की राजनीति महान नेताओं के ध्रुव पर नृत्य करती है। भारतीय लोकतंत्र के विपक्ष की धुरी भी रुप्पन बाबू एवं उनकी वंशागत महानता के गिर्द घूमती है। ये रुप्पन बाबू भी इसी लिए महान हैं क्योंकि उनके बाप भी महान थे।

उन्होंने अपने राजनीतिक दल को रुप्पन रक्षा समिति’ का रूप दिया। कुछ समय यह ठीक चला, परंतु समस्या उत्पन्न होने लगी जब महानता के मध्य प्रतियोगी भाव उत्पन्न होने लगा। रुप्पन बाबू इसलिए महान हैं क्योंकि उनके बाप भी महान थे, इस आधार पर उन्होंने मध्य, लघु एवं अतिलघु आकार के रुप्पनों से पार्टी को भरकर उसे नया रूप देने का प्रयास किया। 

रुप्पन बाबू एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं, एक दार्शनिक संकल्पना हैं। रुप्पन बाबू भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे केशकर्तनालय भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं, भले ही उनका मूल मंतव्य एवं उद्देश्य एक ही हो। कुछ सैलून खानदानी होते हैं जहाँ नाई को स्टाइलिस्ट कहा जाता है और बाल काटने के बाद उसे टिप वगैरह देने का प्रावधान होता है।  उन्हें पार्लर कहा जाता है और वहाँ व्यंग्यकार किस्म के लोग बाल कटाने नहीं जाते हैं।

वहाँ वे लोग बाल कटाने जाते हैं जो जब बाल कटाकर निकलते हैं तो या तो उनके केश कटे हुए नहीं दिखाई देते या ऐसे दिखते हैं मानों उन्होंने हाल में बिजली का नंगा तार छू लिया हो। कुछ वे केशकर्तनालय होते हैं जो मध्यवर्गीय होते हैं। यहाँ ग्राहक केश कटाने के पश्चात टिप तो नहीं ही देता, बल्कि बातों-बातों में कारीगर को पटा के मुफ्त चंपी कराने की जुगाड़ में रहता है।

रुप्पन बाबू भी अपनी महानता के अनुसार विभिन्न वर्गों में बाँटे जा सकते हैं। प्रत्येक रुप्पन बाबू को अपनी महानता को मानते हुए भी, व्यवस्था में अपने स्थान के प्रति सजग रहना चाहिए। कांग्रेस के प्रधान रुप्पन बाबू सिर्फ इसलिए महान नहीं हैं क्योंकि उनके बाप महान थे।

एक पीढ़ी महानता से ब्लेसित रुप्पन बाबू एक मामूली रुप्पन बाबू होकर रह सकते थे। परंतु प्रधान रुप्पन बाबू की विलक्षणता इसमें निहित थी कि केवल वे अपने पिता की महानता के कारण महान थे, उनके पिता भी इसीलिए महान थे क्योंकि उनकी माता भी महान थी, और तो और उनके पिता की माताजी भी इसलिए महान थीं क्योंकि उनके भी बाप महान थे, और उनके बाप भी इसलिए महान थे क्योंकि उनके भी बाप महान थे।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस दैवीय रुप्पनियत को हम एक आम रुप्पनिज़्म मानकर भ्रमित हो जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र में शक्ति सदैव रुप्पन बाबू के पास होती है चाहे वह राजनीति हो या कला। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य विषय यह है कि प्रकृति ने प्रत्येक रुप्पन को एक सामान नहीं बनाया है।

एक रुप्पन बाबू की सामर्थ्य इस तथ्य पर निर्भर करती है कि क्या वे पुराने, खानदानी रुप्पन बाबू हैं या पहली पीढ़ी के रुप्पन हैं। सत्ता की सीढ़ी पर वे रुप्पन अधिक सम्मानित एवं शक्तिशाली होते हैं जिनकी पात्रता की कड़ी इतिहास में अधिक दूर जाती है।

जब-जब रुप्पन तत्व की हानि होती है और नए एवं छोटे रुप्पन, पुराने, जमे हुए, प्रतापी रुप्पन को चुनौती देते हैं तो उन्हें जाना ही होता है। यही प्रकृति का नियम है। इससे आम जनता को कोई हानि या लाभ नहीं होता, बस व्यवस्था का परंपरागत समीकरण बना रहता है।

छोटे रुप्पन से अपने स्थान के अनुरूप कर्म की, परिणामों की अपेक्षा होती है। बड़े एवं जमे हुए रुप्पन राजनीति में चुनाव हराकर भी, पार्टी को तहस-नहस करके भी अपने स्थान पर जमे रहते हैं। साहित्य के क्षेत्र में घाघ एवं जमे हुए रुप्पन बाबू स्वयं कुछ नहीं लिखते एवं अपनी वंशागत प्रसिद्धि के प्रकाश में दूसरों के लेखन को लुगदी साहित्य बताते हैं और प्रतापी वंश के रोब से आम जनता को आतंकित करके उनके हिज्जे सुधारते रहते हैं।

साहित्य के रुप्पन राजनीति के रुप्पन से जुड़े रहते हैं और राजनीतिक रुप्पन से सत्ता की शक्ति का लाभ प्राप्त करके उन्हें बदले में बुद्धिजीवी स्वीकार्यता प्रदान करते हैं। नए रुप्पन अक्सर यह भूल करते हैं कि वे स्वयं को प्रथम श्रेणी के बड़े रुप्पनों के समकक्ष समझ बैठते हैं और अक्सर बड़े बेआबरू होकर कूचे से निकाले जाते हैं। 

ऐसी अवस्था में अंतरात्मा की आवाज़ पर पार्टी छोड़ देने की धमकी देते हैं। अपनी महानता के जोश में यह महानतम रुप्पन को चुनौती देकर फँस जाते हैं। फँसे हुए रुप्पन का दाम भी अंतरात्मा उचित नहीं लगाती।

अंतरात्मा एवं प्रधान रुप्पन एक ही बाज़ार के व्यापारी हैं। अंतरात्मा खुदरा व्यापार करती है एवं प्रधान रुप्पन थोक सौदे में महारत रखते हैं। ज्ञानी जन जो व्यापार की समझ रखते हैं, गल्ले पर भले ही लालाजी के बड़े बेटे को बैठाएँ, काम करने के लिए कुशल कर्मचारी रखते हैं। इसी कारण इनकी दुकानों पर– पंडित नेहरू के समय से, हमारी कोई शाखा नहीं हैजैसे वचन लिखे होते हैं।

जब बाबाजी प्रधानमंत्री पद पर फ्रेंड के पुत्र को बैठाते हैं तो काम-धाम के लिए प्रसाद जी और पटेल जी को रखते हैं। कर्मचारी जब तक फर्म के काम में रहे, सब ठीक चलता है, समस्या तब होती है जब उनके घरों में रुप्पन जन्म लेते हैं और अपनी महानता का आँकलन नहीं कर पाते।

नए रुप्पन पुराने रुप्पन की अकर्मण्यता से अपनी योग्यता की तुलना करते हैं और उसे ही सत्य मानकर कभी उसे परेशान और कभी पराजित बताते हैं। वे यह नहीं समझते उनकी सामर्थ्य एक परंपरागत रुप्पन के सामने कुछ नहीं है। खानदानी रुप्पन से प्रश्न नहीं पूछे जाते, उनकी पार्टी वह हारमोनियम है जिसे सुर-ताल की समझ के बिना उन्हें बजाने का वंशानुगत अधिकार है क्योंकि उनके अब्बा मरहूम जो थे वे उसे छोड़कर मरे थे। छोटे रुप्पन यह नहीं समझ पाते।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।