व्यंग्य
चंदा जमा करने के अंतर्राष्ट्रीयकरण में उड़ी डिंपल बाबा की निंदिया- सिरफिरों का सप्ताहांत

नेताजी दुखी हैं। चंदा नामक प्रेमिका के विरह से ग्रसित प्रेमी की भाँति लहरिया केश विन्यास वाले नेताजी निरंतर रीप्ले पर लगा कर 1990 के दशक का प्रचलित गीतचंदा चंदा, किस ने चुराई तेरी-मेरी निंदियाबारंबार सुने जा रहे हैं। उनकी अवस्था देखकर पार्टीजनों में हताशा का वातावरण है, और निम्न वर्ग के पार्टीगण आकाश को देख कर प्रार्थना में व्यस्त हैं।

भारतीय राजनीति में चंदा का वही स्थान है जो पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा का होता है। बड़ा नेता वह होता है जो अधिक चंदा प्राप्त कर सकेगा। जैसे पहले संगीतनृत्य आदि को सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी, वैसे ही चंदा लेने की कला का अभ्यास ढके-छुपे तौर से होता था।

नई पीढ़ी के नेता जी ने जब सरकारी लाल बत्ती के चिह्न मिटाकर निरीह मुख मुद्रा के साथ अपने घाघपने को ढाँपकर सक्रिय राजनीति में लैटरल एंट्री मारी, कम लोगों को उनकी प्रतिभा का भान हुआ था। परंतु जब 2014 के दिल्ली चुनाव में उन्होंने हमारे डिंपलयुक्त नेताजी को प्रोटीनयुक्त अंडा प्रदान किया, तो हमारे डिंपलयुक्त लोकप्रिय नेताजी ने उनकी तस्वीर तकिये के नीचे रखनी प्रारंभ कर दी। 

उसी प्रकार का ओजस्वी अपशब्दों से सुसज्जित भाषण, और वैसे ही आरोप और क्षमापत्र के मध्य सधी हुई राजनीति। उन्होंने दिल्ली चुनाव जीतने के पश्चात चौड़े में मंच से कहा– “चंदा सब को देना पड़ेगा”, और हमारे भोले भाले डिंपल बाबा को आभास हुआ मानो राजनीतिक चंदे पर लगे कलंक को इस अवतारपुरुष ने सहसा कलंकमुक्त कर दिया हो और एक कला का रूप प्रदान किया।  

परंतु विगत कुछ दिन उनके लिए सत्य से साक्षात्कार का अवसर थे। पहले महामारी से जूझती राजधानी को इस नवागंतुक नेताश्रेष्ठ ने विज्ञापनों के गाजर दिखाए और स्थिति हाथ से निकलते ही खरगोश की चपलता से रायते का पतीला केंद्र सरकार के हाथ सौंपकर पुनः प्रचार कार्य में व्यस्त हो गए।

हमारे डिंपल बाबा इस चपलता को भाँप सके और प्रतिदिन अपने सचिव को हिंदी की टूटी टाँग के साथ सरकार पर आक्रमण करने को उतारते रहे। द्यूत क्रीड़ा में मगन युधिष्ठिर की भाँति युवराज समय एवं काल का बोध भूलकर निष्काम कर्म के साधक के रूप में सरकार पर निशाना साधे रहे। 

पहले वे विशेषज्ञ पकड़कर लाते रहे और उनके माध्यम से यह प्रयास करते रहे। परंतु विशेषज्ञ मरखन्ने बैल जैसा होता है और कब किसे सींग मार दे पता नहीं होता है। इस संकट से बचने के लिए चाटुकारों ने उन्हें उनकी अंतर्निहित महानता का बोध कराया और वे स्वयं से बातें करने लगे।

अति-उत्साह में उन्होंने प्रधानमंत्री, सेनाध्यक्ष, विदेश मंत्रालय आदि को किनारे करते हुए, अपनी प्रतिभा के आधार पर तय किया कि भारतीय सेना की सीमाओं पर आत्माहुति निरर्थक रही और चीनी सेना भारत में घुसी हुई है। इन सब के मध्य कांग्रेसी संस्था को चीन से प्राप्त चंदे पर बात खुल गई। डिंपल बाबा ने उत्कृष्ट स्तर की थेथरई का प्रदर्शन करते हुए, इस चीनी चंदे की बात पर उत्तर देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।  

पहली बार डिंपल बाबा को इस तथ्य का अहसास हुआ कि चंदा लेना एक परिष्कृत कला है। नए नेता के स्थानीय स्तर पर खेलने को वे पिछड़ापन जान रहे थे एवं स्वयं को उनके खेल को अंतर्राष्ट्रीय स्थान प्रदान करने के कारण इंटरनेशनल खिलाड़ी समझ रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे उनके चीन से चंदे की गाथा की गुत्थियाँ खुलती जा रही थीं, उन्हें सहसा आभास हुआ कि अपने प्रेरणा स्त्रोत से पतलून को एक बिलॉंग लंबा करने के प्रयास में वे कुछ अधिक ही लंबा कूद गए हैं।

राजीव गांधी फाउंडेशन को ऐसे-ऐसे लोगों से चंदे प्राप्त होने की खबरें रहीं हैं, मानों यह फाउंडेशन नहींराजीव गांधी चीनी चमचागिरीयोजना बनती जा रही है। कुछ घाघ कांग्रेसियों का कहना है कि एक आध करोड़ रुपये का चंदा एक कांग्रेस के नेता के ईमान के लिए बहुत कम है।

बात तो उचित है परंतु एक तस्वीर के 2 करोड़ रुपये के लिए भी तो एक सांसद फ़ोन कर रहे थे। बड़े लोग बड़े इसलिए होते हैं क्योंकि वे छोटी रकम का भी बहुत ध्यान रखते हैं। जो छोटी रकम का ध्यान नहीं रखते वे दूसरों की संपन्नता को देख-देखकर अपना खून जलाते हैं और व्यंग्यकार बनते हैं।

ऐसा नहीं है कि हमें राहुल जी पर कोई संदेह है। जैसा कि सर्व विदित है- राहुल जी कोमल स्वभाव, गोल डिंपल-युक्त मुख और हँसमुख प्रकृति के लहरिया केशविन्यास वाले सुदर्शन नेता हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्होंने देश के विरोध में चीनियों का सहयोग करने के लिए धन लिया हो। वे सिर्फ भारतीय राजनीति की चंदा जमा करने की इस महती कला को भारतीय सीमाओं के बंधन से मुक्त कराकर अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करने का प्रयास कर रहे थे।

भले ही आज वे अपनी ज़ुल्फ़ों के ख़म में उँगलियाँ फँसाए ग़मगीन बैठे हैं, इसका कारण इनका भोलापन ही है। कलाविहीन सरकार उनके जैसे भोले-भाले कलाकार की प्रतिभा को समझ नहीं पा रही है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इनके छोटे गुरूजी भी कनाडा से चंदा लाए थे, परंतु पकड़े कभी न गए। 

इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में जो पकड़ा जाता है, वही चोर होता है (ऐसे बिरले ही होता है), जो चतुर और सयाना होता है, वह फँसने वाले सांसद को नहीं, फँसाने वाले संसदीय जाँच आयोग तक को नेहरु जी की अमर परंपरा में निलंबित कर देता है। जो यह कर पाता है, स्वयं को भारत रत्न देकर अमर कर जाता है। युवराज भोले हैं अतः धराए हैं।

आज उच्च कोटि की थेथरई, नागरिकों की लघु स्मृति और स्वर्गीय किशोर कुमार के दुख भरे नग़मे ही उन्हें इस दुखद घड़ी के पार लगा सकेगी। आज जब हम सबके प्रिय लहरिया बाबू और हम सब स्वयं कोरोना और सीमा विवाद के दोहरे प्रकोप में दबे हैं, आवश्यक यही है कि राजनीतिक दल एवं नागरिक मिलकर अपने भोजन, समझौतों, व्यापार और व्यवहार में चीनी कम करें।

हमें चाहिए कि वर्तमान सरकार की अकर्मण्यता पर भी विश्वास बनाए रखें ताकि राहुल जी का स्नेह स्पर्श भारतीय राजनीति के रूखे मरुस्थल में हास्य-व्यंग्य के पुष्प खिलाते रहे और दिल्ली के मालिक से प्रेरणा प्राप्त करते हुए चंदे की भारतीय परंपरा को नए आयाम दें।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।