व्यंग्य
प्रश्न उठ रहे हैं लेकिन क्या उत्तर प्रदेश में इनका उत्तर मिल सकेगा? सिरफिरों का सप्ताहांत

प्रश्न क्यों पूछा जाता है- यह एक गूढ़ प्रश्न है। कुछ प्रश्न भोले होते हैं, मासूम होते हैं। ऐसे प्रश्नों से, बकौल गुलज़ार साहब, नाराज़ नहीं होते हैं, हैरान होते हैं। अमूमन प्रथा यह कहती है कि प्रश्न उत्तर की खोज में किए जाते हैं। मासूम प्रश्न हैरान करने के लिए होते हैं और मन के आनंद के लिए किए जाते हैं।

मध्य प्रदेश पुलिस ने एक जघन्य अपराधी को गिरफ्तार किया था। यह अपराधी कानपुर से पुलिस अधिकारियों की हत्या का आरोपी था। जब इनपर दबिश बनाई गई, सहसा पत्रकारिता जगत के चीन और कोरोना से बासी हुए वातावरण में मानों पुरवा की नव तरंग बह उठी एवं एक नए प्रकार के समाचार के आगमन से पत्रकार वर्ग प्रफुल्लित हो उठा।

जातिगत समीकरण और धार्मिक उन्माद को राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक बताने वाले पत्रकारों को सहसा राजनीति के अपराधीकरण का स्मरण हो आया। प्रश्न पूछे जाने लगे कि विकास दुबे कौन-से दल से जुड़े हैं, क्या वे लोहियावादी हैं या मंडलवादी या मंदिरवादी? यदि विकास यादव का एनकाउंटर होता है तो क्यों और नहीं होता है तो क्यों नहीं?

एक पुलिस थाने में हत्या से अपने शौर्यपूर्ण जीवन का प्रारंभ करने वाले दुबे जी किसके संरक्षण में अब तक डूबे थे और अब डूबे हैं तो क्या इसलिए डूबे हैं क्योंकि वे दुबे हैं। मैंने एक बार पहले भी लिखा था कि जिन प्रश्नों के उत्तर सहज नहीं प्राप्त होते हैं, वे उत्तर प्रदेश में मिलते हैं। संभवतः इसी लिए उत्तर प्रदेश को उत्तरप्रदेश कहा जाता है, न कि कश्मीर को। अनुभवहीन ही यह मानते हैं कि उत्तरप्रदेश का नामकरण उत्तर दिशा के आधार पर हुआ था। परंतु अब मुझे जान पड़ता है कि कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर उत्तर प्रदेश में भी नहीं होता। 

यह सही नहीं है। उत्तरप्रदेश उत्तरों की बहुतायत के कारण उत्तर प्रदेश है। आम तौर पर किसी अन्य राज्य में यह प्रश्न उठता है कि फलाना भ्रष्टाचारी क्यों है तो उसका उत्तर यह होता है कि श्रीमान जी ने वह पुल बनाने में कमाया या खेलों में घोटाला किया। उत्तरप्रदेश में उत्तर यह होता है कि बेचारा इस लिए भ्रष्टाचारी है क्योंकि उनकी पुत्री विवाह-योग्य है, वह बेचारा घूस न ले तो क्या करे।

उत्तर प्रदेश एक पारिवारिक प्रदेश है और यहाँ मुलायम जी के जन्मदिन से लेकर विकास प्राधिकरण के बाबू की सुपुत्री के विवाह तक के दायित्व का निर्वाह प्रत्येक नागरिक परिवार के सदस्य की भाँति अपने-अपने स्तर पर योगदान देकर करता है, जैसा कि दिल्ली के एक प्रतापी नेता ने कहा था कि जिसके पास कम है वह 10 रुपये दे, जिसके पास अधिक है वह अधिक देवे, पर देना सबको पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश-वासी सत्ता के प्रति यह पारिवारिक माहौल दशकों से बिहार के साधू यादव जी की अनुपस्थिति में भी बनाकर रखे हुए हैं। परंतु समस्या उत्तर प्रदेश की भी है। उसके पास भी ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर नहीं है। मसलन विकास दुबे कौन-सी पार्टी के हैं। हालाँकि यह समस्या अकेले विकास दुबे की नहीं है। यहाँ के अधिकांश नेता प्रत्येक चुनाव भिन्न-भिन्न दलों से लड़ते हैं जिससे कई बार उन्हें स्वयं भी स्मरण नहीं रहता है कि वे किस पार्टी से हैं।   

प्रश्नों का राजनीति में अपना स्थान होता है। प्रश्न जब प्रश्न के उत्तर में दिया जाता है तो असुविधाजनक उत्तरों से नेताओं को बचा जाता है। मसलन समाजवादी पार्टी के नेतागण मृत अपराधी के पार्टी से संबंधों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में पुलिस की कार्रवाई की प्रमाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं। प्रश्न उचित हैं एवं अपने आप में बुरे नहीं हैं, परंतु जब ये उत्तर में दिए जाते हैं तो उत्तरप्रदेश जैसे तर्क-प्रधान राज्य में भी तर्क के अनाथ हो जाने के परिचायक हैं।

यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकता है कि रावण का वध धर्मसंगत विधि से हुआ था या नहीं, परंतु क्या यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं होता कि रावण रावण क्यों बना? रावण का रावण होना उसके वध को न्यायोचित करता है। इसमें रावण के गणित-प्रेमी या कालीन के कारीगर होने का कोई स्थान न है न होना चाहिए।

जो लोग पहले कह रहे थे कि विकास दुबे पर कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि वे अगड़ी जाति के थे, वही अब ये कह रहे हैं कि क्या विकास दुबे का एनकाउंटर इसलिए हुआ क्योंकि वे जाति विशेष के थे? एक राजनीतिक दल का कुशल प्रवक्ता इसी प्रकार के प्रश्नों का निर्माण करने में पारंगत होता है जिनका कोई उत्तर उचित उत्तर नहीं होता है। जैसे आप किसी विवाहित पुरुष से पूछें कि क्या उसने पत्नी को पीटना बंद कर दिया है? अब आप इसका उत्तर हाँ या नहीं जो भी दे दें, फँसना आपको है ही।

राहुल गांधी अपनी दैनिक प्रश्नमाला के आने के बाद इस कला में पारंगत होते जा रहे हैं। 1990 के दशक में 12वीं के आम छात्र पुस्तक से पढ़ते थे, प्रतिभाशाली छात्र गाइड से पढ़ते थे, और जो चमत्कारिक चातुर्य से लैस छात्र थे, वे सिर्फ ’20 प्रश्न’ से पढ़ते थे। राहुल जी की प्रतिभा को देखते हुए लगता है कि वे प्रधानमंत्री भले न बन पाएँ, वे आगे चलकर भारतीय छात्रों के लिए प्रश्न बैंक निकाल सकेंगे।

राहुल जी एक अभिजात्य थेथरई के साथ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौते, राजीव गांधी फाउंडेशन पर उठने वाले प्रश्नों की ऐसे उपेक्षा करते हैं जैसे अंग्रेज़ी विद्यालयों में पढ़ने वाली प्रेमिकाएँ हिंदी स्कूल के किशोरों को ‘ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको खबर होने तक’ की स्थिति में छोड़ देती हैं। प्रश्न पूछने के अनेक लाभ हैं। प्रश्नसूचक चिह्न लगा देने मात्र से आरोप सुहागन हो जाता है, उसे सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त हो जाती है। 

वहीं कुछ प्रश्न आम जनता के होते हैं। ये प्रश्न बड़े निरीह होते हैं। इन्हें कोई प्रश्न ही नहीं मानता है। जिस प्रकार मोहल्ले की कन्या के पिता के स्कूटर का स्पार्क प्लग निकालने वाला बालक रोज़ पुनः प्लग लगाकर स्कूटर स्टार्ट करके भी अंकल जी को और कन्या को समझाता रह जाता है कि वह प्रेमी है, जगत भाई नहीं, और रक्षाबंधन को उसे बुखार नहीं आया था। आम नागरिकों के प्रश्न भी शून्य में उस निरीह प्रेमी की भावनाओं के सामान कहीं खो जाते हैं। उनके उत्तर नहीं होते, न दिए जाते हैं। 

विकास दुबे मर गया, मुख़्तार अंसारी राजनीति में हैं, अतीक अहमद उद्योगपति हैं, और कथित रूप से मानव शरीर को तेज़ाब में घोलने के प्रयोग करने वाले शहाबुद्दीन शिक्षाविद बनकर जेल से सत्ता का संचालन कर रहे हैं। आम आदमी सड़क पर अपने मौन को समेटे पैदल मीलों चलता है और लोकतंत्र के कठिन मार्ग पर मध्यमवर्गीय संतुलन बनाकर चलता रहता है।

आम आदमी भी कम दोषी नहीं है, वह अपराध के विरोध में खड़ा नहीं होता, वह अपने वाले के सरगना होने के लोभ से बंधा होता है। राजनीति अनुत्तरित प्रश्नों के मध्य फँसी हुई है, व्यवस्था यह पता नहीं कर पाती है कि कौन-सी हत्या ब्राह्मण है, कौन-सी चोरी क्षत्रिय, कौन-सा भ्रष्टाचार दलित है, कौन-सा कुकर्म कायस्थ। दंगे हिंदू हैं या मुस्लमान, यह भी इसी पर निर्भर होता है कि आप कौन-सा अखबार पढ़ रहे हैं। कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर उत्तरप्रदेश में भी नहीं है। ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जिनके उत्तर युधिष्ठिर से प्रश्न पूछने वाले यक्ष के पास भी नहीं हैं।

प्रजा की जिज्ञासा को सत्ताधारी पागल का प्रलाप मानते हैं। इन प्रश्नों को शास्त्रों में उत्तर देने योग्य नहीं माना जाता है। समय के साथ प्रजा परिपक्व हो जाती है और अपने मूक अस्तित्व में संकुचित हो जाती है। वह समझ जाती है कि पक्ष-विपक्ष का प्रश्नोत्तर रोम के साम्राज्य के ग्लैडिएटर युद्ध के सामान है और लोकतंत्र में उचटी हुई जनता के मनोरंजन के लिए आयोजित किया जाता है।

समय के साथ सत्ता और शासित दोनों परिपक्व हो जाते हैं। जनता जान जाती है कि विपक्ष के ‘प्रश्न पूछने के अधिकार’ का नारा, ‘उत्तर देने के दायित्व’ के निकट नहीं जाता है। जब पक्ष प्रतिपक्ष के मध्य यह छद्म युद्ध होता है तो पुलिस सुधार, न्यायिक सुधार, राजनीतिक सुधार जैसे अपने मूलभूत प्रश्नों को जनता सुदामा के चावल की भाँति अपनी फटी हुई चादर में छुपा लेती है।

और तुलसीदास के दोहे ‘तुलसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन। अब तो दादुर बोलिहें, हमें पूछिहें कौन’ की कोयल की भाँति सावन में दादुर अर्थात मेंढकों के शोर, जिसे श्रीलाल शुक्ल जी चुनावी कुकुरहाव कहते हैं, में अपने प्रश्नों के अनुत्तरित रह जाने को अपना प्रारब्ध मानकर मौन धारण कर लेती है।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।