व्यंग्य
पुलिस-प्रधान राष्ट्र भारत में कैसे तय होती है केस की गति, दुर्गति- सिरफिरों का सप्ताहांत

भारत की समाज व्यवस्था में पुलिस का बड़ा महत्त्व है। एक व्यंग्यकार होने के नाते मैं यहाँ तक कहना चाहूँगा कि भारत एक पुलिस-प्रधान राष्ट्र है। ऐसा मैंने अन्य वर्गों के संदर्भ में भी कहा होगा परंतु व्यंग्य में ऐसे राष्ट्र को फलाना प्रधान एवं ढेकाना प्रधान घोषित करके व्यंग्य का माहौल बनाने की परंपरा है।

वैसे भी भारत को सांस्कृतिक रूप से कृषक-प्रधान भी कहा गया है, परंतु तथ्य है कि कृषक तभी कृषक रह पाता है जब गाँव का थानेदार उसके कृषक होने में सहयोगी रहता है। थानेदार के कम सहयोगी होने पर कृषक चंबल के बीहड़ों में बाग़ी बन जाता है। थानेदार की अत्यधिक कृपा प्राप्त करने वाला कृषक भू-माफिया बन जाता है।

कुल मिलाकर इस सारी भूमिका का तात्पर्य यह है कि भारत कृषि-प्रधान भी तभी होता है जब पुलिस अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वाह करती है। कुछ लोग भारत को छात्र-प्रधान मानते हैं। छात्र वस्तुतः निरीह प्राणी होता है जिसे अपने निरीह होने का भी ज्ञान तब होता है जब उसे पिता से गाड़ी में तेल डालने के लिए जेबखर्ची माँगनी होती है।

राष्ट्र के छात्र-प्रधान होने में भी पुलिस का बड़ा योगदान होता है। जो छात्र पुलिस विभाग में थाना इंचार्ज अंकलजी नहीं ढूंढ पाता है, पढ़ाई पूरी करके कर्तव्यनिष्ठ करदाता बनता है। जो छात्र थाना इंचार्ज अंकल जी से संबंध साध लेता है प्रारंभ में छात्र नेता और कालांतर में युवा नेता बनकर भारत को छात्र-प्रधान राष्ट्र घोषित करता है।

अतः हम पाते हैं कि एक वर्ग-विशेष की प्रधानी के विषय में पाठकों में मतभेद हो सकता है परंतु इस महान राष्ट्र की प्रत्येक परिभाषा के मूल में पुलिसिया सहयोग है। अतः भिन्न-भिन्न कुतर्कों के माध्यम से मैं यह स्थापित करता हूँ कि भारत एक पुलिस-प्रधान राष्ट्र है जिसपर मेरा वर्तमान चिंतन एवं यह लेख आधारित है।

हे पाठकगण, तो यह तय रहा कि भारत एक पुलिस-प्रधान राष्ट्र है। कुछ लोगों का यह मानना है कि इसके पीछे ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था है जिसके अंदर भारत ने कोई तीन शताब्दियाँ काटी। हालाँकि इसमें कुछ भूमिका ईरानी एवं तुर्की कोतवालों की भी रही हो सकती है जिसके अंतर्गत भारत की जनता कोई पाँच शताब्दी तक तनावपूर्ण परंतु नियंत्रित अवस्था में रही है। भारत में पुलिस की परंपरा पौराणिक है। अपने लेख ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ में परसाई जी के कथा नायक इंस्पेक्टर मातादीन कहते हैं कि हनुमान जी त्रेता युग में वानरराज सुग्रीव के पुलिस अधिकारी थे।

एक आम व्यंग्यकार की वह बिसात कहाँ कि वह इंस्पेक्टर मातादीन से मतभेद रखे। मेरा भी यही मानना है की बजरंगबली वानरराज सुग्रीव के पुलिसबल के अध्यक्ष थे और सीता माता के अपहरण के केस में विलक्षण भूमिका निभाने के पुरस्कार स्वरूप उन्हें डेपुटेशन पर श्रीराम जी के राज्य में उन्हें सिटी पोस्टिंग का सुख प्राप्त हुआ।

हनुमान जी का प्राचीन मंदिर पुलिस लाइन के पास बिठाने की परंपरा संभवतः इसी कारण है। एक आम आधुनिक पुलिस वाले के लिए, चाहे वे अलीगढ़ के दरोगा ससिभूषन हों या मुंबई के माननीय परमबीर सिंह अथवा बिहार के श्री गुप्तेश्वर जी हों, हनुमान जी ही आदर्श हैं।

चाहे त्रेता युग के हनुमान हों या आज के थाना इंचार्ज, पुलिस के लिए शिकायतकर्ता की परेशानी और पहुँच का भाप ले पाना अति आवश्यक है। जब श्रीराम माता सीता के अपहरण की सूचना उन्हें देते हैं, यदि हनुमान उन्हें बाहर जाकर जाम्ब्वंत को लिखित में आधार की तीन कॉपी के साथ नत्थी करके देने कहकर टाल देते तो भला कभी किष्किंधा की रिमोट पोस्टिंग से निकल पाते?

एक प्रतापी पुलिस अधिकारी केस देखकर भाँप लेता है कि उस केस की क्या गति एवं दुर्गति करनी है। वह समझता है कि किस मृत्यु को हत्या एवं किसे आत्महत्या सिद्ध करना है। भोले-भाले लोग सोचते हैं कि केस तथ्यों के आधार पर बढ़ता है।  वे नहीं समझते कि तथ्य केस की दिशा के आधार पर बनाए एवं जुटाए जाते हैं।

एक कुशल पुलिस अधिकारी राजनीति पर राजनीतिक विश्लेषकों से अधिक पैनी दृष्टि रखता है और राजनीतिक दिशा के अनुकसार केस की दिशा रखता है। किस अपहरण को अपहरण और किसे नारी अभिव्यक्ति की उड़ान समझना है, यह तय करते हुए उसे राजनीतिक समीकरणों पर भी दृष्टि रखनी होगी। बेगुसराय की उठाई गई लड़की अपहृत नहीं है, भागी है और मुंबई में अभिनेता की मृत्यु हत्या नहीं आत्महत्या है, यह इन समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पुलिस को आगे बढ़ना है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री कब संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित लुप्तप्राय प्रजाति का ध्रुवीय पक्षी बन जाता है, कुशल पुलिसिया इसपर दृष्टि निरंतर बनाए रखता है। जो इसमें सफल होता है, वह अधिकारी भले ही जाती हुई सरकार में राष्ट्र-विरोधी घोषित करके निलंबित कर दिया जाए, आती हुई सरकार में वक़्फ़ बोर्ड का अधिकारी बनता है या इसी प्रकार के अन्य सम्मानित पदों पर नियुक्त होता है।

इतिहास हमें बताता है कि वीर पुरुष एक बार पाँव आगे बढ़ाकर पीछे नहीं खींचते। एक प्रतापी, परमवीर पुलिसवाला भी एक बार जाँच की दिशा तय करने के बाद कदम पीछे नहीं हटाता। पराक्रमी पुलिसकर्मी तय की हुई दिशा के अनुसार तथ्य, कथा, गवाह इत्यादि का बंदोबस्त करता है। इस प्रक्रिया में वह पुलिस के सालाना जलसे के रंगारंग कार्यक्रम के लिए मुफ़्त कलाकार, बेहतरीन चंदे एवं अपने लिए मलाईदार थाने की पोस्टिंग का प्रबंध भी करता है।

एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी दोषी एवं निर्दोष के विवाद में नहीं पड़ता है। वह एक संन्यासी के सामान निर्विकार भाव से मामले की तय दिशा में चलता है। यदि भूलवश अपराधी इरफ़ान के स्थान पर अब्दुल गिरफ्तार हो जाता है तो भी एक सुगढ़ पुलिसअफसर अब्दुल को स्वयं को इरफ़ान मान लेने के लिए मना ही लेता है। अंततः अंतिम न्याय तो ईश्वर को करना ही है, एक मानवमात्र के रूप में एक अफसर क्यों इस झंझट में पड़े और मनुष्य-मनुष्य में भेद करे। यूँ भी पुलिस की व्यवस्था भारत में परस्पर विश्वास पर ही आधारित है।

अपराधी को विश्वास होता है कि वह पकड़ा नहीं जाएगा, पुलिस को विश्वास होता है कि वह पकड़ा भी जाए तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा। ऐसा विश्वास ही है जिसके आधार पर यह माना जाता है कि मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर खड़े पुलिसकर्मी के पुरातन टीपू सुल्तान के समय की बंदूक आतंकवादियों के स्वचालित हथियारों का सामना करने के लिए पर्याप्त है।

राजनेता यह मान लेते हैं कि भारतीय पुलिस अपने तप की शक्ति से ही स्वयं को अपराधियों की गोलियों से बचाने में सक्षम है। कहीं-कहीं तो पुलिस भी अपराधियों पर इतना विश्वास करती है कि मानों ऋषि दुर्वासा के मारक श्राप की भाँति वाणी के प्रताप से ही ‘ठाँय, ठाँय’ की ध्वनि मात्र से ही वे प्राण त्याग देंगे। जनता तो भारतीय लोकतंत्र में यूँ भी परम विश्वासी जीव है। वह यह मानती है कि अपनी टूटी हुई साईकल पर जाता अकेला पुलिसिया लाखों लोगों के मोहल्ले में अपराध रोकने एवं अपराध करवाने, दोनों में सक्षम है।

इसी विश्वास पर ठेले वाला अपने ठेले के केले सिपाही को बच्चों के स्वास्थ्य के लिए देता है, आढ़तिया दरोगा की पुत्री के विवाह में सामाजिक योगदान की भूमिका एक जागरूक नागरिक के रूप में निभाता है। दरोगा पुराने नेता के निर्देश पर लाठी भाँजते हैं और उनकी लाठी खाकर अख़बार में छपकर नए नेता पुराने नेता में परिवर्तित होते हैं।

दरोगा जी अपनी निष्ठा का स्थानांतरण करके अपने स्थानांतरण से बचते रहते हैं। व्यवस्था चलती रहती है, समाचार रक्तरंजित होकर पाठक जमा करते हैं।  चौक-मोहल्ले पर इन विषयों पर उग्र बहस होती है। बहस की उग्रता और अवधि चौक पर खड़ा हवलदार तय करता है।

बंद के दिनों में साइकिल से बच्चे के लिए दूध लेने जाते निर्दोष बाप को वह लाठी लेकर दौड़ाता है और एड़ियाँ खड़काकर बैंक घोटाला करने वाले अपराधी को  पिकनिक करने के लिए कर्फ्यू पास उपलब्ध कराता है। उसे निर्दोष को भयहीन करने और अपराधी को भयभीत करने का उत्तरदायित्व प्रदत्त है परंतु उससे निर्दोष भयभीत और अपराधी निश्चिंत रहता है। पुलिस भारत में सत्ता की बंदूक है। भारत एक पुलिस-प्रधान राष्ट्र है।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।