व्यंग्य
मध्यम-वर्गीय व्यक्ति के जन्मदिन की विडंबना- सिरफिरों का सप्ताहांत

प्रसंग- हरिशंकर परसाई और राजीव गांधी के जन्मदिनों के बीच सैंडविच हुआ मध्यम-वर्गीय व्यक्ति का जन्मदिन।

हमारा भी एक और जन्मदिन निकल गया। कौन सा था? यह न पूछें। 49वाँ हो तो क्या और 50वाँ हो तो क्या? ऐसे व्यर्थ प्रश्नों का कोई औचित्य नहीं है। एक आम आदमी का आम जन्मदिन आता-जाता रहता है। जब तक आयु उतनी हो कि जन्मदिवस के केक पर मोमबत्तियाँ समा सकें तो फिर भी उसका कोई अर्थ हो, पर यदि वह उस अवस्था पर पहुँच गया हो, कि केक पर लगने वाली मोमबत्तियों की संख्या राष्ट्रव्यापी वामपंथी प्रदर्शन में जलाई जाने वाली मोमबत्तियों से अधिक हो जाए तो यूँ ही वह अर्थहीन हो जाता है।

जन्मदिन होता था शहंशाहों का, जब उनके नाम का खुतबा पढ़ा जाता था, उनकी सुदर्शन छवि के साथ सिक्के निकाले जाते था। उन्हें कद्दू-कटहल की भाँति तराज़ू पर तौला जाता था और वज़न-भर का सोना-चांदी गरीबों में बाँटा जाता था। लोकतंत्र के आने के बाद सिक्कों का स्थान डाक-टिकटों ने ले लिया। आगे के दौर में व्यवसायीकरण के दौर में यह भी संभव हो गया कि कुछ राशि देकर छगनलाल के स्वर्गीय दादाजी लटकन प्रसाद के नाम का डाक-टिकट निकाल सके और वे भी मरणोपरांत प्रसिद्धि प्राप्त कर सकें।

मेरा जीवन भी उतना ही मध्यम-वर्गीय है जितना मेरा जन्मदिन। 21 अगस्त की मेरी जन्मतिथि परसाई जी और पूर्व-प्रधानमंत्री जी के मध्य सैंडविच हुई है। एक ओर परसाई जी हैं जो अपने लेख ‘पहला सफ़ेद बाल’ में स्वयं को महायुद्ध की छाया में जन्मे, गरीबी और अभावों में पले जिजीविषा खाकर जिए लोगों में गिनते हैं, मेरे दूसरी ओर जीवनकाल में नौसैनिक पोत से अंडमान जाकर डॉलफिन के साथ जन्मदिन मनाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री हैं।

मेरे एक ओर साहित्य के बेशकीमती रत्न छोड़कर गए श्री हरिशंकर परसाई हैं और दूसरी ओर एक कई सौ-हज़ार करोड़ रुपये का ट्रस्ट और देश की सत्ता का दावेदार छोड़कर गए श्री राजीव गांधी हैं। इन दोनों के मध्य मैं अपनी मध्यम-वर्गीय संकोच से बंधा ऐसा व्यंग्यकार हूँ जिसके व्यंग्य स्तर में भी वहाँ तक नहीं हैं कि पढ़े जाएँ और मात्रा में इतने नहीं कि प्रकाशित पन्नों को बेचकर गृहस्वामिनियाँ कटोरियाँ प्राप्त कर सकें। नाक तो मेरी पुत्री की भी उसकी दादी से मिलती है परंतु पत्रकार उसके भविष्य के बारे में आशान्वित नहीं होते।

मेरा पुत्र नहीं है परंतु होता भी तो उसे सफल बनाने में संसार वह रुचि कभी न दिखाता जैसा राजीव जी के पुत्र को सफल दिखाने में है। राजीव जी अपने पुत्र के लिए एक विरासत छोड़ गए हैं कि निष्पक्ष पत्रकारों को उन्हीं में भारत-भारती के तारणहार दिखते हैं।

मैं अपनी पुत्री के लिए एक तो कमरों का मध्यम-वर्गीय मकान छोड़कर जाना चाहता हूँ परंतु मेरे मकान का बिल्डर प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़कर भाग गया है। जहाँ भगवान विष्णु को अनेकानेक अवतार धारण करने के लिए अनेक जन्म लेने पड़े, राजीव जी के सुपुत्र श्री राहुल गांधी एक ही जन्म में कई अवतार ले रहे हैं। यह उनका ही यश एवं प्रताप है कि हमारे बुद्धिजीवी उन्हें वे एक वार्षिक त्यौहार के रूप में प्रतिवर्ष नए-नए केश विन्यास के साथ लॉन्च और रीलॉन्च करते रहते हैं।

मैं, एक मध्यम-वर्गीय व्यक्ति के रूप में आयु की भी उस अवस्था में पहुँच गया हूँ जहाँ उसकी सत्ता से अपेक्षाएँ सीमित हो जाती हैं। मेरे बाल उस तेज़ी से श्वेत हो रहे हैं जैसे कुशल व्यवसायी भारतीय व्यवस्था में काले धन को सफ़ेद करता है। मेरी केशराशि जिसे मैं एक समय रेडियो पर ‘उड़े जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी, कुँवारियों का दिल मचले’ सुनकर झटके देता था, अब राजनीतिक नैतिकता के सामान क्षीण होती जा रही।

जैसे राहुल जी एक खानदानी नेता हैं, मैं एक खानदानी मध्यम-वर्गीय भारतीय हूँ। अतः मुझे सत्तर वर्ष की आयु तक युवा दिलों की धड़कन बने रहने का सौभाग्य नहीं है। वय की सुंदरी भी धनिकों के प्रासाद में मंद गति से कदम रखती है। गरीब के झोपड़े में वह क्रुद्ध कोसी की बाढ़ की भाँति उतरती है।

मेरे स्वप्न सीमित हो गए हैं। एक मध्यम-वर्गीय निराशा 40 के पश्चात मध्यवर्गीय भारतीय को घेर लेती है। आम तौर पर उसकी एक ही पत्नी होती है एवं पति से उसकी अपेक्षाएँ उतनी ही रह जाती हैं जितनी कोरोना काल में आम जनता की सरकार पर रहती हैं।

पति पत्नी से अपेक्षाएँ उसी प्रकार सीमित कर लेता है जैसे गरीब प्रशासन से और हरियाणा रोडवेज़ के बसों के पीछे लिखे स्लोगन ‘ये तो ऐसे ही चालेगी’ को ब्रह्मवाक्य बना लेता है। जिस प्रकार बिना रिश्वत के एक सरकारी कार्य कराके आम आदमी प्रसन्न हो जाता है, आम पति पत्नी से शाम की चाय प्राप्त करके स्वयं को वैकुंठ-वासी मान लेता है।

मध्यम-वर्गीय पत्नी इस आयु में डाँटना कम कर देती है, वह इसलिए नहीं कि पति के निराशाजनक व्यवहार में उसे भविष्य की संभावनाएँ सहसा दिखने लगती हैं, वरन इसलिए कि वह महामारी के शब्दकोष में कहें तो समूहगत रोग प्रतिरोध पर विश्वास करने लगती है। वह आदत के कारण पति के व्यक्तित्व के विचित्र पक्षों से इम्यून या प्रतिरक्षित हो चुकी होती है।

एक प्रसिद्ध शेर था– ‘गया कहीं भी लौटकर मेरे पास आया, बस यही इक बात अच्छी है मेरे हरजाई की’। आम आदमी की पत्नी भी अपने हरजाई के साहस की सीमाएँ उसी प्रकार भाँप चुकी होती है जैसे भारत की जनता स्वतंत्रता के पश्चात इतने वर्षों में अपने नेताओं के नैतिक स्तर एवं साहस को माप चुकी है। वह समझ चुकी होती है कि मेरा मध्यम-वर्गीय पति अब सौतन के भय की आयु सीमा पार कर चुका है एवं उसका औसत अस्तित्व उसे बड़े शक्तिशाली नेताओं और फिल्म सितारों की भाँति 70 की आयु में प्रेम जैसे साहसिक कदम नहीं उठाने देगा।

वह जान चुकी होती है कि आगे चल कर यही आदमी जो शरद जोशी जी के शब्दों में पत्नी की आपत्ति के मारे आसनसोल न जा सका, उसके साथ अपने चश्मे और अपनी कृत्रिम दंत पंक्ति बाँटेगा जिससे बारी-बारी से वे संसार को निहार कर मुस्कुरा सकेंगे।

भारतीय लोकतंत्र के साथ मैं भी प्रौढ़ एवं परिपक्व हो रहा हूँ। मेरे पास विकल्प बहुत नहीं हैं। मेरी पुत्री के पास विरासत के विकल्प नहीं हैं। उसे सफलता की सीढ़ियाँ नीचे से ही चढ़नी होंगी। मेरे जाने के पश्चात मेरे परिवार को पेंशन और पॉलिसी का ही सहारा होगा। मेरा चश्मा गांधी जी के चश्मे की भाँति 2.5 करोड़ रुपये का नहीं बिकेगा, मेरी निर्धनता का इतना ऊँचा मूल्य कौन लगाएगा? मेरे नाम पर परियोजनाएँ नहीं बनेंगी, मेरे नाम पर बने ट्रस्ट में सरकार पैसे नहीं डालेगी।

मैं एक मध्यम-वर्गीय भारतीय की अधेड़ आयु के आगमन की व्यंग्य कथा हूँ। मैं अपनी अवस्था पर विलाप नहीं करता हूँ, मैं उसपर अट्टहास करता हूँ। परंतु इतिहास गवाह है कि जब निर्धन अपनी निराशा पर अट्टहास करता है तो शक्तिशाली साम्राज्यों की अट्टालिकाएँ धराशायी हो जाती हैं।

मैं एक प्रौढ़ होते स्वतंत्र राष्ट्र का परिपक्व होता आम आदमी हूँ। मैं वह पका हुआ आम हूँ जो अपनी कड़वाहट खो चूका है। इसके माधुर्य में ही इस आयु का सौंदर्य है। परंतु इसकी प्रौढ़ सज्जनता को पौरुषहीनता समझने की भूल किसी को न करनी चाहिए। यह जब पलटता है, राष्ट्रों के इतिहास बदल जाते हैं। यही वह वय है जिसमें चाणक्य चंद्रगुप्त बोते और उगाते हैं।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।