व्यंग्य
घर से वामपंथी तर्कों के आधार पर निकाले गए छगनलाल- सिरफिरों का सप्ताहांत

प्रसंग- पुत्र के वामपंथी बनने पर छगनलाल ने कैसे खोया घर का स्वामित्व।

रात्रि के 11 बजे दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई तो एक बार को कलेजा धक् से हो गया। क्या सरस्वती को चकमा देकर लक्ष्मी पधार गई हैं। सरस्वती के सेवक के घर लक्ष्मी का क्या काम। फिर सोचा, देवी भी तो स्त्री हैं, वे कुछ भी कर सकती हैं। बड़े उहापोह में द्वार खोला तो कंबल लपेटे छगनलाल कूदकर अंदर प्रवेश कर गए। 

यह वही छगनलाल थे जो निष्पक्ष, निरीह मतदाता के रूप में नोटा पर वोट देकर राष्ट्र का भविष्य बदलने का वर्षों से प्रयास कर रहे हैं। छगनलाल जी का पुत्र युवा हो चुका है और एक आम मध्यम-वर्गीय भारतीय पिता की भाँति छगनलाल उसके कंधे पर बैठकर अमरीका तीर्थ हेतु जाना चाहते हैं। परंतु इस अमरीका जाने वाले पिता एवं श्रवण कुमार सम पुत्र के मध्य इस निर्धन लेखक का द्वार कैसे गया, यह मैं समझ नहीं पा रहा था। 

छगनलाल जी को देखकर ग़ालिब का शेर याद हो आया, ‘दर पर रहने को कहा और कहकर ऐसा फिर गया, उसने जितने अरसे में मेरा बांधा हुआ बिस्तर खुला’ की तर्ज पर मानो ग़ालिब अपना खुला हुआ बिस्तर लिए हुए दर से दुत्कार दिए गए हों, और अभी छगनलाल बने मेरे दरवाज़े पर खड़े हों। परंतु छगनलाल जी का जीवन तो आम मध्यम-वर्गीय अधेड़ पुरुष की तरह रोमांचहीन था, ग़ालिब की तरह रंगीन नहीं।

छगनलाल जी बड़े बेआबरू होकर कूचे से निकाले हुए प्रतीत हो रहे थे। वस्त्र के नाम पर बनियान और उनकी लज्जा का निवारण करने में प्रयत्नशील उनका कंबल ही था, मानो वह एक मध्यम-वर्गीय करदाता हो जिसे भारत में समाजवाद लाने का महती कार्य प्रदत्त हो। 

जिस मुद्रा में छगनलाल मेरे सोफे पर कंबल लपेटे बैठे थे, यह जान पड़ता था कि यह आशिक़ जाने को नहीं आया है। जिस मुद्रा में भारत की राजनीति को नई दशा, और चकराने वाली दिशा देने वाले दिल्ली के मालिक के प्रेम संबोधन से जाने वाले महानतम मुख्यमंत्री लेफ्टिनेंट गवर्नर के आवास में लोकतंत्र को जीवित रखने को बैठे थे, उसी अवस्था में छगनलाल दिख रहे थे। उनके गोल शृंगार रस से परिपूर्ण मुख पर करुण रस का अवैध अतिक्रमण स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। वे उस अवस्था में थे जिसमें प्रश्न पूछने का अर्थ फँस जाना होता है, परंतु वह व्यंग्य लेखक ही क्या जो फँसे न। सो मैंने प्रश्न किया और फँसा।  

क्या हुआ छगनलाल जी, ऐसे भी क्या हम्बल होना कि आप कम्बल ओढ़े देर रात सड़क पर निकल आए?”

जिस प्रकार छुटभैया नेता टीवी कैमरा को देखकर देशभक्ति, लोकतंत्र की रक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी बातें बोलने लगता है, छगनलाल के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली।  

बोले, “बेटा हमारा हाथ से निकल गया।
हमने कहा, “किसके साथ भाग गया?”
छगनलाल जी बिदक गए, “अरे, कहाँ की बात कर रहे हैं आप? वो सब तो भारतीय मध्यम-वर्गीय युवाओं की लोकल आदतें हैं।
मुझे समझ नहीं आया। फिर पूछा– “फिर क्या हुआ?”
वे बोले, “लड़का वामपंथी हो गया है।

समस्या गंभीर थी। मुझे पहले लगा था कि बालक किसी लड़की के साथ भाग गया होगा, या कहीं डकैती या हत्या के अपराध में फँस गया होगा। मैंने संवेदना व्यक्त की-

यह तो चिंता का विषय है। किसी अपराध में दुर्भाग्यवश फँसा व्यक्ति तो बच सकता है, परंतु वामपंथ में फँसा व्यक्ति तो अपराध और अधर्म को ही धर्म एवं क्रांति सिद्ध कर देगा। अपराधी एवं वामपंथी में यही भेद है। अपराधी कीचड़ में गिरा व्यक्ति है, वामपंथी कीचड़ में लोटकर उसका आनंद लेने वाला बुद्धिजीवी है। आपको पहले पता नहीं चला?”

पहले नहाना और दाढ़ी बनाना बंद किया तो मुझे संदेह-सा तो हुआ था, परंतु फिर मुझे लगा कोई नया फैशन होगा। मैंने आधुनिक अभिभावक होने के नाते उसके साथ बैठ के बियर पीने का भी प्रयास किया। तब उसने मेरी मध्यम-वर्गीय आधुनिकता का हेय दृष्टि से उपहास करते हुए मुझे बुर्जुआ कह दिया था और चिलम फूँकने लगा था।“, उन्होंने कहा।

मैंने पूछा, “आपने मना नहीं किया था?”   
वह मनुवादी पितृसत्ता का विरोध करते हुए उग्र हो गया था। उसने मुझे बुर्जुआ षड्यंत्र का हिस्सा बताया, और मेरे बटुए से पेट्रोल के पैसे लेकर मेरी गाड़ी लेकर कहीं प्रदर्शन में चला गया।” 

परंतु आपको त भी संदेह नहीं हुआ था?” मुझे उस समय निरीह छगनलाल का निर्दोष मुख भारत सरकार की तरह प्रतीत हुआ। 

एक दिन संदेह हुआ था जब जूते को पोलिश करने में देर होने पर उसने अपने ऐश ट्रे को हमारे पुराने नौकर को फेंकर मारा। परंतु मुझे लगा शायदलोकतंत्र में दलित सर्वहारा का स्थानविषय में उसकी सभा में जाने में देरी होने के कारण उग्र हो गया होगा। अखबार में तस्वीर भी आई थी उसकी। इतना होनहार बालक।“, छगनलाल अपने अतीत में खो गए।  

समस्या गंभीर होती जा रही थी। छगनलाल सोफे पर मुख्यमंत्रीवत विराजमान थे, मैं उपराज्यपालसम निरीह था। “परंतु आज क्या हुआ। आपके होनहार सपूत ने क्या कर दिया?”

छगनलाल जी का दुःख प्रस्फुटित हो निकला- उसने मुझे घर से निकाल दिया।” 
परंतु घर तो आपके नाम पर है।

छगनलाल साँसों ही साँसों में बुदबुदाए– “वह कह रहा था यह सब स्वामित्व की धारणाएँ रूढ़िवादी हैं। घर भी समाज का है, व्यक्ति भी समाज का है। कह रहा था समाज क्रांति मांग रहा है। वामपंथ ही गरीब-गुरबा की बुर्जुवा हिंसा से रक्षा करेगा। बार-बार चिल्ला रहा था ब्लैक लाइव्स मैटर। घर के खरगोश को पकाकर खा गया और उसके पिंजरे में दो चूहे रखे हैं, एक का नाम माओ है दूसरे का लेनिन। मैंने मना किया तो आज ऐश ट्रे मुझपर फें मारी।

आँगन में लगाए विषवृक्ष का विनाश मैं अपने समक्ष देख रहा था। मैंने छगनलाल को तकिया लाकर दिया। छगनलाल कंबल ओढ़कर लेट गए। मैं बत्ती बुझाकर जाने लगा तो बोले, “वैसे बेटा होनहार बहुत है। फिलिस्तीन से लेकर फिजी तक की घटनाओं के विषय में जानकारी रखता है।

मैं समझ गया एक पराजित पिता को मेरे दिए तकिए की नहीं इस तक़िया की आवश्यकता थी।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।