व्यंग्य
गुरुदेव ने जब अराजकता से क्रांति का आलाप छेड़ा, खिसक लिये ‘सिरफिरों’ के व्यंग्यकार

एक मध्यवर्गीय व्यक्ति, विशेष रूप से, एक हिंदी व्यंग्यकार के लिए बड़े ही सम्मान का विषय था जो गुरुदेव के दर्शन का लाभ प्राप्त हुआ। गुरु बुर्जुवा लोगों से नहीं मिलते हैं। उनका नाम गुरु नहीं है। कुछ लोग नाम से गुरु नहीं होते हैं, चरित्र से होते हैं, व्यवहार से होते हैं।

ये गुरु धर्म के नाम पर मोह-माया त्यागकर गुरु नहीं बनते हैं, ये मोह-माया के मार्ग में शर्म त्यागकर गुरु बनते हैं। आम तौर पर ये भाषा पर तगड़ी पकड़ रखते हैं और उत्कृष्ट भाषाई सौंदर्य एवं संगीतमय स्वर की शक्ति पर टीवी चैनलों की बगिया में बहार लाते हैं। 

चुनाव के पहले ये गरम पानी एवं शहद के गरारे कर के अपनी श्रद्धानुसार किसी भी पार्टी के पक्ष में अनुमान लगाते हैं। चुनावी परिणाम के गलत आँकलन से हतोत्साहित न होते हुए ये जनता को इनके अनुमान के अनुसार मतदान न करने के लिए दोषी मानते हैं। ये अपना वोडका बिना पानी के नीट पीते हैं और गरीब किसानों के बिना पानी के पीड़ित होने पर चिंता करते हैं।  

ये वामपंथ के परमहंस होते हैं जो मार्क्स मरहूम के दुख में टसूए बहाते हैं और अपने बाप को घर से निकाल देते हैं। अश्वेत अमरीकियों के समर्थन में गोरेपन की क्रीम लगाकर प्रदर्शन पर जाते हैं। ये भारत में सार्वजनिक सड़क कब्ज़ाए हुए लोगों को उठाए जाने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। लेकिन चीन में उइगर नागरिकों को बंदी रखे जाने पर शुतुरमुर्ग मुद्रा में मस्तक को मिट्टी में ठेल देते हैं।

इनकी सहानुभूति वोक भीड़ के अनुसार तय होती है। वोक जैसा कि हम जानते हैं अज्ञानी एवं वामपंथी के मध्य की सीढ़ी है। वामपंथी गुरु फैशन की दिशा तय करता है और वोक मनुष्य जंबूद्वीप के ज़ॉम्बी के सामान उस दिशा में चल देता है।   

बहरहाल हमारे वोक मित्र छगनलाल के माध्यम से हमें, मध्यवर्गीय हिंदी व्यंग्यकार होने के बावजूद गुरुदेव के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ। और वह शुभ दिन आ गया जब गरीबों और किसानों को समर्पित भारतीय राजनीति के अभिजात्य प्रतिनिधि को हमने कॉफ़ी हाउस में अपने समक्ष पाया।

गुरु ने कत्थक नृतक की कुशलता से भौहों को हिलाते हुए, अपने सामने पड़े कॉफ़ी के खाली एवं भरे हुए प्यालों को निहारा, और अपने अधखुले नेत्रों की तिरस्कारपूर्ण दृष्टि मेरे मध्यवर्गीय अस्तित्व को निहारा। “सिगरेट”, ऊँघते हुए वामपंथ की भाँति ऊँघते हुए वामपंथी ने अचानक पुकारा।

छगन भाई ने और गुरु के समीप स्थित उनके स्थाई चेले ने दो सिगरेट हथेलियों पर श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत कर दी। गुरु ने एक सिगरेट उठाकर अधरों पर लगाई और आकाश की ओर धुएँ के छल्ले छोड़े। गुरु चिंतित प्रतीत हो रहे।

सीनियर चेला, जूनियर चेला छगन भाई एवं अस्थाई चेला यानि मैं- हम तीनों शास्त्रोचित नियमों के अनुसार तत्काल प्रभाव से चिंतित हुए और आकाश की ओर उड़ते हुए धुएँ के छल्लों को उसी अंदाज़ में ताकने लगे जैसे कलयुग में पीड़ित कल्कि अवतार की प्रतीक्षा में शून्य को देखता है। गुरुदेव ने मेरी ओर देखा।

यह वह अवसर था जिसमे यदि मेरी संवेदनशीलता पर एक व्यंग्यकार की ढीठता न होती और सीता माता की लज्जा का अंश मात्र भी चरित्र में होता तो मैं धरती माता के गर्भ में समा जाता। “मेरी नसों में तेज़ाब बह रहा है। सूरज का पारा पिघल कर मेरे मस्तिष्क के ज्वालामुखी का ईंधन हो गया है।  मेरी आत्मा एक मरी हुई चिड़िया के सामान सड़ांध दे रही है।”, गुरुजी बोले।

गुरुदेव चिंतित एवं उद्विग्न थे अतः एक कुशल चाटुकार शिष्य की भाँति हम भी चिंतित एवं उद्विग्न थे। वामपंथ के क्षेत्र में हम नौसिखिये भले ही थे, हमने भी इंजीनियरिंग में सेशनल एवं प्रैक्टिकल पास किए थे, अतः गुरु के दुख में दुखी एवं गुरु के सुख में सुखी होने की कला में हम भी पारंगत थे।

हमारे सहपाठियों ने भी गुरु-कन्या की विदाई में पछाड़ें मार-मारकर रोने में कन्या की माता तक को लज्जित करके उत्तम अंकों अभियंता बनने का सुख प्राप्त किया था। हम वहाँ मैदान तो न मार सके थे परंतु मार्क्सवाद में उत्तम मार्क्स पाने को कटिबद्ध थे।  

“गुरुदेव उद्विग्न हैं?”, हमने पूछा। चेला संख्या 1 तथा चेला संख्या 2 ने मेरी अनुभवहीनता को देखते हुए उच्छवास भरा। चेला संख्या 1 एवं 2 ने एक-दूसरे को निहारा और ऐसी संतुष्टि से साँस ली मानों एक साथ ईश्वर को धन्यवाद दिया हो कि गुरुदेव सामान्य हैं।

गुरुदेव ने चेला संख्या 1 एवं 2 को संबोधित करते हुए कहा, “हिंदुस्तान क्रांति माँगता है। क्रांति की वधु रक्त से स्नान करने को मृत्यु के समुद्र में उतरने को व्याकुल है। शहरों की संवेदना मर चुकी है, लंबी-लंबी सड़कें छिपकिली की भाँति लिजलिजी सभ्यता बनकर रेंग रही है।”

चेला क्रमांक 1 एवं 2 ने न जाने क्या सोचा होगा, परंतु व्यंग्यकार ने गुरुदेव के भीतर के प्रगतिशील लेखक को अंगड़ाई लेते महसूस किया। 

“मेरे दोस्तों, मेरे हमख्यालों, हमनिवालों, हमप्यालों, स्स्सा ..,” गुरुदेव ने अपने अनुप्रास अलंकारों की सेना को मुंबई पुलिस के उस ट्रैफिक हवलदार की भाँति  ‘थाम्बा’ किया जिसे अचानक दूसरी ओर से आती कमिश्नर साहब की गाड़ी दिख गई हो, और आगे कहा, “क्या तुम्हें क्रांति की दस्तक की आवाज़ नहीं आती?” 

चेला क्रमांक 1 ने फ़ौरन उत्तर दिया- “गुरु, मेरी आत्मा के किनारों को गिद्ध नोच रहे हैं। मेरी रूह में मवाद भर गया है। चमगादड़ सा मैं रातों को कंदराओं में भटकता हूँ। मैं सब से घृणा करने लगा हूँ।”
“गुड, घृणा से ही विद्रोह उत्पन्न होगा। क्रोध से ही क्रांति का जन्म होगा। क्या तुम उस कन्या के प्रेम पाश से निकल गए हो? क्या तुम उससे भी घृणा कर पा रहे हो?”, गुरु बोले।

“मैं करता हूँ, गुरुवर। संभवतः वह भी मुझसे घृणा करती है। लगता है उसे मुझसे प्रेम हो गया है, तभी हमारे विचार एक-दूसरे के प्रति एक सामान हैं।”, छगनलाल तुरंत कूदे।  
चेला क्रमांक 1 को यह पसंद नहीं आया, और उसने फ़ौरन आपत्ति दर्ज कराई।  

“तुम्हारी घृणा मूक है। वामपंथ मूक घृणा का वाहक नहीं है। तुम गुएवारा नहीं ठेठ गँवार हो। मैं उस कन्या से नहीं उसके पिता से भी घृणा करता हूँ। कल मैंने उसके बाप के स्कूटर का स्पार्क प्लग निकाल दिया था। वह दोपहर तक स्कूटर टेढ़ा करके चलाने का प्रयास करता रहा।”, चेला क्रमांक 1 के कथन पर छगनलाल का श्रृंगाररस सूचक मुख करुण रस से ओत-प्रोत हो गया।

“छगन, क्रांति बलिदान माँगती है। तुम क्या क्रांति लाओगे, तुम्हारी आत्मा अभी नग्न नहीं हुई है। तुम सामाजिक शर्म के बंधनों में बंधे हो। तुम एक फड़फड़ाते हुए कबूतर हो जिसके पंख टूट-टूटकर गिर रहे हैं। जब तुम्हारा धड़ नग्न हो जाएगा तब ही तुम सच्चे क्रांतिकारी बनोगे।”
“गुरुदेव, मैं प्रयास करूँगा कि वामपंथ के योग्य विध्वंस कर सकूँ।”, छगनलाल शर्मिंदा हुए। 

“मैं समुद्र को पी जाना चाहता हूँ। मेरी प्यास को महासागर का विस्तार चाहिए।”, गुरुदेव बोले। 
मैंने वेटर को इशारा किया। वह चार गिलास पानी रख गया। गुरुदेव ने फिलहाल एक गिलास पानी से काम चलाया। 

“तुम्हें अपने अंदर के जानवर को जगाए रखना है। हमें चीन से नहीं लड़ना है, वह हमारा दोस्त है। हमें लड़ना है इस समाज से, इसकी खोखली व्यवस्था से, हमें घृणा को अपने अंतर में घोल लेना है। मेरे अंदर विद्रोह का तूफ़ान है, मेरी हड्डियों में क्रांति कीर्तन कर रही है, मेरे रीढ़ का फॉस्फोरस बुझ रहा है, मुझे और आग चाहिए, मुझे और फॉस्फोरस चाहिए।”

गुरुदेव फॉर्म में आ रहे थे। मैं सोच ही रहा था कि जबतक फॉस्फोरस की व्यवस्था नहीं होती, क्यों न एक मसाला दोसा ही मँगा लें। परंतु गुरुदेव के ओज को देखकर साहस नहीं हुआ और मेरी मध्यवर्गीय भूख मूक हो गई।

मानव इतिहास के परिवर्तन के इस क्रांतिकारी मोड़ पर मसाला दोसा के तुच्छ विचार पर मैंने स्वयं को उसी प्रकार कोसा जिस प्रकार एक आम मध्यवर्गीय व्यक्ति प्रत्येक राष्ट्रीय संकट के लिए स्वयं को कोसता है। जॉर्ज ओरवेल ने लिखा था कि सर्कस में एक कुत्ता प्रशिक्षक के चाबुक लहराने पर छलाँग लगाता है परंतु सही मायने में प्रशिक्षित कुत्ता वह होता है जो बिना चाबुक के भी छलांग लगाए।

भारतीय मध्यवर्गीय करदाता वही कुत्ता है। मैंने क्रांति के मार्ग में आने वाली अपनी भूख को किनारे करके गुरुदेव पर ध्यान केंद्रित किया।

गुरुदेव का स्नानवंचित शरीर थरथराने लगा था, गुरुदेव ने स्वर्गीय श्री मार्क्स की याद में आँखें मूंदकर गगन की ओर उठा ली थीं, विचित्र-सी तंद्रा का वातावरण था, गुरुदेव की काँख की दुर्गंध वातावरण में अभूतपूर्व विद्युत का प्रवाह कर रही थी और मैं अपनी कुर्सी में कंधे सिकोड़े घुसा जा रहा था। अचानक ही गुरुदेव ने टेबल पर मुक्का मारा और कॉफी हाउस के सब लोग हमारी ओर देखने लगे। 

“इतिहास हमारी ओर देख रहा है। अराजकता से ही क्रांति उत्पन्न होगी। परंतु मुझे मानव-मुंडों का एक हाहाकार करता हुआ ज्वारभाटा चाहिए। तुम से न होगा, तुम्हारी आत्मा अभी पूर्णतया क्रांति के लिए तैयार नहीं है। तुम लज्जा और संकोच जैसे सामाजिक बंधनों से बंधे हो। तुम्हारे व्यक्तित्व में अब भी नग्नता से परहेज है। तुम बिना बनियान के बुश्शर्ट नहीं पहन सकते, तुम लाओगे क्रांति! मुझमे शताब्दियों की ज्वाला है, मैं फट रहा हूँ।”

गुरुदेव की बुशर्ट के तोंद पर के दो बटन उत्साहित श्रोता की भाँति खुल गए। मुझे मसाला दोसा प्राप्त होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी। एक दिन के लिए इससे अधिक वामपंथ मेरे लिए अहितकारी हो सकता था। गुरुदेव के रौद्र रूप से सम्मोहित छगनलाल को वहीं छोड़कर मैं गुरुदेव को प्रणाम करके धीरे से कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल आया। मुझे आज भी बनियान के बिना बुशर्ट काटती है। मैं अभी क्रांति के लिए तैयार नहीं हूँ।