व्यंग्य
किसान नामक फसल की कटाई का मौसम चुनाव से पहले आता है- सिरफिरों का सप्ताहांत

किसान भारतीय समाज का प्रमुख वर्ग होता है। कृषकों पर लेख लिखने वाले अकादमी एवं पद्म पुरस्कार प्राप्त करके महान साहित्यकार बनते हैं। उनकी पुस्तकें पाठशालाओं के पाठ्यक्रम में स्थान पाती हैं जहाँ उन्हें वे लोग पढ़ते हैं जो कृषक नहीं बनना चाहते।

किसानों पर कहानियाँ आम तौर पर भारतीय भाषाओं में लिखी जाती हैं क्योंकि श्रीलाल शुक्ल जी का मानना है कि अंग्रेज़ी रोब की भाषा है। किसान की निरीह भूमिका के चित्रण के लिए अंग्रेज़ी उचित भाषा नहीं है, इसी कारणवश कृषकों पर कथाएँ निरीह भारतीय भाषाओं में लिखी जाती हैं। अब क्योंकि भारतीय भाषाओं में लेखन सिकुड़ता जा रहा है, कृषक कथाएँ भी कम होती जा रही हैं।

जिस प्रकार अंग्रेज़ी उपन्यास की सफलता के सूत्र में भारतीय लेखकों ने एक निश्चित गूढ़ मंत्र का संधान किया था- इसमें एक कॉलेज होता है, अपशब्दों से अलंकृत नायक एवं नायिका, आचार्य रजनीश के संभोग से समाधि का निहित संदेश, एक गुंडा एवं रूढ़िवादी प्रवृत्ति का हिंदूवादी चरित्र और एक उदार एवं प्रगतिशील अहिंदू चरित्र, एक गोरक्षकों की क्रूरता की घटना, एक विवाह के बंधनों को तोड़कर विवाहेतर संबंधों द्वारा स्वयं को बंधनमुक्त करती हुई जागरूक महिला और एक विवाहेतर संबंधों के द्वारा पत्नी को धोखा देता हुआ निकृष्ट एवं नराधम, चरित्रहीन पति होता है- उसी प्रकार किसान प्रधान कथाओं की सफलता के मूल में एक क़र्ज़ में डूबा किसान, एक झोपड़ी, उसके दरवाज़े पर ईमानदार भारतीय करदाता की भाँति पड़ा श्वान एवं एक लोभी साहूकार और उसे संरक्षण देने वाला एक शक्तिशाली नेता होता है।

बहरहाल, भारतीय आधुनिक उपन्यास सत्य से परे हैं। भारतीय साहित्य में जिसके विषय लिखकर लेखक अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को पूर्ण करते हैं एवं बुद्धिजीवी श्रेणी में पदार्पण करते हैं, वे कृषक भी कई प्रकार के होते हैं। जिन किसानों में साहित्यकार रुचि रखता है, वे राजनेताओं के किसी कार्य के नहीं होते।

भारत में तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो जनसंख्या के अनुसार भारत की लगभग 60 प्रतिशत जनता कृषि कार्य में निहित है और यह राष्ट्रीय उत्पादन में 18 प्रतिशत का योगदान देता है। इसका विचित्र अनुपात पर बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने यूरोप और रूस जाकर अध्ययन किया और उनके महती अनुसंधान के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के पश्चात के 70 वर्षों में सरकारें इस निष्कर्ष पर पहुँची कि भारतीय कृषक अपने उत्तरदायित्व से उदासीन है और अधिक उत्पादन करना ही नहीं चाहता है।

किसानों को बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर- अधिक अन्न उपजाओ- जैसे महती कार्यक्रम आयोजित करके, स्वस्थ किसान एवं चमकदार कृषक पत्नी के चित्र गाँव-देहात में लगाकर किसानी के प्रति उत्साहित करने का प्रयास किया गया। 1990 के दशक के आते-आते सरकार मान चुकी थी कि भारतीय कृषक स्वभावतः निखट्टू एवं आलसी है और उपज बढ़ाना ही नहीं चाहता है। इसी विषय पर ध्यान देते हुए सरकारों ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए ऋणमाफी को अधिक उपयोगी माना और उसी की दिशा में काम करने लगी।

भारत में कृषि के तीन मौसम होते हैं, रबी का मौसम जिसमे गेहूँ, सरसों आदि की पैदावार होती है, खरीफ़ का मौसम जिसमे बाजरा, चावल जैसी फसलें होती हैं  और धरना-प्रदर्शन का मौसम जिसमें किसान नेता पैदा होते हैं। एक किसान वह होता है जो पहले दो मौसमों में काम करता है। वह किसान अक्सर भूमिहीन होता है और बिहार-ओडिशा से पंजाब-हरियाणा-कश्मीर जाकर खेती का काम करता है। किसानों का यह वर्ग सरकार से कर्जमाफी की नहीं उर्वरा की ब्लैक मार्केटिंग रोकने की, खेतों में सिंचाई के साधनों की, उपज के लिए उचित मूल्य की माँग करता है। संक्षेप में कहें तो यह वह किसान वर्ग है जो सरकार से असंभव की अर्थात् सरकार से काम करने की अपेक्षा रखता है। यह वर्ग अक्सर सरकार से परस्पर उदासीनता का संबंध रखता है। यह वर्ग वह है जो हिंदी लेखकों का प्रिय होता है।

दूसरा वर्ग भारतीय कृषकों का वह होता है जो दो मौसमों में इस पहले वर्ग के कृषकों को खेतों में जोतता है, मंडियों को अपने नियंत्रण में रखता है। यह सरकार की ऋणमाफी की योजना में लाभार्थियों की सूची में सबसे आगे होता है। जहाँ पहला कृषक वर्ग सूखी रोटी, धनिया-मिर्च की चटनी और प्याज के साथ भोजन करता है, दूसरा वर्ग कृषकों के डिज़नी लैंड में मक्खन खाता है, और ट्रेक्टर पर आधुनिक संगीत के म्यूजिक वीडियो बनाता है। यह कृषक भैय्या नहीं ब्रो होता है, और वार्षिक भ्रमण हेतु ट्रेक्टर लेकर दिल्ली जाता है और बोट क्लब पर हुक्का लगाकर सरकारों को आतंकित करता है। यही वह कृषक वर्ग है जिसे ध्यान में रखकर भारत में दशकों से कृषि नीतियों का निर्धारण होता रहा है।

यह प्रेमचंद का किसान नहीं, श्रीलाल शुक्ल जी का किसान होता है। यह राजनीतिक दलों को चुनाव के लिए धन और धमकी उपलब्ध कराता है। यह मंडियों का मालिक होता है, कोऑपरेटिव बैंक का ट्रस्टी होता है। जिस प्रकार छात्र नेताओं पर निर्भर शिक्षा नीति शिक्षा से अधिक नक़ल पर केंद्रित होती है, किसान नेताओं पर आधारित कृषि नीति लोभ एवं कामचोरी के बढ़ावे पर आधारित होती है। यह स्वयं ऋण मुक्ति का लाभ लेता है और अपने अनुसार भ्रष्ट बैंक अधिकारियों द्वारा भगाए गए पहली किस्म के किसानों को उधार बाँटता है, उनकी उपज का मूल्य निर्धारित करता है।

इनके इतर एक कृषक वर्ग वह होता है जो स्वयं राजनीति में किसान नेता बनकर उतर पड़ता है। यह वह वर्ग है जो 9 एकड़ की भूमि पर कृषि करके कई सौ करोड़ रुपये की संपत्ति खड़ी कर लेता है, गमलों में करोड़ों की गोभियाँ उगाकर हरित क्रांति को नया आयाम देता है।

इनसे भी ऊपर सर्वोच्च स्तर के कृषक वे होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय कृषक के नाम से भी जाना जाता है, ये लोधी गार्डन में जॉगिंग करते हैं, 5-सितारा में पार्टियाँ करते हैं। शस्य-श्यामला भारत भूमि के ये प्लाट काटने वाले कृषक होते हैं। प्रेमचंद के होरी के जीवन में ये देवता-स्वरूप नरपुंगव काला-चश्मा एवं महंगी जाकिट धारण करके अवतरित होते हैं एवं उन्हें निर्धन, साधन रहित फटी गंजी पहनने वाले किसान के जीवन से मुक्त करके शहरों में सड़कें बनाने भेजते हैं।

यही दो वर्ग हैं भारतीय कृषकों के जो भारत की स्वतंत्रता के पश्चात राष्ट्रीय कृषक नीति की साइकल के दो पहिए रहे हैं। और यही कारण रहा है कि भारतीय कृषक एक से एक आकर्षक पोस्टरों, महान् से महान् गोष्ठियों के बावजूद उपज बढ़ाने की और आकर्षित नहीं हुआ है। वास्तव में फसल उगाने वाला कृषक स्वयं भारतीय राजनीति के लिए वह फसल हो गया है जिसे हर चुनाव के पहले काटने के लिए दराँतियाँ तेज़ करके राजनीतिक दल खड़े हो जाते हैं। उनकी राजनीतिक सफलता की कुंजी कृषकों की असफलता में ही है। किसी भी नई किसान नीति की सफलता एवं स्वीकार्यता समझने के लिए आवश्यकता है यह जानना कि आप उपरोक्त में से किस वर्ग के किसान से बात कर रहे हैं।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।